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नोटबंदी से मंद हुई नारों की गूंज, उम्मीदवार नहीं कर पा रहे खुलकर खर्च
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 06 Dec 2016 12:46 AM IST
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पेड वर्कर्स की जगह रिश्तेदार और दोस्त कर रहे प्रचार
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नोटबंदी का असर निगम चुनाव के प्रचार पर साफ दिख रहा है। न तो पहले की तरह इस बार प्रचार में समर्थकों की लंबी कतार है, न ही ज्यादा पोस्टरबाजी। उम्मीदवारों को डोनेशन भी नहीं मिल पा रहा। यही नहीं नारों की गूंज भी मंद पड़ गई है। समर्थक भी खर्च करने से कतरा रहे हैं क्योंकि कैश की किल्लत है।
पदयात्रा में चलने वाले समर्थक भी कम हो गए हैं। ऐसे में डोर टू डोर प्रचार के लिए उम्मीदवार अपने रिश्तेदारों, परिवार के सदस्यों, दोस्तों और पार्टी नेताओं को ही साथ लेकर जा रहे हैं। कई उम्मीदवारों ने तो दूसरे राज्यों से अपने रिश्तेदारों को बुला लिया है।
नोटबंदी के कारण कई उम्मीदवार ढोल बजाने के लिए भी मंगवा नहीं पा रहे हैं। चुनाव आयोग ने हर उम्मीदवार के लिए तीन लाख 25 हजार रुपये खर्च करने की सीमा तय की है, जबकि शहर में कई सीटें ऐसी हैं, जिनके उम्मीदवारों ने 2011 के निगम चुनाव में 20 से 30 लाख भी खर्च किया था। कैश बांटने का खेल भी चुनाव में खूब होता था, जोकि इस बार नहीं हो पाएगा। अधिकतर उम्मीदवारों ने सिर्फ एक ही चुनावी कार्यालय बनाया है।
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पदयात्रा में चलने वाले समर्थक भी कम हो गए हैं। ऐसे में डोर टू डोर प्रचार के लिए उम्मीदवार अपने रिश्तेदारों, परिवार के सदस्यों, दोस्तों और पार्टी नेताओं को ही साथ लेकर जा रहे हैं। कई उम्मीदवारों ने तो दूसरे राज्यों से अपने रिश्तेदारों को बुला लिया है।
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नोटबंदी के कारण कई उम्मीदवार ढोल बजाने के लिए भी मंगवा नहीं पा रहे हैं। चुनाव आयोग ने हर उम्मीदवार के लिए तीन लाख 25 हजार रुपये खर्च करने की सीमा तय की है, जबकि शहर में कई सीटें ऐसी हैं, जिनके उम्मीदवारों ने 2011 के निगम चुनाव में 20 से 30 लाख भी खर्च किया था। कैश बांटने का खेल भी चुनाव में खूब होता था, जोकि इस बार नहीं हो पाएगा। अधिकतर उम्मीदवारों ने सिर्फ एक ही चुनावी कार्यालय बनाया है।
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डोनेशन में पुराने नोट लेने से किया इंकार
पेड वर्कर्स की जगह रिश्तेदार और दोस्त कर रहे प्रचार
सुबह और शाम को प्रचार
नोटबंदी के कारण अधिकतर मतदाता बैंकों की लाइनों में लगे हैं। ऐसे में उम्मीदवारों ने प्रचार का समय भी बदल दिया है। अब काफी कम उम्मीदवार दोपहर के समय प्रचार करने जाते हैं क्योंकि दोपहर में अधिकर लोग बैंकों की लाइनों में ही लग रहे हैं। ऐसे में उम्मीदवार सुबह 7 से 10 और शाम 5 बजे के बाद डोर टू डोर प्रचार कर रहे हैं।
डोनेशन में पुराने नोट लेने से किया इंकार
हर निगम चुनाव में उम्मीदवारों को अपने दोस्तों और जानकारों से डोनेशन भी मिलती थी, लेकिन इस बार नाममात्र ही डोनेशन मिल रही है। एक उम्मीदवार के अनुसार एक व्यक्ति ने पुराने नोट डोनेशन में देने का ऑफर किया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया गया। जबकि कांग्रेस और भाजपा को भी हाईकमान की ओर से निर्देश आया है कि डोनेशन में पुराने नोट न लिए जाएं।
चुनाव का मुद्दा भी बना नोटबंदी
