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Haryana: हरियाणा में धराशायी हुए जातीय कारक, लोकसभा चुनाव में नहीं चला जाट और गैर जाट का मुद्दा

Sat, 08 Jun 2024 03:01 PM IST
निवेदिता वर्मा सोमदत्त शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
सोमदत्त शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 08 Jun 2024 03:01 PM IST
सार

चुनावी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस बार हरियाणा के मतदाताओं ने नेताओं द्वारा चलाए जाने वाले जातिगत फैक्टर को नकार दिया है। खासकर जाट और गैर जाट का मुद्दा प्रदेश की किसी भी सीट पर हावी नहीं रहा। जाट प्रत्याशियों को गैर जाट के खूब वोट मिले और गैर जाट प्रत्याशियों पर जाट मतदाताओं ने जीत दिलाने में अहम रोल अदा किया। 

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caste factors were on line in Haryana Lok Sabha elections
भाजपा और कांग्रेस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव में हरियाणा में इस बार जातीय कारक धरे के धरे रह गए। पहली बार यहां जाट और गैर जाट का फैक्टर काम नहीं कर पाया, बल्कि हरियाणा के मतदाताओं ने दिल खोलकर हरियाणा एक-हरियाणवी एक की परपंरा को आगे बढ़ाते हुए एक दूसरे जाति के प्रत्याशियों को वोट दिए हैं। 
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चुनावी विशलेषक धमेंद्र कंवारी का कहना है कि मतदाता अब पहले से जागरूक हो गया है। इस बार लोगों ने जातिवाद से ऊपर उठकर मतदान किया है और यह अच्छी परंपरा है। मतदाताओं ने स्थानीय चेहरों और केंद्रीय चेहरों को देखते हुए ही वोट दिए। साथ ही क्षेत्रीय दलों को नकारते हुए राष्ट्रीय दलों पर विश्वास जताया है।
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लोकसभा चुनावों के परिणाम का आंकलन करें 2019 में हुए चुनावों में जातिगत समीकरणों का पूरा असर पड़ा था। इसी फैक्टर के चलते भाजपा को दसों लोकसभा सीटों पर जीत मिली। इस बार कांग्रेस की ओर से भाजपा के 6 प्रत्याशियों के सामने उसी जाति के प्रत्याशी उतार देने से समीकरण गड़बड़ा गए और संबंधित जाति के मतदाता बंट गए। इसलिए किसी एक जाति का पूरा वोट बैंक सीधे तौर पर एक पार्टी को नहीं मिल पाया।
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दीपेंद्र हुड्डा अहीरवाल में भी जीते
रोहतक सीट पर कांग्रेस के दीपेंद्र हुड्डा को न केवल अपनी जाट लैंड पर भारी बहुमत मिला, बल्कि अहीरवाल की सीट कोसली में भी उनको अहीरों के दिल खोलकर वोट मिले। पिछली बार इसी विधानसभा सीट से दीपेंद्र हुड्डा को 74 हजार से अधिक वोटों से हार मिली थी। इस बार वह भाजपा के अरविंद शर्मा से यहां से 2 वोटों से आगे रहे। वहीं, झज्जर में भी 12 प्रतिशत से अधिक मतदाता यादव समाज से हैं और यहां से दीपेंद्र को 46 हजार की लीड मिली है। ब्राह्मण समाज, सैनी समाज और अनुसूचित जाति के मतदाताओं ने भी जाट चेहरे दीपेंद्र को खूब समर्थन दिया।

जाट और एससी मतदाताओं ने तय की ब्रह्मचारी की जीत
सोनीपत की जाटलैंड धरती पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही प्रत्याशी ब्राह्मण समाज से थे। भाजपा को मोहन लाल बड़ौली को अपने समाज के खूब वोट मिले। इनके यहां पर कांग्रेस के सतपाल ब्रह्मचारी की जीत जाट समाज के मतदाताओं ने सिरे लगाई। यहां जाट समाज और अनुसूचित जाति के मतदाताओं के गठजोड़ ने भाजपा के प्रत्याशी बड़ौली की जीत के रास्ते बंद किए। ब्रह्मचारी को गोहाना और जींद में अग्रवाल समाज का खूब समर्थन मिला। खास बात ये है कि पिछली बार जाटलैंड जींद में भूपेंद्र सिंह हुड्डा 99 हजार मतों से हारे थे, लेकिन यहां पर ब्रह्मचारी को 20 हजार से अधिक की लीड मिली है।

