अपराजिता: महिलाएं व युवतियां बोलीं, अब बहुत हो चुका, न्याय में देरी अब सहन नहीं
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निर्भया के दोषियों ने दया याचिका के ढीले नियमों का फायदा उठाकर एक चक्रव्यूह तैयार कर लिया है और न्याय को इसी चक्रव्यूह में फंसाकर वह लगातार फांसी की सजा को लटका रहे हैं। कल को इस तरह के अपराध में कई और दोषी भी इसे ढाल बना सकते हैं। यह कहना है चंडीगढ़ की महिला वकील, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कलाकारों का।
शनिवार को इसी मुद्दे पर अपराजिता: 100 मिलियन स्माइल्स के तहत अमर उजाला के कार्यालय में संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बता दें कि दिसंबर 2012 में देश को हिला देने वाले निर्भया सामूहिक दुष्कर्म केस के दोषियों को अब तक फांसी नहीं हो सकी है। सुप्रीम कोर्ट ने करीब तीन साल पहले निर्भया के दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन दोषी कानून के ढीले नियमों का फायदा उठाकर लगातार बच रहे हैं।
क्या दया याचिका के नियमों में संशोधन जरूरी है या कोई ऐसे कदम उठाए जाएं, ताकि दोषियों को सजा जल्द से जल्द से मिले। इस विषय अपनी राय रखते हुए संवाद कार्यक्रम में महिला वकील, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कलाकारों ने कहा कि अब बहुत हो चुका। कड़े नियम बनाने के साथ दया याचिका में संशोधन जरूरी है।
पुलिस अब भी देरी से केस दर्ज करती है
दुष्कर्म केस में एक तो पुलिस एफआईआर देरी से दर्ज करती है। उसके बाद जांच प्रक्रिया भी धीमी होती है। पुलिस कहीं न कहीं पेच फंसा कर रखती है। इस प्रक्रिया के दौरान पीड़िता को कितनी मुश्किलों को सामना करना पड़ता है। इस बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। मेरा मानना है कि जांच से लेकर सजा तक की समय सीमा निर्धारित होनी चाहिए। - रोशनी राय, एडवोकेट
कानून को सख्त बनाकर पालन करवाया जाए
दुष्कर्म के मामलों में कार्रवाई के लिए देरी नहीं होनी चाहिए। जल्दी सुनवाई होने से परिवार का शोषण बच जाता है अन्यथा उनकी पीड़ा और बढ़ जाती है। यही निर्भया के केस में हो रहा है। अभिभावकों की पीड़ा लगातार बढ़ रही है। उन्हें किसी का सपोर्ट भी नहीं मिल रहा है। सबने उन्हें अदालत की पार्किंग में रोते देखा है इसलिए कानून को और सख्त बनाते हुए उसका पालन कराया जाना चाहिए। -अंबिका राय, सामाजिक कार्यकर्ता
नियमों को कठोर करें
कई नियमों में ढील के कारण दोषी बाहर आ जाते हैं। इसके कारण पीड़ितों को और पीड़ा हो जाती है। इन नियमों को और कड़ा बनाने की आवश्यकता है, ताकि लोगों का कानून पर भरोसा और बढ़े। साथ ही दया याचिका के लिए बार-बार जो आवेदन किए जाते हैं इससे भी केस में देरी होती है। अब दया याचिका पर भी विचार करने की जरूरत है। -ईक्षा शर्मा, थिएटर आर्टिस्ट
कानून का डर बहुत जरूरी
कानून को इतना सख्त बनाना चाहिए कि ताकि कोई आरोपी गलत काम करने से पहले वह सौ बार सोचे। कानून का डर होना बहुत जरूरी है। दूसरे कई देशों में ऐसा ही हो रहा है। रेप केस में दया याचिका नहीं दी जानी चाहिए। जिस तरह दुष्कर्मी ने पीड़िता के साथ कोई अत्याचार किया है, वैसे ही उसे भी कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए। -संजना, कोरियोग्राफर
सजा के छह महीने के अंदर दोषी को हो जानी चाहिए फांसी
दोषियों के मौलिक अधिकारियों में बदवाल की जरूरत है। निर्भया केस में जानबूझ कर एक-एक दोषी की तरफ से दया याचिका लगाई जा रही है, ताकि फांसी में देरी हो। सजा सुनाने के छह महीने के अंदर दोषी को फांसी दे देनी चाहिए। जब सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सजा दे चुका है तो फिर सजा में देरी क्यों हो रही है। -सुशीला भारद्वाज, वकील
महिला पुलिस थानों की भारी कमी
हमारे देश में हर 15 मिनट में एक दुष्कर्म होता है। 70 प्रतिशत दुष्कर्म के मामले दर्ज ही नहीं होते हैं। कारण समाज का डर होता है। पुलिस की इमेज मजबूत करनी होगी। महिला पुलिस थानों की कमी है। देश में लड़कियों को हर स्थिती के लिए तैयार करना होगा। हमारे देश में दुष्कर्म पीड़ित और उसके परिजनों की काउंसलिंग के लिए काउंसलर की संख्या काफी कम है। इसके अलावा शादी के बाद होने वाले दुष्कर्म को तो गिना ही नहीं जाता है। - गीतांजलि वाधवा, एडवोकेट
निर्भया केस में कानून का मजाक बनाया जा रहा
करीब 8 साल हो गए हैं लेकिन अभी तक निर्भया को पूर्ण रूम से इंसाफ नहीं मिला है। कानून का मजाक बनाया जा रहा है। हैदराबाद में एक डॉक्टर के साथ दुष्कर्म के आरोपियों का एनकाउंटर भी गलत है। किसी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है। अश्लील वीडियो तक पहुंच काफी आसान हो गया है, जिसकी वजह से दुष्कर्म के मामले बढ़ रहे हैं। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है अब बेटी को कराटा और बेटे को पराठां बनाना सिखाना चाहिए। -ज्योति मेहता, वकील
संवाद में निकले ये निष्कर्ष
- अश्लील वीडियो पूरी तरह प्रतिबंधित होने चाहिए।
- लड़का व लड़कियों को एक जैसा समझना चाहिए।
- बेटों को संस्कार दें कि वह दूसरी महिलाओं की इज्जत करें।
- कानून को कठोर किया जाए। जहां नियमों में ढील है उसे ठीक किया जाए।
- पीड़िता के लिए काउंसलर की व्यवस्था हो। फैमिली सपोर्ट के लिए व्यवस्था होनी चाहिए।
- दोष साबित होने के बाद सजा देने में देरी नहीं होनी चाहिए।