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हो रही 'गुरु-शिष्य' के रिश्ते की हत्या, क्यों बदल रही बच्चों की मानसिकता?
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 23 Jan 2018 01:02 PM IST
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परवरिश की पाठशाला
- फोटो : File Photo
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चंडीगढ़ के एक स्कूल में नशा करके आए छात्र को डांटने पर स्कूल टीचर को लहूलुहान कर दिया गया। दूसरी घटना में परीक्षा में फेल होने के बाद डांटने पर छात्र ने प्रिंसिपल पर चार गोलियां दाग दीं। ये दोनों घटनाएं ये बताने को काफी हैं कि स्कूल के बच्चों में आक्रोश किस कदर बढ़ गया। संयम और टीचरों के प्रति सम्मान खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है।
बीते जमाने में शरारत करने के बाद मिली सजा पर न तो अभिभावकों को कोई शिकायत रहती थी और न ही स्टूडेंट को। इसके बावजूद बच्चों में टीचर के प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं आती थी। मगर पिछले कुछ अर्से से बच्चों के स्वभाव में जबरदस्त बदलाव आया है। एक्सपर्ट मानते हैं कि इन सबके पीछे पेरेंट्स और समाज की बड़ी भूमिका है। परवरिश में कोई कमी रह गई है, जिसकी वजह से बच्चों के भविष्य की डगर कमजोर पड़ गई।
इस सामाजिक मुद्दे पर अमर उजाला ‘परवरिश की पाठशाला’ नाम से एक सीरीज शुरू कर रहा है, जिसमें मनोचिकित्सक, मनोविज्ञानी, अध्यापक और सक्सेस पेरेंट्स अपने अनुभव के आधार पर पेरेंटिंग टिप्स देंगे। साथ में उस कमियों और खामियों पर बात होगी, जो आपके बच्चों की परवरिश में मददगार साबित होंगी। प्रस्तुत है आज की पहली किस्त।
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घर में बनाएं ऐसा माहौल
सीनियर मनोचिकित्सक डा. सिमी वड़ैच ने बताया कि बच्चों की परवरिश में घर का माहौल सबसे अहम होता है। घर में लाड़-प्यार, परवाह के साथ-साथ अनुशासन का होना जरूरी है। अनुशासन का मतलब इससे बिल्कुल नहीं है कि पढ़ाई के लिए बच्चों को पीटने लगे। पढ़ाई, गपशप, खेलकूद और टीवी सबका एक समय तय होना चाहिए। बच्चों के साथ ऐसा घुले-मिले, जिससे कि वह आपसे कुछ छिपा न पाएं। उसमें विश्वास जगाएं कि वह सबकुछ सबसे पहले आपको बताए। घर में बातचीत का सलीका होना चाहिए। आपस में सम्मानजनक भाषा में बात करें। बेटे को बहन के साथ-साथ घर पर आने वाली नौकरानी से बात करने का लहजा सिखाएं। बच्चों के सामने कभी भी किसी दूसरे की चुगली न करें। एक बात ध्यान रखिए जैसा आप दूसरों से व्यवहार करेंगे, वैसा व्यवहार बच्चे दूसरों के साथ करेंगे।
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बीते जमाने में शरारत करने के बाद मिली सजा पर न तो अभिभावकों को कोई शिकायत रहती थी और न ही स्टूडेंट को। इसके बावजूद बच्चों में टीचर के प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं आती थी। मगर पिछले कुछ अर्से से बच्चों के स्वभाव में जबरदस्त बदलाव आया है। एक्सपर्ट मानते हैं कि इन सबके पीछे पेरेंट्स और समाज की बड़ी भूमिका है। परवरिश में कोई कमी रह गई है, जिसकी वजह से बच्चों के भविष्य की डगर कमजोर पड़ गई।
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इस सामाजिक मुद्दे पर अमर उजाला ‘परवरिश की पाठशाला’ नाम से एक सीरीज शुरू कर रहा है, जिसमें मनोचिकित्सक, मनोविज्ञानी, अध्यापक और सक्सेस पेरेंट्स अपने अनुभव के आधार पर पेरेंटिंग टिप्स देंगे। साथ में उस कमियों और खामियों पर बात होगी, जो आपके बच्चों की परवरिश में मददगार साबित होंगी। प्रस्तुत है आज की पहली किस्त।
