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Punjab News: सिद्धू की सजा पर कांग्रेस ने साधी चुप्पी, पिछले पांच में पार्टी को जोड़ा या तोड़ा, पढ़ें- पूरा ट्रैक रिकॉर्ड

Fri, 20 May 2022 12:31 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Fri, 20 May 2022 12:31 AM IST
सार

दरअसल, 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव के ऐन पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए नवजोत सिद्धू के बीते पांच साल के कार्यकाल पर नजर डाले तो उन्होंने ज्यादातर मौकों पर अपनी पार्टी और सरकार की मुश्किल बढ़ाने का ही काम किया।

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Congress kept silent on Navjot Singh Sidhu sentence
नवजोत सिंह सिद्धू - फोटो : फाइल

विस्तार

पंजाब कांग्रेस के पूर्व प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू को विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार का मुख्य दोषी ठहराने वाले कांग्रेसी नेताओं ने सिद्धू को सजा सुनाए जाने पर चुप्पी साध ली है। न तो प्रदेश प्रधान और न ही कांग्रेस हाईकमान ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की लेकिन पंजाब में कांग्रेस के पतन के लिए सिद्धू को सीधे तौर पर जिम्मेदार मान रहे कांग्रेसियों का कहना है कि कम से कम एक साल तक तो पार्टी में शांति बनी रहेगी और प्रदेश इकाई को नए सिरे से संगठित करने में आसानी होगी क्योंकि सिद्धू का अब किसी मामले में दखल नहीं होगा।

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हालांकि, पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा सिद्धू के प्रति अपने गुस्से को छिपा नहीं सके। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तो कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन सिद्धू को पंजाब में कांग्रेस को हुए नुकसान के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि पंजाब में सिद्धू ने कांग्रेस को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है।
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दरअसल, 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव के ऐन पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए नवजोत सिद्धू के बीते पांच साल के कार्यकाल पर नजर डाले तो उन्होंने ज्यादातर मौकों पर अपनी पार्टी और सरकार की मुश्किल बढ़ाने का ही काम किया। कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री रहते उन्होंने सरकार में कैप्टन के समकक्ष पद हासिल करने के लिए गतिविधियां शुरू कर दीं लेकिन सफलता न मिलने पर वह कैप्टन सरकार से मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कैप्टन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 

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कांग्रेस हाईकमान ने तत्कालीन प्रदेश प्रधान सुनील जाखड़ को हटाकर सिद्धू को प्रदेश प्रधान का ओहदा भी दिया लेकिन कैप्टन से उनका मनमुटाव खत्म नहीं हो सका। इसका नतीजा यह हुआ कि कैप्टन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और बाद में उन्होंने कांग्रेस पार्टी ही छोड़ दी। इसके बाद मुख्यमंत्री पद हासिल करने के सिद्धू को प्रयासों को उस समय झटका लगा जब हाईकमान ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया। 

हालांकि तब सिद्धू ने मुख्यमंत्री बनने के लिए सुखजिंदर रंधावा का रास्ता भी रोक दिया था। कैप्टन की तरह सिद्धू की पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी से भी नहीं बनी और वह मुख्यमंत्री और कांग्रेस सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते रहे। चन्नी द्वारा प्रदेश के एजी और डीजीपी की नियुक्ति पर तो सिद्धू इतने नाराज हुए कि उन्होंने प्रदेश प्रधान पद से अपना इस्तीफा हाईकमान को भेज दिया। 

आखिरकार हाईकमान के इशारे पर एजी और डीजीपी हटाकर सिद्धू के पसंद के अधिकारी तैनात को तैनात किया गया। विधानसभा चुनाव के दौरान सिद्धू ने पार्टी के घोषणापत्र से पहले ही अपना घोषणापत्र पेश कर दिया और हाईकमान पर भी उसे लागू करने का दबाव बनाया। आखिरकार चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद पार्टी के छोटे-बड़े नेता खुलकर सिद्धू के खिलाफ आ गए। 

उन्होंने सिद्धू को पार्टी के खराब प्रदर्शन और हार का दोषी ठहराया। इस दौरान हाईकमान ने भी नेताओं और कार्यकर्ताओं के तेवरों को देखते हुए सिद्धू का प्रधान पद से इस्तीफा ले लिया। इसके बाद भी सिद्धू अपने चिर-परिचित अंदाज में सक्रिय रहे और प्रदेश कांग्रेस और हाईकमान के समानांतर अपनी ताकत का प्रदर्शन करते रहे।

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