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चंडीगढ़ के छात्रों ने बनाया विशेष उपकरण, पीपीई किट पहनने के बाद नहीं लगेगी गर्मी
Sun, 30 May 2021 04:37 AM IST
दुष्यंत शर्मा
आशीष वर्मा, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, चंडीगढ़
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 30 May 2021 04:37 AM IST
सार
- पावर्ड एयर प्यूरीफाइंग रेस्पीरेटर डिवाइस लगाने से पसीने व घुटन से मिलती है निजात
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- फोटो : ani
विस्तार
शहर के दो छात्रों ने अपने प्रोफेसर के साथ मिलकर एक ऐसा उपकरण बनाया है, जो पीपीई किट पहनने के बाद गर्मी से राहत दिलाता है। इस डिवाइस को पीपीई किट पहनने के दौरान लगाया जाता है। यह मुख्य रूप से किट के अंदर वेंटिलेशन का काम करता है, जो डॉक्टरों को पसीने व घुटन से बचाता है। डिवाइस के अंदर स्थापित पंखा बाहर की हवा को फिल्टर करके किट के अंदर भेजता है और अंदर पाइप के माध्यम से हेलमेट से बाहर निकल जाती है। पूरी प्रक्र्रिया के दौरान पीपीई किट के अंदर हवा का प्रवाह बना रहता है, जिससे पीपीई किट पहनने के बाद गर्मी नहीं लगती।
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बैटरी से संचालित डिवाइस का पेटेंट फाइल हो चुका है। जल्द ही इसे डॉक्टरों को भी मुहैया करवा दिया जाएगा। पेक से पीएचडी कर रहे शगुन शर्मा व पेक से पासआउट अमन राणा ने बताया कि वे अक्सर सुनते थे कि पीपीई किट पहनने के बाद डाक्टरों व हेल्थ वर्करों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। हवा का सोर्श नहीं मिलने से पीपीई किट को पहनने के बाद काफी गर्मी व घुटन महसूस होती थी।
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इससे निजात पाने के लिए दोनों छात्रों ने अपने प्रोफेसर डा. जगदीश सिंह की मदद से एक पॉवर्ड एयर प्यूरीफाइंग रेस्पीरेटर डिवाइस बनाया। इसमें एक पंखे और फिल्टर का इस्तेमाल किया गया है। इस डिवाइस को पीठ की तरफ बेल्ट के साथ पीपीई किट के ऊपर लगाया जाता है। अंदर एक पाइप है जो हेल्मेट के साथ जुड़ा होता है। डिवाइस के चालू होते ही हवा का प्रवाह का शुरू हो जाता है। एक बार चार्ज होने के बाद बैटरी छह से सात घंटे चलती है।
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शगुन के मुताबिक इस डिवाइस को बनाने में उनके मेंटर फ्लाइंग लेफ्टिनेंट रंजीत चौहान, पीजीआई के ओरल हेल्थ साइंस के प्रोफेसर डा. विद्यारतन, पेक में इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट डिजाइन के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. जगजीत सिंह रंधावा, पेक से पास आउट एमटेक डिग्री धारक अमन राणा का विशेष योगदान रहा है।
पीजीआई डॉक्टर के अनुभव के आधार पर करते रहे सुधार
शगुन ने बताया कि डिवाइस बनाने के बाद पीजीआई के ओरल हेल्थ साइंस के डाक्टर विद्यारतन ने इसे अपने पीपीई किट में लगाया है। वे पिछले तीन महीने से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके अनुभव के आधार पर छात्र इसमें लगातार सुधार कर रहे थे। जैसा डाक्टर बताते थे, उसके आधार पर छात्र डिवाइस को अपडेट करते रहे। तीन से चार महीने की मेहनत के बाद यह डिवाइस अब पूरी तरह से तैयार हो चुकी है। इसका पेटेंट फाइल होने के साथ अब इसे भामा परमाणु अनुसंधान केंद्र को भेजा जा रहा है, ताकि इसे सर्टिफिकेशन हो सके।
पहली लहर में बांटे थे फेस शील्ड
शगुन शर्मा पेक से इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट डिजाइन में पीएचडी कर रहे हैं। कोरोना की पहली लहर में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर सैकड़ों फेस शील्ड बनाए थे। इस फेस शील्ड को उन्होंने सब्जी विक्रेता, सिक्योरिटी गार्ड, डाक्टर व हेल्थ वर्करों को बांटे थे। उनका कहना है कि उनके गुरुजनों से उन्हें जो भी शिक्षा मिली है, वे इसका इस्तेमाल लोगों की मुश्किलों का समाधान खोजने में करते हैं।