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पहले गरीबी और अब सरकार उड़ा रही मजाक, सवाल- राशन कार्ड नहीं, पर क्या हमें भूख नहीं लगती
Sat, 25 Apr 2020 02:57 PM IST
खुशबू गोयल
रिशु राज सिंह, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sat, 25 Apr 2020 02:57 PM IST
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धनास का परिवार
- फोटो : अमर उजाला
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लॉकडाउन में सरकार उन लोगों को राशन उपलब्ध करा रही है, जिनके पास राशन कार्ड है। लेकिन जिनके पास राशन कार्ड नहीं, क्या उन्हें भूख नहीं लगती? यह सवाल लोगों के मन में उठ रहा है। क्योंकि उनके पास राशन कार्ड नहीं हैं, लेकिन वे जरूरतमंद हैं। लॉकडाउन से उनकी रोजी रोटी छिन गई, लेकिन सरकार की तरफ से उन्हें कोई राहत नहीं मिल रही। लॉकडाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव गरीबों, श्रमिकों और प्रवासी मजदूरों पर पड़ा है। एक माह से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद एक दिन की रोटी जुटाना भी परेशानी का सबब बन गया है।
केंद्र सरकार की योजना के तहत जिन परिवारों के पास राशन कार्ड हैं और सब्सिडी मिल रही है, उन्हें तो गेहूं और दाल मिल रहा है, लेकिन इनके अलावा शहर में हजारों लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास कार्ड नहीं हैं पर वह भी बेहद जरूरतमंद हैं। मजदूरी करने और रिक्शा चलाने वाले इन परिवारों का लॉकडाउन ने काम छीन लिया। लॉकडाउन के 15 दिन तक तो विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से खाना व राशन दिया, जिससे काम चला। अब बीते डेढ़ सप्ताह से हालत बहुत खराब है। राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक की नजर ऐसे लोगों पर नहीं पड़ रही है।
ऐसे हजारों जरूरतमंदों के लिए प्रशासन के पास कोई खास योजना नहीं है। अधिकारियों के पास भी कोई जवाब नहीं है। उनका बस यही कहना है कि ऐसे लोगों के लिए रोजाना खाने के पैकेट बांटे जा रहे हैं और संस्थाओं की तरफ से सूखा अनाज दिया जा रहा है। हकीकत यह है कि ऐसे लोगों तक कोई सरकारी मदद नहीं पहुंच रही है। पैक खाना ज्यादातर लोगों को मिलता नहीं, कभी मिलता भी है तो दिन में एक बार। इससे परिवार का पेट कैसे पाला जा सकता है। लोगों का कहना है कि लॉकडाउन ने उनका कामकाज भी छीन लिया है फिर सरकार उन्हें राशन न देकर भेदभाव क्यों कर रही है।
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केंद्र सरकार की योजना के तहत जिन परिवारों के पास राशन कार्ड हैं और सब्सिडी मिल रही है, उन्हें तो गेहूं और दाल मिल रहा है, लेकिन इनके अलावा शहर में हजारों लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास कार्ड नहीं हैं पर वह भी बेहद जरूरतमंद हैं। मजदूरी करने और रिक्शा चलाने वाले इन परिवारों का लॉकडाउन ने काम छीन लिया। लॉकडाउन के 15 दिन तक तो विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से खाना व राशन दिया, जिससे काम चला। अब बीते डेढ़ सप्ताह से हालत बहुत खराब है। राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक की नजर ऐसे लोगों पर नहीं पड़ रही है।
