पंजाब: चन्नी को सीएम बना कांग्रेस ने भेदा विपक्षी दलों का सियासी चक्रव्यूह, 32 फीसदी दलित वोट बैंक पर टिकी नजर
पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव है। सभी राजनीतिक दलों की निगाहें 32 फीसदी दलित वोट बैंक पर हैं। यही वजह है कि सूबे की पूरी राजनीति अनुसूचित जाति समुदाय के इर्द-गिर्द घूम रही है। भाजपा, शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी इन्हें अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं। किसी ने आगामी चुनाव में जीत दर्ज करने पर सीएम तो किसी ने डिप्टी सीएम की कुर्सी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दी है लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाने की घोषणा कर कांग्रेस ने सबसे बड़ा सियासी दांव चल दिया है।
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पंजाब में दलित नेता को सीएम बना कांग्रेस ने इतिहास रच दिया। वहीं कुछ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। शिअद-बसपा गठबंधन हो या फिर भाजपा और आम आदमी पार्टी, सभी की नजर पंजाब के 32 फीसदी दलित वोट बैंक पर थी।
चरणजीत सिंह चन्नी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा बना विपक्षी दलों को फिर से रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया है। ऐसा पहली बार है जब एससी वर्ग पंजाब की सियासत के केंद्र में है। अब तक यहां दोनों प्रमुख सियासी दल शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस 18 फीसदी जट सिखों पर ही दांव लगाते रहे हैं। मगर इस बार सबकी नजर 32 फीसदी दलित वोट बैंक पर है।
पंजाब की सियासत में एससी वर्ग की उपेक्षा किस कदर होती रही है, यह इस बात से ही समझा जा सकता है कि रामगढ़िया सिख बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले ज्ञानी जैल सिंह को छोड़ दें तो 1967 के बाद पंजाब में गैर जट कभी मुख्यमंत्री नहीं बना। दरअसल, पंजाब में 34 आरक्षित सीटें हैं, जिनमें रविदासिया समाज, भगत बिरादरी, वाल्मीकि भाईचारा, महजबी सिख का खासा वोट बैंक है।
खासकर दोआबा में रविदासिया समाज बहुसंख्या में है और करीब 35 फीसदी आबादी एससी वर्ग की है। भाजपा हाईकमान ने पंजाब में एससी वर्ग से सीएम बनाने की घोषणा कर चुका है। पार्टी राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विजय सांपला पर दांव खेलने की तैयारी कर रही है।
अकाली दल ने एससी वर्ग की पार्टी कहे जानी वाली बहुजन समाज पार्टी से समझौता कर घोषणा की है कि पंजाब में डिप्टी सीएम की कुर्सी किसी अनुसूचित जाति के नेता को दी जाएगी। आम आदमी पार्टी के नेता भी कह चुके हैं कि पंजाब में डिप्टी सीएम एससी वर्ग से होगा।
राज्य में अनुसूचित जाति के वोटरों की तादाद 30 से 32 फीसदी (सबसे ज्यादा) के बीच में है लेकिन यह पूरी तरह कभी किसी पार्टी के साथ नहीं रहा। दलित वोट आमतौर पर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच बंटता रहा है। बीच में बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की लेकिन उसे भी एकतरफा समर्थन नहीं मिला। कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनावों में खासा समर्थन मिला था, जिसकी बिनाह पर कैप्टन की सरकार बनी।
पिछले चुनाव में अकाली दल तीसरे नंबर पर रहा था, जबकि 20 सीटों के साथ आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही। अकाली-भाजपा गठबंधन को तब 18 सीटों पर संतोष करना पड़ा लेकिन अकाली दल को 30.74 तथा आप को 23.80 फीसदी मत ही मिले थे। कांग्रेस 38.64 फीसदी वोट ले सकी। कांग्रेस को डेढ़ फीसदी और अकाली दल को 11.20 फीसदी मतों का नुकसान हुआ था। पिछली बार आप ने अकाली दल के वोटों में सेंध लगाई, क्योंकि अकाली दल सत्ता में था लेकिन दलितों का झुकाव कांग्रेस व अकाली दल की तरफ था।
शिअद-बसपा के समझौते से परेशान थे कांग्रेस के दिग्गज
चन्नी को सीएम बनाकर कांग्रेस ने किसान आंदोलन में अपना रुतबा बरकरार रखने की भी कोशिश की है। पंजाब के गांवों में काफी आबादी मजहबी सिखों की है, जो किसानों के साथ मजदूरी करते हैं। मजहबी सिखों की आबादी का एक बड़ा तबका किसान मजदूर एकता के बैनर तले कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है।
कांग्रेस के दिग्गज शिअद-बसपा के समझौते से भी खासे परेशान चल रहे थे। पंजाब के एससी मतदाताओं का रुझान अकाली-बसपा की तरफ तेजी से बढ़ रहा था। अकाली दल और बीएसपी ने 1996 के लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन किया था और तब पंजाब में इस गठबंधन को जोरदार सफलता मिली थी।
राज्य की 13 में से 11 लोकसभा सीटें इस गठबंधन ने झटकी थीं। अकाली दल को 8 और बीएसपी को 3 सीटें मिली थीं लेकिन उसके बाद अकाली दल ने बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया और तब से यह गठबंधन 2020 तक चला था। 1996 की तरह 2022 में अकाली-बसपा पंजाब में तमाम राजनीतिक दलों का सफाया न कर दे, इससे पहले कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा कर बड़ी सियासी चाल चल दी है।