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घर में बनाएं ऐसा माहौल
सीनियर मनोचिकित्सक डा. सिमी वड़ैच ने बताया कि बच्चों की परवरिश में घर का माहौल सबसे अहम होता है। घर में लाड़-प्यार, परवाह के साथ-साथ अनुशासन का होना जरूरी है। अनुशासन का मतलब इससे बिल्कुल नहीं है कि पढ़ाई के लिए बच्चों को पीटने लगे। पढ़ाई, गपशप, खेलकूद और टीवी सबका एक समय तय होना चाहिए। बच्चों के साथ ऐसा घुले-मिले, जिससे कि वह आपसे कुछ छिपा न पाएं। उसमें विश्वास जगाएं कि वह सबकुछ सबसे पहले आपको बताए। घर में बातचीत का सलीका होना चाहिए। आपस में सम्मानजनक भाषा में बात करें। बेटे को बहन के साथ-साथ घर पर आने वाली नौकरानी से बात करने का लहजा सिखाएं। बच्चों के सामने कभी भी किसी दूसरे की चुगली न करें। एक बात ध्यान रखिए जैसा आप दूसरों से व्यवहार करेंगे, वैसा व्यवहार बच्चे दूसरों के साथ करेंगे।
ऐसा बिल्कुल न करें
परवरिश की पाठशाला
- फोटो : File Photo
बच्चों के रोल मॉडल खुद बनें
बच्चे कुम्हार के एक बर्तन की तरह होते हैं, जैसा उन्हें आकार देंगे, वे वैसा बनेंगे। कोशिश करिए कि बच्चे अपने पेरेंट्स को रोल मॉडल मानें। उनके सामने कुछ अच्छा कार्य करें। बच्चों के सामने कभी भी ट्रैफिक या कोई भी नियम न तोड़ें। कोई बुजुर्ग सड़क पार करने के लिए किसी सहारे का इंतजार कर रहा हो तो उनकी मदद करें।
बच्चे को बताएं भी जब भी ऐसे लोग मिले तो उनका सम्मान और उनकी मदद जरूर करें। घर के बड़े-बुजुर्ग के साथ अपने बच्चों को लेकर कुछ समय बिताएं। जब भी समय मिले तो बच्चों को बाहर लेकर जाएं। पिकनिक स्पॉट पर जाएं। आजकल तो पिकनिक शब्द खत्म सा हो गया है। बच्चे की ललक देखकर उसके अंदर कुछ अच्छी आदतों की उत्सुकता बनाएं। जैसे कि स्पोर्ट्स, थियेटर, संगीत या लिटरेचर पढ़ने की।
ऐसा बिल्कुल न करें
सीनियर साइक्रेटिस्ट डा. हरदीप सिंह ने कहा कि आजकल अक्सर देखा जाता रहा है कि बेटे की गलती पर मां ने टोक दिया तो पिता बच्चों को समझाने के बजाए मां को टोक देते हैं। उन्हें ही गलत ठहरा देते हैं। यदि कुछ गलत लगता है तो बच्चे के सामने तो कतई टोका-टिप्पणी न करें। बाद में आपस में सही-गलत पर बात कर लें। यही बात मां को भी ध्यान में रखनी होगी। बच्चा यदि कोई जिद करे तो तत्काल उसकी जिद पूरी करने के बजाए उसे प्यार से समझाए। एक बार यदि जिद पूरी कर दी तो वह हर बार वही पैंतरा अपनाएगा। घर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक हद तक करें। घर पर ऑनलाइन के बजाए ऑफलाइन पर ज्यादा फोकस करें।
बच्चे कुम्हार के एक बर्तन की तरह होते हैं, जैसा उन्हें आकार देंगे, वे वैसा बनेंगे। कोशिश करिए कि बच्चे अपने पेरेंट्स को रोल मॉडल मानें। उनके सामने कुछ अच्छा कार्य करें। बच्चों के सामने कभी भी ट्रैफिक या कोई भी नियम न तोड़ें। कोई बुजुर्ग सड़क पार करने के लिए किसी सहारे का इंतजार कर रहा हो तो उनकी मदद करें।
बच्चे को बताएं भी जब भी ऐसे लोग मिले तो उनका सम्मान और उनकी मदद जरूर करें। घर के बड़े-बुजुर्ग के साथ अपने बच्चों को लेकर कुछ समय बिताएं। जब भी समय मिले तो बच्चों को बाहर लेकर जाएं। पिकनिक स्पॉट पर जाएं। आजकल तो पिकनिक शब्द खत्म सा हो गया है। बच्चे की ललक देखकर उसके अंदर कुछ अच्छी आदतों की उत्सुकता बनाएं। जैसे कि स्पोर्ट्स, थियेटर, संगीत या लिटरेचर पढ़ने की।
ऐसा बिल्कुल न करें