इस बार निगम चुनाव में नोटबंदी का मुद्दा भी काफी अहम है। कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ बसपा भी नोटबंदी के मुद्दे को उछालकर वोट बटोरने में लगी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा का कहना है कि नोटबंदी से पूरा शहर परेशान है। लोग काम छोड़कर बैंकों की लाइनों में घंटों बिता रहे हैं। बेटियों की शादियां नहीं हो रही हैं। बच्चों की पढ़ाई छूट रही है। छोटे उद्योगों से कर्मचारियों को निकाला जा रहा है।
भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन का कहना है कि शहर के मतदाता कांग्रेस के दुष्प्रचार के प्रभाव में आने वाले नहीं हैं। नोटबंदी सिर्फ कांग्रेस द्वारा मुद्दा बनाया जा रहा है, जबकि नोटबंदी के फैसले से शहरवासी खुश हैं। लोगों को भी पता है कि यह थोड़े समय की परेशानी है, उसके बाद मध्यम और गरीब लोगों को ही फायदा मिलेगा। नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। यह चंडीगढ़ के लोग जानते हैं।
बसपा अध्यक्ष जगीर सिंह का कहना है कि नोटबंदी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों राजनीति कर रही हैं। जबकि लोगों को परेशानी से मुक्ति दोनों दल ही नहीं दिलवाना चाहते हैं। गरीब और मजदूर लोगों को काम भी नहीं मिल रहा है। कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर चुनाव हार चुकी हैं।
नोटबंदी के कारण अधिकतर मतदाता बैंकों की लाइनों में लगे हैं। ऐसे में उम्मीदवारों ने प्रचार का समय भी बदल दिया है। अब काफी कम उम्मीदवार दोपहर के समय प्रचार करने जाते हैं क्योंकि दोपहर में अधिकर लोग बैंकों की लाइनों में ही लग रहे हैं। ऐसे में उम्मीदवार सुबह 7 से 10 और शाम 5 बजे के बाद डोर टू डोर प्रचार कर रहे हैं।
डोनेशन में पुराने नोट लेने से किया इंकार
हर निगम चुनाव में उम्मीदवारों को अपने दोस्तों और जानकारों से डोनेशन भी मिलती थी, लेकिन इस बार नाममात्र ही डोनेशन मिल रही है। एक उम्मीदवार के अनुसार एक व्यक्ति ने पुराने नोट डोनेशन में देने का ऑफर किया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया गया। जबकि कांग्रेस और भाजपा को भी हाईकमान की ओर से निर्देश आया है कि डोनेशन में पुराने नोट न लिए जाएं।
चुनाव का मुद्दा भी बना नोटबंदी
इस बार निगम चुनाव में नोटबंदी का मुद्दा भी काफी अहम है। कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ बसपा भी नोटबंदी के मुद्दे को उछालकर वोट बटोरने में लगी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा का कहना है कि नोटबंदी से पूरा शहर परेशान है। लोग काम छोड़कर बैंकों की लाइनों में घंटों बिता रहे हैं। बेटियों की शादियां नहीं हो रही हैं। बच्चों की पढ़ाई छूट रही है। छोटे उद्योगों से कर्मचारियों को निकाला जा रहा है।
भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन का कहना है कि शहर के मतदाता कांग्रेस के दुष्प्रचार के प्रभाव में आने वाले नहीं हैं। नोटबंदी सिर्फ कांग्रेस द्वारा मुद्दा बनाया जा रहा है, जबकि नोटबंदी के फैसले से शहरवासी खुश हैं। लोगों को भी पता है कि यह थोड़े समय की परेशानी है, उसके बाद मध्यम और गरीब लोगों को ही फायदा मिलेगा। नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। यह चंडीगढ़ के लोग जानते हैं।
बसपा अध्यक्ष जगीर सिंह का कहना है कि नोटबंदी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों राजनीति कर रही हैं। जबकि लोगों को परेशानी से मुक्ति दोनों दल ही नहीं दिलवाना चाहते हैं। गरीब और मजदूर लोगों को काम भी नहीं मिल रहा है। कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर चुनाव हार चुकी हैं।