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टोल प्लाजा कंपनी ने वन विभाग की भूमि कब्जाई

Wed, 08 Jul 2015 02:28 AM IST
हर्ष कुमार सलारिया/अमर उजाला, चंडीगढ़
हर्ष कुमार सलारिया/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 08 Jul 2015 02:28 AM IST
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encroached by toll plaza company, complaint in court

जीरकपुर-शिमला हाईवे पर चंडीमंदिर के निकट टोल प्लाजा स्थापित करने वाली कंपनी को टोल प्लाजा बनाने के लिए जितनी भूमि दी गई थी, उससे 9.2654 हेक्टेयर अधिक भूमि पर कंपनी ने न सिर्फ अवैध तरीके से कब्जा कर लिया बल्कि निर्माण भी कर लिया है।

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वन विभाग को जब इसकी भनक लगी तो विभाग ने संबंधित कंपनी से ऐतराज जताते हुए क्षतिपूर्ति का दावा भी किया। बावजूद इसके टोल प्लाजा निर्माण करने वाली कंपनी ने वन विभाग को एक पैसा भी नहीं दिया।
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आखिरकार वन विभाग को कुरुक्षेत्र स्थित पर्यावरण न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। विभाग ने कंपनी पर 9265400 रुपये का दावा ठोंका है। इस मामले की सुनवाई आगामी 5 सितंबर को होगी।
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टोल प्लाजा का निर्माण करने वाली कंपनी हिमालयन एक्सप्रेस वे की ओर से जमीन कब्जाने का मामला उस समय उजागर हुआ, जब स्थानीय शिवालिक विकास मंच के अध्यक्ष विजय बंसल ने हरियाणा वन विभाग द्वारा जारी की गई एक जांच रिपोर्ट को केंद्रीय सशक्त कमेटी को भेजकर कार्रवाई का आग्रह किया।

केंद्रीय कमेटी ने हरियाणा के मुख्य सचिव को वन विभाग की जांच रिपोर्ट की प्रति भेजकर चंडीमंदिर टोल प्लाजा और उसके कार्यालय के अवैध निर्माण की जांच करने को कहा।

यह कहती है वन विभाग की जांच रिपोर्ट
हरियाणा वन विभाग ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा है कि हिमालयन एक्सप्रेस वे कंपनी ने जीरकपुर-परवाणु फोरलेन को वन संरक्षण अधिनियम 1980 और भारतीय वन अधिनियम 1927 का उल्लंघन करके बिना अनुमति ही वन भूमि पर निर्माण कार्य किया है, जिससे केंद्र सरकार को भी राजस्व की हानि हुई है।

जांच रिपोर्ट में कहा गया कि निर्माण कंपनी ने फोरलेन की अनुमति लेकर टोल प्लाजा को छह लेन का बना लिया। इस तरह जीरकपुर से पिंजौर तक सारा निर्माण वन विभाग की जमीन पर बिना अनुमति किया गया। निर्माण कंपनी ने अपने साइट प्लान में कहीं भी टोल प्लाजा चंडीमंदिर और भवन कार्यालय को नहीं दर्शाया है।

केंद्रीय वन मंत्रालय ने भी दिखाई नरमी
हरियाणा वन विभाग ने हिमालयन एक्सप्रेस वे कंपनी को वन भूमि और काटे गए पेड़ों के मूल्य के एवज में 2 करोड़ 22 लाख 19 हजार 624 रुपये की वसूली के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखा था, लेकिन वन मंत्रालय ने दरियादिली दिखाते हुए इस राशि को घटाकर 1 करोड़ 55 लाख 13 हजार 691 रुपये करके निर्माण कंपनी से वसूली तो कर ली, लेकिन केंद्र सरकार को करीब 67 लाख रुपये का राजस्व घाटा करवा दिया।


खास बात यह भी रही कि इसके बाद वन मंत्रालय के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वनपाल ने हरियाणा के प्रधान मुख्य वनपाल को पत्र लिखकर निर्माण कंपनी के खिलाफ भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत कार्रवाई करने को कहा। जबकि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वन मंत्रालय खुद कार्रवाई करने का अधिकार रखता है।

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