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ऐसे हजारों जरूरतमंदों के लिए प्रशासन के पास कोई खास योजना नहीं है। अधिकारियों के पास भी कोई जवाब नहीं है। उनका बस यही कहना है कि ऐसे लोगों के लिए रोजाना खाने के पैकेट बांटे जा रहे हैं और संस्थाओं की तरफ से सूखा अनाज दिया जा रहा है। हकीकत यह है कि ऐसे लोगों तक कोई सरकारी मदद नहीं पहुंच रही है। पैक खाना ज्यादातर लोगों को मिलता नहीं, कभी मिलता भी है तो दिन में एक बार। इससे परिवार का पेट कैसे पाला जा सकता है। लोगों का कहना है कि लॉकडाउन ने उनका कामकाज भी छीन लिया है फिर सरकार उन्हें राशन न देकर भेदभाव क्यों कर रही है।
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राशन कार्ड नहीं तो क्या हमें जीने का कोई अधिकार नहीं
धनास में परिवार सहित रहने वाले अवधेश ने बताया कि वह कई दिन से राशन के लिए परेशान हैं। पड़ोस में रहने वाले लोगों के पास सरकार की तरफ से कुछ लोग आए थे और उन्हें गेहूं और दाल देने की बात कही है, लेकिन हमारा क्या होगा। हमारे पास अगर राशन कार्ड नहीं है तो क्या हमें जीने का अधिकार नहीं है।
अधिकारी घर आकर देख सकते हैं, घर पर राशन की बहुत किल्लत है। पहले कुछ समाजसेवी खाना देने के लिए आते थे, लेकिन अब उन्होंने बंद कर दिया है। घर में बच्चे भूखे-प्यासे हैं। परिवार के लोग परेशान हैं। अब तो एक-एक दिन इसी चिंता में गुजरता है कि भूखे बच्चों का पेट कैसे भरें।
वैश्विक महामारी में भेदभाव कैसे कर सकती है सरकार
रामदरबार में किराये पर रहने वाले शुभम विश्वकर्मा पत्नी और एक बच्चे के साथ चंडीगढ़ रोजी रोटी की तलाश में आए थे। चंडीगढ़ पहुंचने के दो दिन बाद लॉकडाउन हो गया। रामदरबार में कोई रिश्तेदार रहता था, इसलिए छत मिल गई लेकिन कमाने का कोई साधन नहीं होने की वजह से अन्न को तरस गए हैं।
पहले करीब दो हफ्तों तक सामाजिक संस्थाओं ने राशन दिया तो गुजारा चल गया, लेकिन अब वहां से भी मदद नहीं मिल रही है। उनका कहना है कि कोरोना महामारी से सभी प्रभावित हुए हैं फिर सरकार राशन कार्ड होने और नहीं होने वालों के बीच भेदभाव कैसे कर सकती है। सभी को जीने के लिए राशन की जरूरत है।
अधिकारी घर आकर देख सकते हैं, घर पर राशन की बहुत किल्लत है। पहले कुछ समाजसेवी खाना देने के लिए आते थे, लेकिन अब उन्होंने बंद कर दिया है। घर में बच्चे भूखे-प्यासे हैं। परिवार के लोग परेशान हैं। अब तो एक-एक दिन इसी चिंता में गुजरता है कि भूखे बच्चों का पेट कैसे भरें।
वैश्विक महामारी में भेदभाव कैसे कर सकती है सरकार
रामदरबार में किराये पर रहने वाले शुभम विश्वकर्मा पत्नी और एक बच्चे के साथ चंडीगढ़ रोजी रोटी की तलाश में आए थे। चंडीगढ़ पहुंचने के दो दिन बाद लॉकडाउन हो गया। रामदरबार में कोई रिश्तेदार रहता था, इसलिए छत मिल गई लेकिन कमाने का कोई साधन नहीं होने की वजह से अन्न को तरस गए हैं।
पहले करीब दो हफ्तों तक सामाजिक संस्थाओं ने राशन दिया तो गुजारा चल गया, लेकिन अब वहां से भी मदद नहीं मिल रही है। उनका कहना है कि कोरोना महामारी से सभी प्रभावित हुए हैं फिर सरकार राशन कार्ड होने और नहीं होने वालों के बीच भेदभाव कैसे कर सकती है। सभी को जीने के लिए राशन की जरूरत है।
रोजी-रोटी छिनी फिर हमारी मदद क्यों नहीं कर रही सरकार
