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लिटरेचर फेस्टिवल का दूसरा दिन: कानून, नारीवाद और शब्दों के महत्व पर हुई चर्चा
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 12 Nov 2016 01:13 AM IST
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लिटरेचर फेस्टिवल का दूसरा दिन
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‘मैं लेखक पहले और पुलिस वाला बाद में बना। इस पेशे दौरान मुझे लिखते समय डर लगता था। लेकिन 5-6 साल इस पेशे में रहने के बाद मेरा डर खत्म हो गया, कैसे? क्योंकि हमारे रूलर्स, पढ़ते ही नहीं हैं। साहित्य उनकी प्रायोरिटी में कहीं आता ही नहीं है।’
यह बात कही ‘हाशिमपुरा 22 मई’ और शहर में कर्फ्यू जैसी चर्चित कृतियां देने वाले पेशे से पुलिस अफसर विभूति नारायण राय का। वह शुक्रवार को चंडीगढ़ क्लब में अदब फाउंडेशन द्वारा आयोजित चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल 2016 में शामिल होने आए थे। फेस्टिवल के दूसरे दिन कानून, नारीवाद और शब्दों के महत्व पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा,‘ मेरे साथ काम करने वालों को यह पता था कि मैं कुछ लिखता हूं लेकिन क्या लिखता हूं यह पता नहीं था। वे मुझे कवि कहते थे।’
कार्यक्रम के दौरान राय के साथ बातचीत की मुंबई मिरर की एडिटर मीना बघेल ने। इस दौरान उन्होंने 1987 के हाशिमपुरा कांड के बारे में बात करते हुए कहा कि यह केस 28 साल तक चला और यह ऐसा केस था जिसे कानून, मीडिया और जुडीशियरी सुलझाने में असफल रहीं। हाशिमपुरा केस के अलावा उन्होंने भागलपुर, 1984 के सिख दंगों पर भी बात की। समाज को बदलने में बदलाव के लिए उन्होंने पुलिस के साथ-साथ लोगों को भी सकारात्मक सोच अपनाने की सलाह दी।
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गुरदयाल सिंह को दी श्रद्धांजलि
45 मिनट के इस सेशन के बाद पंजाबी लेखक गुरदयाल सिंह को श्रद्धांजलि दी गई। इस सेशन में जीएनडीयू के प्रोफेसर तेजवंत गिल और प्रोफेसर राणा नैयर ने लेखक गुरदयाल सिंह को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद नीलाभ अश्क को राहुल सोनी, अपूर्वानंद और भूमिका द्विवेदी ने श्रद्धांजलि दी। नीलाभ अश्क को अरुंधति रॉय, सलमान रुश्दी विलियम शेक्सपीयर जैसे लेखकों की लेखनी को ट्रांसलेट करने के लिए जाना जाता है।
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यह बात कही ‘हाशिमपुरा 22 मई’ और शहर में कर्फ्यू जैसी चर्चित कृतियां देने वाले पेशे से पुलिस अफसर विभूति नारायण राय का। वह शुक्रवार को चंडीगढ़ क्लब में अदब फाउंडेशन द्वारा आयोजित चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल 2016 में शामिल होने आए थे। फेस्टिवल के दूसरे दिन कानून, नारीवाद और शब्दों के महत्व पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा,‘ मेरे साथ काम करने वालों को यह पता था कि मैं कुछ लिखता हूं लेकिन क्या लिखता हूं यह पता नहीं था। वे मुझे कवि कहते थे।’
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कार्यक्रम के दौरान राय के साथ बातचीत की मुंबई मिरर की एडिटर मीना बघेल ने। इस दौरान उन्होंने 1987 के हाशिमपुरा कांड के बारे में बात करते हुए कहा कि यह केस 28 साल तक चला और यह ऐसा केस था जिसे कानून, मीडिया और जुडीशियरी सुलझाने में असफल रहीं। हाशिमपुरा केस के अलावा उन्होंने भागलपुर, 1984 के सिख दंगों पर भी बात की। समाज को बदलने में बदलाव के लिए उन्होंने पुलिस के साथ-साथ लोगों को भी सकारात्मक सोच अपनाने की सलाह दी।
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गुरदयाल सिंह को दी श्रद्धांजलि
