{"_id":"6a04e6e62f0dc3a6850cb32d","slug":"checking-in-on-dates-when-will-you-get-treatment-chandigarh-news-c-16-pkl1049-1019158-2026-05-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh News: तारीखों में जांच... कब मिलेगा इलाज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh News: तारीखों में जांच... कब मिलेगा इलाज
विज्ञापन
चंडीगढ़। देशभर से गंभीर बीमारियों के इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों के लिए पीजीआई में अब सबसे बड़ी चुनौती इलाज नहीं बल्कि जांच बन गई है। डॉक्टर मरीज को देखने के बाद एमआरआई, पेट स्कैन, सीटी स्कैन और गामा नाइफ जैसी जरूरी जांच लिख तो रहे हैं लेकिन इनकी तारीख 5 से 6 महीने बाद मिल रही है। कैंसर और न्यूरो जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज जांच के इंतजार में बीमारी बढ़ने का खतरा झेल रहे हैं। न चाहते हुए गरीब और जरूरतमंद मरीज कर्ज लेकर निजी सेंटरों में महंगी जांच कराने को मजबूर हैं।
पीजीआई में मौजूदा समय में एमआरआई की पांच मशीनें संचालित हो रही हैं। इनमें एक ओपीडी ब्लॉक, एक कार्डियक सेंटर, एक ट्रॉमा सेंटर और दो रेडियोडायग्नोसिस विभाग में लगी हैं। संस्थान में प्रतिदिन 80 से 90 मरीजों की एमआरआई की जा रही है लेकिन मरीजों को जांच के लिए पांच से छह महीने बाद की तारीख दी जा रही है। एमआरआई के लिए प्रति रीजन 2500 रुपये शुल्क तय है। गामा नाइफ और न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग से जुड़े जांच जैसे पेट स्कैन के लिए भी 6 महीने बाद की डेट मिल रही है। पीजीआई में सीटी स्कैन की पांच मशीनें हैं और एक नई मशीन इंस्टॉल होने की तैयारी चल रही है। इसके बावजूद मरीजों की संख्या और उपलब्ध संसाधनों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। कैंसर और गंभीर रोगियों को भी प्राथमिकता देने का दावा किया जा रहा है। वेटिंग कम करने के लिए नाइट शिफ्ट भी शुरू की गई है लेकिन इसका असर फिलहाल जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा।
जान बचानी है तो जांच करना ही होगा
पंजाब से कैंसर का इलाज कराने आए एक मरीज ने बताया कि उसे पेट स्कैन के लिए छह महीने बाद की डेट दी गई थी। डॉक्टरों ने साफ कहा कि अगर जल्द जांच नहीं हुई तो इलाज में देरी से जान का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में उसने कर्ज लेकर निजी सेंटर में जांच करवाई, तब जाकर इलाज शुरू हो पाया।
विज्ञापन
यही हाल न्यूरो मरीजों का भी है। एक मरीज ने बताया कि न्यूक्लियर मेडिसिन की जांच निजी सेंटर में 19 हजार रुपये खर्च करके करवाई। ये पैसे उन्होंने रिश्तेदार से उधार लेकर करवाना पड़ा जबकि पीजीआई में ये जांच 3 हजार और 7 हजार में की जाती है।
बॉक्स
दावे तमाम... हकीकत कुछ और
स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि पीजीआई लगातार वेटिंग कम होने के दावे कर रहा है। पीजीआई प्रशासन बार-बार कहता है कि पहले जांच की वेटिंग डेढ़ साल तक पहुंच गई थी, जिसे घटाकर अब दो से तीन महीने कर दिया गया है जबकि जमीनी स्तर पर मरीजों को अब भी लंबा इंतजार झेलना पड़ रहा है।
इनसेट-
ऑडिट भी लगा चुकी है आपत्ति
-सेंट्रल ऑडिट टीम ने पीजीआई की जांच व्यवस्था पर सवाल उठाए
-3टी एमआरआई मशीन लंबे समय से खराब पड़ी मिली
