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कुएं से मिले 122 शहीदों के अस्थि पिंजर
ब्यूरो/अमर उजाला, अजनाला (अमृतसर)
Updated Sun, 02 Mar 2014 02:36 PM IST
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अमृतसर की तहसील अजनाला में कुएं में दफन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के 282 शहीदों की अस्थियों निकालने के लिए शुरू की गई खुदाई के दूसरे दिन शनिवार शात तक करीब 100 शहीदों की अस्थियां निकाल ली गईं।
खुदाई से अब तक कुल 122 शहीदों की अस्थियां मिल चुकी हैं। शुक्रवार को 22 शहीदों की अस्थियां और अवशेष मिले थे।
कुएं की खुदाई का काम इस कुएं के बारे में शोध करने वालों इतिहासकारों और गुरुद्वारा शहीदगंज-शहीदांवाला खूह कमेटी द्वारा सुयंक्त रूप से कराया जा रहा है।
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खुदाई से अब तक कुल 122 शहीदों की अस्थियां मिल चुकी हैं। शुक्रवार को 22 शहीदों की अस्थियां और अवशेष मिले थे।
कुएं की खुदाई का काम इस कुएं के बारे में शोध करने वालों इतिहासकारों और गुरुद्वारा शहीदगंज-शहीदांवाला खूह कमेटी द्वारा सुयंक्त रूप से कराया जा रहा है।
दूसरे दिन खुदाई में मिली वस्तुएं
शनिवार को निकाली गई अस्थियों के बारे में जानकारी देते हुए शोधकर्ता सुरेंद्र कोछड़ और गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया ने बताया कि शनिवार शाम पांच बजे खुदाई का काम रोकने तक करीब 100 शहीद सैनिकों की अस्थियां निकाली जा चुकी हैं।
खुदाई में 50 खोपड़ियां, 40 से ज्यादा साबुत जबड़े, 500 से ज्यादा दांत, कुछ ब्रिटिश गोलियां, ईस्ट इंडिया कंपनी के एक-एक रुपये के 47 सिक्के, सोने के चार मोती, सोने के तीन तावीज, दो अंगुठियां और अन्य सामान मिला है।
उन्होंने बताया कि अस्थियों के अलावा मिली वस्तुओं को कुएं के स्थान पर बनाए जाने वाले म्यूजियम में रखने के लिए सुरक्षित कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि कुएं में सैनिकों की अस्थियां बहुत ज्यादा संख्या में हैं, इसलिए अस्थियां निकालने का काम रविवार को भी जारी रहेगा।
खुदाई में 50 खोपड़ियां, 40 से ज्यादा साबुत जबड़े, 500 से ज्यादा दांत, कुछ ब्रिटिश गोलियां, ईस्ट इंडिया कंपनी के एक-एक रुपये के 47 सिक्के, सोने के चार मोती, सोने के तीन तावीज, दो अंगुठियां और अन्य सामान मिला है।
उन्होंने बताया कि अस्थियों के अलावा मिली वस्तुओं को कुएं के स्थान पर बनाए जाने वाले म्यूजियम में रखने के लिए सुरक्षित कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि कुएं में सैनिकों की अस्थियां बहुत ज्यादा संख्या में हैं, इसलिए अस्थियां निकालने का काम रविवार को भी जारी रहेगा।
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एक-दूसरे से सटे 7 कंकालों ने खोला नया राज
गुरुद्वारा कमेटी के इतिहासकार सदस्यों ने बताया कि कुएं से बरामद कंकालों से कई नए ऐतिहासिक तथ्य उजागर हुए हैं। उन्होंने बताया कि कुएं में एक साथ सटे सात शहीदों के कंकाल देखकर पता चलता है कि जब अंग्रेजों ने कुएं में 237 शवों के 45 जिंदा सैनिकों को फेंका होगा तो उन्होंने खुद को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया होगा।
सदस्यों ने बताया कि कंकालों से साफ जाहिर हो रहा है कि कुएं में जीवित सैनिकों ने एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर कुएं से बाहर निकलने का रास्ता बनाने की कोशिश की थी लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
सदस्यों ने बताया कि कंकालों से साफ जाहिर हो रहा है कि कुएं में जीवित सैनिकों ने एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर कुएं से बाहर निकलने का रास्ता बनाने की कोशिश की थी लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
अंग्रेजों ने किया था दफन
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में विद्रोह करने वाले 282 भारतीय सैनिकों की हत्या कर अंग्रेजों ने अजनाला के एक कुएं में फेंक दिया था। इनमें 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में दफन किया गया था।
इस बर्बर और कायराना हरकत के गवाह अजनाला के कुएं से गत शुक्रवार की सुबह जैसे ही खुदाई का काम शुरू हुआ, शहीद सैनिकों की अस्थियां निकलने लगीं। सैनिकों की अस्थियां देखते ही ऐसा लगा मानो 157 साल पुराने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने फिर से खुल गए।