सीनियर साइक्रेटिस्ट डा. हरदीप सिंह ने कहा कि आजकल अक्सर देखा जाता रहा है कि बेटे की गलती पर मां ने टोक दिया तो पिता बच्चों को समझाने के बजाए मां को टोक देते हैं। उन्हें ही गलत ठहरा देते हैं। यदि कुछ गलत लगता है तो बच्चे के सामने तो कतई टोका-टिप्पणी न करें। बाद में आपस में सही-गलत पर बात कर लें। यही बात मां को भी ध्यान में रखनी होगी। बच्चा यदि कोई जिद करे तो तत्काल उसकी जिद पूरी करने के बजाए उसे प्यार से समझाए। एक बार यदि जिद पूरी कर दी तो वह हर बार वही पैंतरा अपनाएगा। घर पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक हद तक करें। घर पर ऑनलाइन के बजाए ऑफलाइन पर ज्यादा फोकस करें।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
परवरिश की पाठशाला
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बच्चों के बदले स्वभाव पर सिर्फ पेरेंट्स को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। इसमें समाज और स्कूल के टीचर का भी अहम रोल है। टीचर को समझना चाहिए कि हर बच्चा अलग होता है। कोई खेल में आगे होगा तो कोई पढ़ाई में। उसे उसी तरह से व्यवहार करें। पेरेंट्स अपने पेरेंटिंग पर पूरा ध्यान दें। बच्चों के साथ समय बिताएं। वरना वे कुछ भी आपसे शेयर नहीं करेंगे।
- डा. सिमी वड़ैच, मनोचिकित्सक चंडीगढ़
आजकल नैतिक मूल्य पूरी तरह से खत्म हो गए है। पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए समय नहीं है। बच्चे भी अपनी धुन में मगन हो जाते हैं। वे क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, उनकी आदतों में क्या बदलाव आ रहा, इस बारे में पेरेंट्स को पता ही नहीं चलता है। यह तभी होता है, जब घर में किसी के लिए वक्त नहीं होता। इसलिए चाहे जितना व्यस्त हों, बच्चों और फैमिली को कुछ समय जरूर दें। उनसे बातचीत करें। उनकी दिनचर्या के बारे में चरचा करें।
- डा. हरदीप सिंह, सीनियर कंसलटेंट साइक्रेटिस्ट फ्रोर्टिस हास्पिटल मोहाली
आजकल बच्चों में टीचर का डर खत्म हो गया है। उसकी एक वजह पेरेंट्स हैं। यदि कोई टीचर बच्चे को डांटता है तो पेरेंट्स लड़ने के लिए स्कूल चले आते हैं। इससे बच्चे को शह मिलती है और वे सोचने लगते हैं कि जब उनके पेरेंट्स कुछ नहीं कहेंगे तो टीचर की क्या मजाल। ये एक के साथ होता और दूसरे बच्चे उससे सीखते हैं। टीचर को भी समझना होगा कि सभी बच्चे एक जैसे नहीं होेते हैं। सबको अलग-अलग अटेंशन देने की जरूरत होती है।
- संजीव अरोड़ा, प्रिंसिपल, गवर्नमेंट मॉडल हाईस्कूल - 41
- डा. सिमी वड़ैच, मनोचिकित्सक चंडीगढ़
आजकल नैतिक मूल्य पूरी तरह से खत्म हो गए है। पेरेंट्स के पास बच्चों के लिए समय नहीं है। बच्चे भी अपनी धुन में मगन हो जाते हैं। वे क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, उनकी आदतों में क्या बदलाव आ रहा, इस बारे में पेरेंट्स को पता ही नहीं चलता है। यह तभी होता है, जब घर में किसी के लिए वक्त नहीं होता। इसलिए चाहे जितना व्यस्त हों, बच्चों और फैमिली को कुछ समय जरूर दें। उनसे बातचीत करें। उनकी दिनचर्या के बारे में चरचा करें।
- डा. हरदीप सिंह, सीनियर कंसलटेंट साइक्रेटिस्ट फ्रोर्टिस हास्पिटल मोहाली
आजकल बच्चों में टीचर का डर खत्म हो गया है। उसकी एक वजह पेरेंट्स हैं। यदि कोई टीचर बच्चे को डांटता है तो पेरेंट्स लड़ने के लिए स्कूल चले आते हैं। इससे बच्चे को शह मिलती है और वे सोचने लगते हैं कि जब उनके पेरेंट्स कुछ नहीं कहेंगे तो टीचर की क्या मजाल। ये एक के साथ होता और दूसरे बच्चे उससे सीखते हैं। टीचर को भी समझना होगा कि सभी बच्चे एक जैसे नहीं होेते हैं। सबको अलग-अलग अटेंशन देने की जरूरत होती है।
- संजीव अरोड़ा, प्रिंसिपल, गवर्नमेंट मॉडल हाईस्कूल - 41