कालोनी नंबर-4 में रहने वाले सुनील कुमार के पिता जब तक जिंदा थे, उनके खाते में राशन के पैसे आते थे। अब पिता की मौत के बाद सब्सिडी आनी बंद हो गई है। वह फैक्टरी में काम करते हैं, लेकिन लॉकडाउन की वजह से एक महीने से घर बैठे हैं। जो पैसे जमा थे, उससे अब तक गुजारा चला, लेकिन अब राशन खत्म हो गया है और पैसे भी नहीं हैं। सरकार सिर्फ उन्हें राशन दे रही है, जिनके पास कार्ड है। यह कैसा भेदभाव है। लॉकडाउन की वजह से हमारी रोजी रोटी भी तो छिनी है फिर सरकार हमारी मदद क्यों नहीं कर रही है। गरीबों के साथ ऐसा मजाक क्यों किया जा रहा है।
डीबीटी द्वारा खाते में पैसा आता है फिर भी नहीं मिला राशन
प्रशासन राशन कार्ड धारकों को नियमित राशन की आपूर्ति की बात कह रहा है। लेकिन बगैर राशन कार्ड धारकों को तो छोड़ें, कार्ड धारकों तक को परेशानी उठानी पड़ रही है। रामदरबार में रहने वाले रामअचल मौर्य 1979 से चंडीगढ़ में रहते हैं। राशन कार्ड भी है और पत्नी के खाते में सब्सिडी का पैसा भी आता है, बावजूद इसके उनका नाम प्रशासन की लिस्ट में नहीं है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी दो बार सभी दस्तावेज लेकर राशन की लाइन में लगी, लेकिन जब नंबर आया तो उन्हें बाहर निकाल दिया। प्रशासन के किसी अधिकारी के पास जवाब नहीं है कि कार्ड होने के बावजूद उन्हें राशन क्यों नहीं मिल रहा है। उन्होंने बताया कि सैकड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें कार्ड होने के बावजूद राशन नहीं दिया जा रहा है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत सिर्फ उन्हीं लोगों को गेहूं और दाल दिया जा रहा है, जिन्हें डीबीटी द्वारा सब्सिडी मिल रही है। जिनके पास कार्ड नहीं है या सब्सिडी नहीं मिल रही है, उन तक प्रशासन बना हुआ खाना और सूखा अनाज पहुंचा रहा है। लॉकडाउन के खत्म हो जाने के बाद एक कैंप लगाकर लोगों को जोड़ा जाएगा।
- विनोद पी कावले, सेक्रेटरी, फूड व सप्लाई विभाग चंडीगढ़
डीबीटी द्वारा खाते में पैसा आता है फिर भी नहीं मिला राशन
प्रशासन राशन कार्ड धारकों को नियमित राशन की आपूर्ति की बात कह रहा है। लेकिन बगैर राशन कार्ड धारकों को तो छोड़ें, कार्ड धारकों तक को परेशानी उठानी पड़ रही है। रामदरबार में रहने वाले रामअचल मौर्य 1979 से चंडीगढ़ में रहते हैं। राशन कार्ड भी है और पत्नी के खाते में सब्सिडी का पैसा भी आता है, बावजूद इसके उनका नाम प्रशासन की लिस्ट में नहीं है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी दो बार सभी दस्तावेज लेकर राशन की लाइन में लगी, लेकिन जब नंबर आया तो उन्हें बाहर निकाल दिया। प्रशासन के किसी अधिकारी के पास जवाब नहीं है कि कार्ड होने के बावजूद उन्हें राशन क्यों नहीं मिल रहा है। उन्होंने बताया कि सैकड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें कार्ड होने के बावजूद राशन नहीं दिया जा रहा है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत सिर्फ उन्हीं लोगों को गेहूं और दाल दिया जा रहा है, जिन्हें डीबीटी द्वारा सब्सिडी मिल रही है। जिनके पास कार्ड नहीं है या सब्सिडी नहीं मिल रही है, उन तक प्रशासन बना हुआ खाना और सूखा अनाज पहुंचा रहा है। लॉकडाउन के खत्म हो जाने के बाद एक कैंप लगाकर लोगों को जोड़ा जाएगा।
- विनोद पी कावले, सेक्रेटरी, फूड व सप्लाई विभाग चंडीगढ़