इनेलो के वजूद पर सियासी संकट, बसपा से भी पिछड़ी, यहां जानिए- कैसे गिरता गया पार्टी का ग्राफ
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हरियाणा की सियासत में अपना बड़ा दखल रखने वाली इंडियन नेशनल लोकदल आज बहुत ही बुरे दौर से गुजर रही है। इनेलो बड़े सियासी संकट से घिरी हुई है और इस विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के वजूद को भी खतरा बन गया है।
इस विधानसभा चुनाव की समीक्षा करें तो इस बार प्रदेश की बड़ी क्षेत्रीय पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल सूबे में इस बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से भी पिछड़ गई है। जबकि इस चुनाव में बसपा का प्रदर्शन इनेलो से कई ज्यादा बेहतर रहा है।
अक्टूबर 2018 में इनेलो को उस वक्त बड़ा झटका लगा था, जब अपनों ने ही बगावत शुरू कर दी थी। इनेलो सुप्रीमो एवं पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला ने अपनी अलग सियासी राह पकड़ ली और इनेलो से अलग जननायक जनता पार्टी का गठन कर लिया। जजपा का उदय इनेलो के लिए एक बड़ी सियासी हानि थी।
अजय खुद तो जेल में रहे, लेकिन उनके बेटे दुष्यंत चौटाला ने जजपा को खड़ा करने में जीतोड़ मेहनत की। नतीजा यह रहा कि इस विधानसभा चुनाव में जजपा अपने दस विधायक बनाने में भी कामयाब रही और इनेलो सिर्फ एक विधायक तक ही सिमटकर रह गई।
इनेलो को विघटन के बाद पहला झटका जींद उपचुनाव में लगा। जींद उपचुनाव से पहले इनेलो ने बसपा के साथ गठबंधन भी किया। मगर बावजूद इसके इनेलो को इस उपचुनाव में हार मिली। जबकि जींद इनेलो का ही गढ़ था और यहां से उन्हीं के विधायक हरिचंद मिड्डा के निधन के बाद ही जनवरी 2019 में उपचुनाव हुआ था।
जींद सीट हाथ से गंवाना इनेलो के लिए दूसरा झटका था। उसके बाद ‘अपनों’ का साथ खो चुकी इनेलो ने खुद को मई 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयार किया। लेकिन इससे पहले बसपा ने इनेलो का साथ छोड़ दिया।
इनेलो ने अकेले ही मई 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर करारी शिकस्त मिली। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 10 में से 2 सीटें जीतनी वाली इनेलो के खाते में इस बार एक भी सीट न आई। लड़खड़ाई इनेलो ने लोकसभा के बाद अक्टूबर 2019 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू की।
इस चुनाव में इनेलो को शिरोमणी अकाली दल (शिअद) का साथ मिला। लेकिन बावजूद इसके हालात यह रहे कि इनेलो कुल 90 में से 81 सीटों पर ही प्रत्याशी उतार पाई। चूंकि इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला जेल में हैं, लिहाजा लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव भी इनेलो के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव अभय चौटाला के ही नेतृत्व में लड़ा गया।
मगर नतीजा यह रहा कि कभी प्रदेश को अपना मुख्यमंत्री देने वाली इनेलो इस बार सिर्फ1 सीट पर ही सिमटकर रह गई। जबकि पिछली बार विधानसभा में इनेलो अपने एक समर्थित विधायक के साथ कुल 20 विधायकों वाला मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में था। लेकिन इस बार सिर्फ अभय चौटाला ही अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे।
पिछले ग्यारह महीनों में इनेलो से अलग हुई जजपा ने इनेलो के वोटबैंक में जबरदस्त सेंधमारी कर उस पर अपना कब्जा किया। अब इनेलो के लिए फिर से अपना संगठन खड़ा कर पार्टी को मजबूती देते हुए अपना पुराना रसूख हासिल करना बड़ी चुनौती है।
निराशाजनक रही इनेलो की परफार्मेंस
इस विधानसभा चुनाव में पार्टी परफोरमेंस की चर्चा करें, तो इनेलो ने खासा निराश किया है। इस बार सबसे अधिक 36.49 प्रतिशत वोट भाजपा को हासिल हुए हैं। जबकि कांग्रेस को 28.08 प्रतिशत, आम आदमी पार्टी केा 0.48 प्रतिशत, बहुजन समाज पार्टी को 4.14 प्रतिशत, इंडियन नेशनल लोकदल को 2.44 प्रतिशत, शिरोमणी अकाली दल को 0.38 प्रतिशत, एसपी को 0.01 प्रतिशत, जेडीयू 0.01 प्रतिशत, एनसीपी 0.02 प्रतिशत, सीपीआईएम को 0.07 प्रतिशत, सीपीआई को 0.03 प्रतिशत, एआईएफबी दल को 0.01 प्रतिशत व आजाद प्रत्याशियों को 27.31 प्रतिशत वोट हासिल हुआ।
इन सीटों पर एक फीसद वोट भी नहीं मिले
इस बार 59 विधानसभा सीटों पर बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशियों ने इनेलो प्रत्याशियों से अधिक वोट हासिल किए हैं। जबकि सढौरा, जगाधरी, थानेसर, पिहोवा, कलायत, कैथल, पूंडरी, नीलोखेड़ी, पानीपत सिटी, इसराना, समालखा, राई, खारखौदा, सोनीपत, गोहाना, जुलाना, सफीदों, उचाना कलां, टोहाना, बरवाला, हिसार, दादरी, भिवानी, बवानीखेड़ा, गढ़ी-सांपला-किलोई, रोहतक, कलानौर, बादली, झज्जर, बेरी, अटेली, महेंद्रगढ़, नारनौल,रेवाड़ी, बादशाहपुर, गुरुग्राम, सोहना, फिरोजपुर झिरका, पलवल, पृथला, फरीदाबाद एनआईटी व तिगांव सीट पर खड़े हुए इनेलो प्रत्याशियों को तो एक प्रतिशत वोट तक हासिल नहीं हुआ।