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Hindi News ›   Chandigarh ›   amarujala exclusive: meet robbars pancham singh

पांच सौ डाकुओं के 'सरदार' के प्रवचन सुनिए

Wed, 23 Apr 2014 06:57 PM IST
डिजिटल टीम/अमर उजाला, निसिंग
डिजिटल टीम/अमर उजाला, निसिंग Updated Wed, 23 Apr 2014 06:57 PM IST
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amarujala exclusive: meet robbars pancham singh

एक करोड़ का इनामी डाकू पंचम सिंह। साढ़े पांच सौ डाकुओं का सरदार। 14 साल तक चंबल पर राज किया। कत्ल, अपहरण व डकैती के तीन सौ केस। 25 जिलों में सिक्का चलाया, लेकिन एक ही झटके में डाकू पंचम सिंह चौहान बन गए संत भाई पंचम सिंह। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी की शिक्षाएं क्या मिलीं, पंचम सिंह भी इसी धार्मिक बयार में बह निकले।

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मंगलवार को प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की शाखा निसिंग में ब्रह्माकुमारी भाई बहनों को अपने प्रवचनों से शिव बाबा का संदेश जन जन तक पहुंचाने के लिए संत पंचम सिंह चौहान शाखा निसिंग में पहुंचे।
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अत्याचार ने बनाया डाकू और ब्रह्मकुमारी ने संत

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पत्रकारों से बातचीत में 90 वर्षीय भाई पंचम सिंह ने बताया कि 1958 में ग्राम सींमपुरा जिला भिंड मध्यप्रदेश में ग्राम पंचायत के चुनावों में हुए झगडे़ में उन्हें लोगों ने बेवजह खूब पीटा।

करीब 20 दिन वह अस्पताल में इलाज लेकर ठीक हुए। उसके साथ तरह-तरह के अन्याय कर परेशान किया गया। इससे तंग आकर वह डाकू बन गए। कुछ ही दिनों में 550 डाकुओं का सरदार बने।

इंदिरा गांधी के सामने आत्मसमर्पण

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उन्होंने बताया कि 14 साल चंबल के बीहड़ों में उनकी जिंदगी डाकू के रूप में बीती। सरकार की ओर से उनको पकड़ने के लिए एक करोड़ रुपये का इनाम भी रखा गया था।

1972 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ उनका आठ सूत्रीय मांगों पर समझौता होकर उन्होंने अपने साथियों सहित आत्मसमर्पण कर दिया। आरोपों की बिनाह पर उन्हें न्यायालय ने फांसी की सजा दे दी। तत्काल राष्ट्रपति ने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दी।

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ऐसे सुधरी डाकू की जिंदगी

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कारागार में कैदियों में सुधार लाने के लिए प्रजापिता ब्रह्मकुमारी की मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी प्रकाशमणि व जगदीश भाई ने एक कार्यक्रम में प्रवचन दिए।

उनके एक विचार ने डाकू पंचम सिंह को भाई पंचम सिंह बना दिया। आठ वर्ष के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। आज भाई पंचम सिंह जन जन को ईश्वरीय संदेश दे रहे हैं।

परमात्मा के नाम से मिलती है शांति

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उन्होंने कहा कि परमात्मा के नाम में जो आत्मिक शांति मिलती है, वह किसी भी सांसारिक वस्तु व धन दौलत में नहीं मिलती। परमात्मा का साक्षात्कार पाने के लिए पवित्र मन, सम्यक कर्म शुद्ध विचारों की आवश्यकता होती है।

इसके लिए विषय विकारों का परित्याग एवं इच्छाओं का दमन करना भी जरूरी है। परमात्मा पवित्रता में निवास करते हैं। तन-मन की पवित्रता भी जीव का परमात्मा से मिलन करवाती है। उन्होंने बताया कि मनुष्य को अपने जन्मों के सुधार के लिए मानव जीवन मिला है। इस जन्म का मनुष्य को लाभ उठाना चाहिए।

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