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पंजाब की तूड़ी की मांग बढ़ी: राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बढ़ा मूल्य, 5 रुपये किलो से बढ़कर 12 रुपये किलो पहुंचे दाम
Thu, 31 Mar 2022 03:57 PM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 31 Mar 2022 03:57 PM IST
सार
पंजाब की भूमि बहुत उपजाऊ है। यहां गेहूं और चावल की फसल मुख्य रूप से होती है। भौगोलिक क्षेत्र के सिर्फ 1.5 प्रतिशत भाग में देश के गेहूं के उत्पादन का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत और कपास की भी 12 प्रतिशत पैदावार का उत्पादन करता है।
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तूड़ी के रेट बढ़े।
- फोटो : फाइल
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विस्तार
पंजाब की तूड़ी (भूसा) की राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मांग बढ़ गई है। इससे मूल्य में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। पहले 4 से 5 रुपये किलो तक ही किसानों को इसका मूल्य मिल पाता था, लेकिन अब कीमत 12 रुपये तक पहुंच गई है। गेहूं की तूड़ी में हुई इस वृद्धि के बाद राज्य के किसान अब अवशेष भंडारण की योजना बनाने लगे हैं।
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पंजाब की भूमि बहुत उपजाऊ है। यहां गेहूं और चावल की फसल मुख्य रूप से होती है। भौगोलिक क्षेत्र के सिर्फ 1.5 प्रतिशत भाग में देश के गेहूं के उत्पादन का 22 प्रतिशत, चावल का 12 प्रतिशत और कपास की भी 12 प्रतिशत पैदावार का उत्पादन करता है। गेहूं की फसल कटान के बाद अवशेष पराली हमेशा से ही पंजाब के लिए सिरदर्द बनी रहती है, लेकिन अब पराली से बनाई जाने वाली तूड़ी की पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मांग बढ़ी है। इसके कारण सीजन के इस समय 3 से 4 रुपये प्रति किलो बिकने वाली तूड़ी 10 से 12 रुपये प्रति किलो बिक रही है। पड़ोसी राज्यों में यह 14 से 16 रुपये प्रति किलो बिक रही है। कृषि विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि गेहूं के भूसे के अधिक भंडारण से पराली को कम जलाना सुनिश्चित होगा और किसानों और दिहाड़ी मजदूरों के लाभ में भी इजाफा होगा।
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उत्तर-पश्चिम भारत में पशुपालक साल भर अकेले या अन्य फीड के साथ उपलब्धता के आधार पर पशुओं को गेहूं का भूसा खिलाते हैं। यह चारे के अन्य विकल्पों से काफी सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि शहरी क्षेत्र की डेयरियां मुख्य रूप से तूड़ी पर ही निर्भर होती हैं।
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