राव दान सिंह को नहीं मिले अपनी ही जाति के वोट, जाटलैंड में जीते
भिवानी सीट पर कांग्रेस ने जातिगत समीकरणों को देखते हुए भाजपा के जाट चेहरे धर्मबीर सिंह के सामने श्रुति चौधरी की टिकट काटकर राव दान सिंह को मैदान में उतारा था। कांग्रेस को उम्मीद थी कि हुड्डा के चेहरे पर जाट और राव दान सिंह चेहरे पर अहीर वोट बैंक मिलेगा, लेकिन कांग्रेस का यह दांव उल्टा पड़ गया। राव दान सिंह अपने ही हलके महेंद्रगढ़ में हार गए, जबकि भिवानी जिले के विधानसभा सीटों पर उन्होंने जीत दर्ज की। इनमें बाढ़ड़ा, लौहारू और चरखीदादरी विधानसभा आती हैं। वहीं, जातिगत फेक्टर को दरकिनार करते हुए अहीरवाल ने चौधरी धर्मबीर को अटेली, महेंद्रगढ़, नारनौल और नांगल चौधरी में एक तरफा जीत दिलाई।

मराठा को रोड़ और अभय को नहीं मिला जाटों का साथ
करनाल से एनसीपी के उम्मीदवार वीरेंद्र मराठा अपने रोड़ समाज के दम पर मैदान में उतरे थे, लेकिन समाज ने उनको सिरे से नकार दिया। यहां पर समाज के 1.75 लाख मतदाता हैं, लेकिन मराठा को मात्र 30 हजार वोटों से सब्र करना पड़ा। मराठा द्वारा पंजाबी समाज को लेकर की गई विवादित टिप्पणी से पंजाबी समाज एकजुट हो गया और मनोहर लाल की जीत तय की। दूसरा, कुरुक्षेत्र में सबसे अधिक जाट वोट बैंक 4.50 लाख मतदाता हैं। इन्हीं को देखते हुए इनेलो के अभय चौटाला कुरुक्षेत्र के रण में उतरे थे, लेकिन जाटों ने उन पर विश्वास नहीं जताया। जाट बाहुल विधानसभाओं में आप पार्टी के प्रत्याशी डा. सुशील गुप्ता और नवीन जिंदल को लीड मिली है। इसलिए यहां भी मतदाताओं ने जाति को देखकर वोट नहीं दिए।

यहां सामान्य और एससी मतदाताओं ने तय की जीत
आरक्षित अंबाला और सिरसा की सीटों की बात करें तो इन दोनों ही सीटों पर अनुसूचित जाति और सामान्य जाति के मतदाताओं ने खुलकर कांग्रेस का वोट दिए। सिख, जाट और एससी मतदाताओं की एकजुटता ने दोनों सीटें कांग्रेस के खाते में डाल दी। हालांकि, भाजपा की बंतो कटारिया और अशोक तंवर को पिछड़ा वर्ग और सामान्य श्रेणी की जातियों के भी वोट मिले, लेकिन इनका प्रतिशत कम रहा। हिसार सीट पर तमाम बड़े प्रत्याशी जाट चेहरे थे, लेकिन यहां पर भी बिशनोई समाज, पिछड़ा समाज और एससी समाज ने कांग्रेस को वोट देकर अपने हलकों में लीड दिलाई।


मुस्लिम बाहुल इलाकों में बब्बर की बढ़त
गुरुग्राम लोकसभा सीट पर इस बार उल्टफेर रहा। राव इंद्रजीत सिंह अहीरवाल के गढ़ में पहले के मुकाबले कमजोर पड़ते नजर आए। पिछली बार के मुकाबले बावल और रेवाड़ी हलके में 22 हजार और 36 हजार वोटों से ही लीड मिली। गुरुग्राम शहर और जाट बाहुल बादशाहपुर विधानसभा सीट से राव को बढ़त मिली तब जाकर वह राज बब्बर से अपनी सीट बचा पाए। राज बब्बर को पंजाबी, पिछड़ा वर्ग और खासकर मुस्लिम समाज के अधिक वोट मिले। मेवात जिले की तीनों विधानसभा सीटों नूंह, फिरोजपुर झिरका और पुन्हाना में राज बब्बर को एकतरफा जीत मिली।
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