-बायबैक प्रक्रिया में 8 महीने 10 दिन का समय बर्बाद हुआ
-मशीन बंद रहने से एमआरआई वेटिंग और बढ़ी
-अपॉइंटमेंट रजिस्टर में रिकॉर्डिंग को लेकर गड़बड़ियां मिलीं
सिर्फ जांच की तारीख दर्ज, तारीख कब जारी हुई इसका रिकॉर्ड नहीं
ऑडिट टीम ने कहा- वेटिंग कम होने के दावों के समर्थन में पुख्ता डेटा नहीं। रिकॉर्ड मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग सिस्टम पर भी सवाल उठे।
कोट- आपको इस बारे में बताता हूं। (let u know)
-पंकज राय, डीडीए पीजीआई
विज्ञापन
पीजीआई में मौजूदा समय में एमआरआई की पांच मशीनें संचालित हो रही हैं। इनमें एक ओपीडी ब्लॉक, एक कार्डियक सेंटर, एक ट्रॉमा सेंटर और दो रेडियोडायग्नोसिस विभाग में लगी हैं। संस्थान में प्रतिदिन 80 से 90 मरीजों की एमआरआई की जा रही है लेकिन मरीजों को जांच के लिए पांच से छह महीने बाद की तारीख दी जा रही है। एमआरआई के लिए प्रति रीजन 2500 रुपये शुल्क तय है। गामा नाइफ और न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग से जुड़े जांच जैसे पेट स्कैन के लिए भी 6 महीने बाद की डेट मिल रही है। पीजीआई में सीटी स्कैन की पांच मशीनें हैं और एक नई मशीन इंस्टॉल होने की तैयारी चल रही है। इसके बावजूद मरीजों की संख्या और उपलब्ध संसाधनों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। कैंसर और गंभीर रोगियों को भी प्राथमिकता देने का दावा किया जा रहा है। वेटिंग कम करने के लिए नाइट शिफ्ट भी शुरू की गई है लेकिन इसका असर फिलहाल जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा।
विज्ञापन
जान बचानी है तो जांच करना ही होगा
पंजाब से कैंसर का इलाज कराने आए एक मरीज ने बताया कि उसे पेट स्कैन के लिए छह महीने बाद की डेट दी गई थी। डॉक्टरों ने साफ कहा कि अगर जल्द जांच नहीं हुई तो इलाज में देरी से जान का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में उसने कर्ज लेकर निजी सेंटर में जांच करवाई, तब जाकर इलाज शुरू हो पाया।
विज्ञापन
यही हाल न्यूरो मरीजों का भी है। एक मरीज ने बताया कि न्यूक्लियर मेडिसिन की जांच निजी सेंटर में 19 हजार रुपये खर्च करके करवाई। ये पैसे उन्होंने रिश्तेदार से उधार लेकर करवाना पड़ा जबकि पीजीआई में ये जांच 3 हजार और 7 हजार में की जाती है।
बॉक्स
दावे तमाम... हकीकत कुछ और
स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि पीजीआई लगातार वेटिंग कम होने के दावे कर रहा है। पीजीआई प्रशासन बार-बार कहता है कि पहले जांच की वेटिंग डेढ़ साल तक पहुंच गई थी, जिसे घटाकर अब दो से तीन महीने कर दिया गया है जबकि जमीनी स्तर पर मरीजों को अब भी लंबा इंतजार झेलना पड़ रहा है।
इनसेट-
ऑडिट भी लगा चुकी है आपत्ति
-सेंट्रल ऑडिट टीम ने पीजीआई की जांच व्यवस्था पर सवाल उठाए
-3टी एमआरआई मशीन लंबे समय से खराब पड़ी मिली
-बायबैक प्रक्रिया में 8 महीने 10 दिन का समय बर्बाद हुआ
-मशीन बंद रहने से एमआरआई वेटिंग और बढ़ी
-अपॉइंटमेंट रजिस्टर में रिकॉर्डिंग को लेकर गड़बड़ियां मिलीं
सिर्फ जांच की तारीख दर्ज, तारीख कब जारी हुई इसका रिकॉर्ड नहीं
ऑडिट टीम ने कहा- वेटिंग कम होने के दावों के समर्थन में पुख्ता डेटा नहीं। रिकॉर्ड मेंटेनेंस और मॉनिटरिंग सिस्टम पर भी सवाल उठे।
कोट- आपको इस बारे में बताता हूं। (let u know)
-पंकज राय, डीडीए पीजीआई