45 मिनट के इस सेशन के बाद पंजाबी लेखक गुरदयाल सिंह को श्रद्धांजलि दी गई। इस सेशन में जीएनडीयू के प्रोफेसर तेजवंत गिल और प्रोफेसर राणा नैयर ने लेखक गुरदयाल सिंह को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद नीलाभ अश्क को राहुल सोनी, अपूर्वानंद और भूमिका द्विवेदी ने श्रद्धांजलि दी। नीलाभ अश्क को अरुंधति रॉय, सलमान रुश्दी विलियम शेक्सपीयर जैसे लेखकों की लेखनी को ट्रांसलेट करने के लिए जाना जाता है।
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लिटरेचर फेस्टिवल का दूसरा दिन
धरती का नरक है फीरोजाबाद: अशोक कृष्ण कुमार
इसके बाद ‘चूड़ी बजार में लड़की’ पुस्तक के लेखक अशोक कृष्ण कुमार का सेशन हुआ जिसे आलोचक अपूर्वानंद ने बातचीत की। इस मौके पर लेखक अशोक कृष्ण कुमार बताते हैं कि उन्हें इस पुस्तक को लिखने में 10 साल लगे। यह पुस्तक फीरोजाबाद की धरती, जिसे धरती का नरक कहा जाता है वहां के कारखानों में एक मोमबत्ती की रोशनी में चूड़ियां बना रहे बच्चों की कहानी बयां करती है। वह बताते हैं कि आज तक ज्यादातर संतों फकीरों ने, कई लेखकों ने औरतों के खिलाफ लिखा।
लेकिन अगर उसकी मेहनत, उसकी भावनाओं की बात की जाए तो वह किसी अभिमन्यु से कम नहीं है। एक लड़की अभिमन्यु की तरह जिंदगी के चक्कर से लड़ती रहती है। हिंदी इंग्लिश के पाठकों पर बात करते हुए वह कहते हैं कि ‘यह सच है कि आज हिंदी और इंग्लिश के पाठकों का पाड़ा बढ़ चुका है। एक तरह से कहा जा सकता है कि उत्तर भारत में भाषा का बंटवारा हो चुका है, इसमें कुछेक भूमिका हमारी शिक्षा प्रणाली ने भी अपनाई है।’
फिल्मों की फैक्टरी नहीं बनाना चाहता: शूजीत सरकार
फेस्टिवल के पहले दिन का समापन पीकू, मद्रास कैफे जैसी फिल्मों के डायरेक्टर शूजीत सरकार और आलोचक नोनिका सिंह के बीच बातचीत से हुआ। जहां शूजीत सरकार ने बताया कि उनको फिल्मों के आइडिया समाज में घट रही घटनाओं से ही मिलती हैं। उन्होंने कहा कि ‘मैं फिल्मों की फैक्टरी नहीं बनाना चाहता, मैं ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं जिसका कोई अर्थ हो जो मेरे दिल को छूए। अगर कोई मेरी फिल्म को देखने आ रहा है तो अपने साथ कुछ लेकर जाए। ’
इसके बाद ‘चूड़ी बजार में लड़की’ पुस्तक के लेखक अशोक कृष्ण कुमार का सेशन हुआ जिसे आलोचक अपूर्वानंद ने बातचीत की। इस मौके पर लेखक अशोक कृष्ण कुमार बताते हैं कि उन्हें इस पुस्तक को लिखने में 10 साल लगे। यह पुस्तक फीरोजाबाद की धरती, जिसे धरती का नरक कहा जाता है वहां के कारखानों में एक मोमबत्ती की रोशनी में चूड़ियां बना रहे बच्चों की कहानी बयां करती है। वह बताते हैं कि आज तक ज्यादातर संतों फकीरों ने, कई लेखकों ने औरतों के खिलाफ लिखा।
लेकिन अगर उसकी मेहनत, उसकी भावनाओं की बात की जाए तो वह किसी अभिमन्यु से कम नहीं है। एक लड़की अभिमन्यु की तरह जिंदगी के चक्कर से लड़ती रहती है। हिंदी इंग्लिश के पाठकों पर बात करते हुए वह कहते हैं कि ‘यह सच है कि आज हिंदी और इंग्लिश के पाठकों का पाड़ा बढ़ चुका है। एक तरह से कहा जा सकता है कि उत्तर भारत में भाषा का बंटवारा हो चुका है, इसमें कुछेक भूमिका हमारी शिक्षा प्रणाली ने भी अपनाई है।’
फिल्मों की फैक्टरी नहीं बनाना चाहता: शूजीत सरकार
फेस्टिवल के पहले दिन का समापन पीकू, मद्रास कैफे जैसी फिल्मों के डायरेक्टर शूजीत सरकार और आलोचक नोनिका सिंह के बीच बातचीत से हुआ। जहां शूजीत सरकार ने बताया कि उनको फिल्मों के आइडिया समाज में घट रही घटनाओं से ही मिलती हैं। उन्होंने कहा कि ‘मैं फिल्मों की फैक्टरी नहीं बनाना चाहता, मैं ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं जिसका कोई अर्थ हो जो मेरे दिल को छूए। अगर कोई मेरी फिल्म को देखने आ रहा है तो अपने साथ कुछ लेकर जाए। ’