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चंडीगढ़ के चटखारे ... गुड़ की चटनी के साथ छोले-कुलचे का जायका लें यहां
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 28 May 2017 04:23 PM IST
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गुड़ की चटनी के साथ छोले-कुलचे का जायका
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चंडीगढ़ में खाने-पीने के शौकीन लोगों की कमी नहीं है। वहीं, इन्हें जायका देने वाले भी शहर में अपना काफी नाम कमा चुके है। सेक्टर-10 डीएवी कॉलेज के सामने श्यामलाल छोले-कुलचे वाले का जायका एक बार टेस्ट करने के बाद आपको स्वत: ही यहां तक खींच लाएगा।
डीएवी कॉलेज के सामने श्यामलाल लगभग 48 साल से पीढ़ी दर पीढ़ी छोले-कुलचे की दुकान लगा रहे हैं। इनके छोले-कुलचे और गुड़ की चटनी का जायका ही ऐसा है कि जिसने एक बार भी इसका स्वाद चखा, तो वह मौका मिलने पर दोबारा स्वाद लेने से चूकता नहीं है।
श्यामलाल के छोले-कुलचे की खासियत यह है कि वह खुद ही अपने मसाले तैयार करते हैं। जोकि बाजारों में उपलब्ध नहीं होता। वहीं, उनके हाथों से बनी गुड़ की चटनी की इस जायके के स्वाद और बढ़ा देती है। डीएवी कॉलेज से पासआउट कई स्टूडेंट्स जोकि आज नामी मल्टी नेशनल कंपनियों में लाखों का पैकेज कमा रहे है या फिर आईएएस व आईपीएस बन चुके है। वह भी इस जायके के मुरीद है।
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जब कभी भी उन लोगों का डीएवी कॉलेज के सामने से गुजरना होता है, तो वह यहां रुक कर श्यामलाल के छोले-कुलचे खाना नहीं भूलते।
श्यामलाल की नई पीढ़ी अब इस जायके को लोगों तक पहुंचा रही है। गोपाल (16) ने बताया कि पहले उनके नाना श्यामलाल छोले-कुलचे की दुकान लगाते थे। उसके बाद उनके मामा बीरपाल ने इस दुकान को संभाला और अब मैं इस दुकान को संभाल रहा हूं।
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डीएवी कॉलेज के सामने श्यामलाल लगभग 48 साल से पीढ़ी दर पीढ़ी छोले-कुलचे की दुकान लगा रहे हैं। इनके छोले-कुलचे और गुड़ की चटनी का जायका ही ऐसा है कि जिसने एक बार भी इसका स्वाद चखा, तो वह मौका मिलने पर दोबारा स्वाद लेने से चूकता नहीं है।
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श्यामलाल के छोले-कुलचे की खासियत यह है कि वह खुद ही अपने मसाले तैयार करते हैं। जोकि बाजारों में उपलब्ध नहीं होता। वहीं, उनके हाथों से बनी गुड़ की चटनी की इस जायके के स्वाद और बढ़ा देती है। डीएवी कॉलेज से पासआउट कई स्टूडेंट्स जोकि आज नामी मल्टी नेशनल कंपनियों में लाखों का पैकेज कमा रहे है या फिर आईएएस व आईपीएस बन चुके है। वह भी इस जायके के मुरीद है।
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जब कभी भी उन लोगों का डीएवी कॉलेज के सामने से गुजरना होता है, तो वह यहां रुक कर श्यामलाल के छोले-कुलचे खाना नहीं भूलते।
श्यामलाल की नई पीढ़ी अब इस जायके को लोगों तक पहुंचा रही है। गोपाल (16) ने बताया कि पहले उनके नाना श्यामलाल छोले-कुलचे की दुकान लगाते थे। उसके बाद उनके मामा बीरपाल ने इस दुकान को संभाला और अब मैं इस दुकान को संभाल रहा हूं।