इस बर्बर और कायराना हरकत के गवाह अजनाला के कुएं से गत शुक्रवार की सुबह जैसे ही खुदाई का काम शुरू हुआ, शहीद सैनिकों की अस्थियां निकलने लगीं। सैनिकों की अस्थियां देखते ही ऐसा लगा मानो 157 साल पुराने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्ने फिर से खुल गए।
45 सैनिकों को जिंदा फेंका गया था कुएं में
शोधकर्ता सुरिंदर कोछड़ के अनुसार, 30 जुलाई, 1857 को लाहौर की मियां मीर छावनी से ईस्ट इंडिया कंपनी से बगावत करके बंगाल नेटिव इनफेंटरी की 26 रेजीमेंट के करीब 500 निहत्थे हिंदुस्तानी सिपाही भाग कर अजनाला में दरिया रावी के पास पहुंच गए थे।
वहां गांव के लोगों की मुखबरी पर ब्रिटिश सेना ने उनमें से 218 सिपाहियों की गोली मारकर हत्या कर दी जबकि शेष 282 सैनिकों को अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर फ्रेडरिक हेनरी कूपर रस्सियों से बांधकर अजनाला ले आया।
अगली सुबह एक अगस्त को बकरीद के दिन थाने में बंद 282 सैनिकों में से 237 को गोली मार दी गई। उनके साथ ही जगह की कमी के चलते छोटे से बुर्ज में ठूंस कर भरे 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में फेंककर कुएं को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।
नरसंहार के 157 वर्ष बीत जाने के बाद भी राज्य या केंद्र सरकार ने सैनिकों के शवों या अस्थियों को निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
वहां गांव के लोगों की मुखबरी पर ब्रिटिश सेना ने उनमें से 218 सिपाहियों की गोली मारकर हत्या कर दी जबकि शेष 282 सैनिकों को अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर फ्रेडरिक हेनरी कूपर रस्सियों से बांधकर अजनाला ले आया।
अगली सुबह एक अगस्त को बकरीद के दिन थाने में बंद 282 सैनिकों में से 237 को गोली मार दी गई। उनके साथ ही जगह की कमी के चलते छोटे से बुर्ज में ठूंस कर भरे 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में फेंककर कुएं को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।
नरसंहार के 157 वर्ष बीत जाने के बाद भी राज्य या केंद्र सरकार ने सैनिकों के शवों या अस्थियों को निकालने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
अजनाला में होगा अस्थियों का अंतिम संस्कार
गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष अमरजीत सिंह सरकारिया ने बताया कि आजादी के बाद यहां यादगार के नाम पर ईंटों की एक छोटी सी बुर्जी थी, जिस पर एक कोरा कपड़ा डालकर ‘1857 के शहीद‘ लिखा हुआ था।
अगस्त 1957 में जब पहली बार इस स्थान पर 100 वर्षीय शहीदी दिवस और 2007 में 150 वर्षीय शहीदी समागम करवाए गए। उन्होंने बताया कि कुएं से निकाली अस्थियों की जरूरी जांच कराने के बाद और सरकार द्वारा शहीदों के संस्कार व उनके समाधि स्मारक के लिए उचित जगह मिलने पर अजनाला में ही इन अस्थियों का संस्कार किया जाएगा। इसके बाद विशाल जुलूस की शक्ल में अस्थियां जल प्रवाह के लिए श्री गोईंदवाल साहिब और हरिद्वार ले जाई जाएंगी।
अगस्त 1957 में जब पहली बार इस स्थान पर 100 वर्षीय शहीदी दिवस और 2007 में 150 वर्षीय शहीदी समागम करवाए गए। उन्होंने बताया कि कुएं से निकाली अस्थियों की जरूरी जांच कराने के बाद और सरकार द्वारा शहीदों के संस्कार व उनके समाधि स्मारक के लिए उचित जगह मिलने पर अजनाला में ही इन अस्थियों का संस्कार किया जाएगा। इसके बाद विशाल जुलूस की शक्ल में अस्थियां जल प्रवाह के लिए श्री गोईंदवाल साहिब और हरिद्वार ले जाई जाएंगी।
नेता न अफसर, कोई नहीं आया श्रद्धांजलि देने
शहीदांवाला खूह कमेटी के महासचिव काबल सिंह शाहपुर ने कहा कि यह शहीदी कुआं जिसे कुछ कथित संत विलुप्त हो चुका बता रहे थे, आज स्थानीय लोगों केप्रयास से दुनिया के सामने इतिहास का गवाह बनकर आया है।
उन्होंने अफसोस जताया कि कुएं से शहीदों की अस्थियां निकालने के लिए आयोजित किए गए कार्यक्रम में न कोई सत्ताधारी नेता पहुंचा और न ही कोई प्रशासनिक अफसर ही आया।
उन्होंने अफसोस जताया कि कुएं से शहीदों की अस्थियां निकालने के लिए आयोजित किए गए कार्यक्रम में न कोई सत्ताधारी नेता पहुंचा और न ही कोई प्रशासनिक अफसर ही आया।