डोप टेस्ट में फेल हो गए कांग्रेस के विधायक, खुद बताई जांच के पॉजिटिव रहने की वजह
कांग्रेस के एक विधायक डोप टेस्ट में फेल हो गए हैं। वहीं पंजाब में डोप टेस्ट का यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोई नेता पॉजिटिव रहे, वो भी सरकार में रहते हुए। इनका नाम है सुरिंदर सिंह चौधरी और ये जालंधर में करतारपुर से एमएलए हैं। रविवार दोपहर पौने दो बजे विधायक चौधरी अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट के दफ्तर पहुंचे थे।
लैब कर्मियों ने उनका यूरीन सैंपल लिया। मंगलवार को लैब में जब टेस्ट किया गया तो वह टेस्ट पॉजिटिव आया। उनके यूरीन सैंपल में डिप्रेशन और नींद की समस्या में इस्तेमाल होने वाली नशीली दवा बेंजोडाइजेपिन के अंश पाए गए हैं। यह नशीली दवा डिप्रेशन व नींद की समस्या से जूझ रहे लोग इस्तेमाल करते हैं।
वहीं, टेस्ट पॉजीटिव रहने पर विधायक का कहना है कि उन्होंने माइंड रिलेक्स करने वाली दवा ली है। उनके पास डॉक्टर की प्रिस्क्रिप्शन है। वे रेस्टिल की गोली खाते हैं। रेस्टिल की गोली में एलप्राजोलाम साल्ट होता है। इसे घबराहट, दिमागी परेशानी, डिप्रेशन, नींद की समस्या और एंग्जाइटी वाले मरीज लेते हैं।
ये है डोप टेस्ट का मामला
गौरतलब है कि नशे की समस्या से जूझ रहे पंजाब को निजात दिलाने के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने सभी सरकारी कर्मचारियों का डोप टेस्ट अनिवार्य किया है। मुख्यमंत्री ने नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्स्टेंस (एनडीपीएस) कानून, 1985 में संशोधन के जरिए ड्रग की तस्करी करने के लिए मौत की सजा के प्रवधान की सिफारिश करने का फैसला लिया था। इसके तहत प्रदेश भर में 3.5 लाख सरकारी कर्मचारियों के डोप टेस्ट होंगे।
इस नियम के बाद अब नेताओं में भी डोप टेस्ट कराने की होड़ लगी हुई है। अब तक विधायक बावा हैनरी, रजिंदर बेरी, सांसद चौधरी संतोख सिंह, विपक्ष के नेता सुखपाल सिंह खैहरा डोप टेस्ट करवा चुके हैं। वहीं डोप टेस्ट को लेकर सरकारी मुलाजिमों में चल रहे असमंजस को सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने खुद दूर कर दिया। उन्होंने साफ किया है कि किसी भी मुलाजिम का डोप टेस्ट पॉजिटिव निकला तो उसे बर्खास्त नहीं किया जाएगा। बल्कि, पहचान गुप्त रखते हुए उसका इलाज करवाया जाएगा।
राज्य सरकार द्वारा नशा विरोधी मुहिम को लेकर बनी कैबिनेट सब-कमेटी की मीटिंग की प्रधानगी करते हुए सीएम ने मुख्य सचिव को मुलाजिमों का डोप टेस्ट करवाने की प्रक्रिया तैयार करने की हिदायत दी। सीएम ने कहा कि एसएचओ निर्धारित समय में अपने इलाकों में पड़ते गांवों से नशों की समस्या दूर करने के लिए जवाबदेह होंगे। उन्होंने नशों से संबंधित बकाया मामलों में तेजी लाने के निर्देश दिए। साथ ही कहा कि एसडीएम, डीएसपी भी अपने इलाकों को नशा मुक्त करने के लिए जिम्मेदार होंगे।
उन्होंने फैसला लिया कि नशे के आदी जो लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज का खर्च नहीं उठा सकते, उनके इलाज का खर्च सरकार उठाएगी।