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MSME: दर्द समझे सरकार, तभी ‘मेक इन इंडिया’ होगा साकार
ब्यूरो/अमर उजाला, अंबाला कैंट
Updated Sun, 31 Jan 2016 04:52 PM IST
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केंद्र व राज्य सरकार जब तक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमियों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देगी, तब तक ‘मेक इन इंडिया’ का सपना पूरा नहीं होगा। हर वर्ग के उद्यमियों की ऐसी समस्याएं हैं, जिनका निराकरण बहुत जरूरी है।
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अंबाला के फोनिक्स क्लब में आयोजित ‘अमर उजाला’ के एमएसएमई कान्क्लेव 2016 के तहत शनिवार को आयोजित गेट टू गेदर में विभिन्न वर्ग के उद्यमियों ने अपनी समस्याएं प्रमुखता से रखी। कार्यक्रम में साइंस इंडस्ट्री, लैदर, फार्मा इंडस्ट्री व मिक्सी इंडस्ट्री से जुड़े अनेक कारोबारी मौजूद रहे और उद्यमियों ने अपनी-अपनी इंडस्ट्री की समस्याओं और समाधानों पर चर्चा की।
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उद्यमियों का कहना था कि जब माइक्रो व स्माल इंडस्ट्री को एक बार रजिस्टर्ड कर दिया जाता है, तो केंद्र द्वारा उसे क्यों नहीं माना जाता। संबंधित इंडस्ट्री को केंद्र से अलग रजिस्ट्रेशन करवाने का कोई मतलब नहीं बनता, लेकिन उद्यमी इस समस्या को झेल रहा है। अंबाला से साइंस उपकरण पूरे विश्व में निर्यात किए जाते हैं, लेकिन आज तक साइंस सिटी के तौर पर पहचान नहीं मिली।
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कारोबारियों ने कहा कि देखा जाए तो आजादी के बाद उन सेक्टरों में बूम आया, जिनमें सरकारी दखलंदाजी कम थी या नहीं थी, उद्योगों से जुड़े कुछ विभाग सरकार के मुखिया अपने पास रखते हैं, जिससे काम को बोझ बढ़ता है और परेशानियां पैदा होती हैं। फ्लोर मिल उद्यमियों के अनुसार गेहूं वितरण का काम एफसीआई के पास चला गया है, आटा मिलें खाली हैं।
इंडस्ट्री पर सरचार्ज लगाकर महंगी बिजली दी जा रही है, जिसे दूर करने की जरूरत है। इसी प्रकार साइंस इक्वीपमेंट कारोबारियों ने कहा कि बैंक छोटे उद्यमियों को कर्ज देने में आनाकानी करते हैं और सिक्योरिटी मांगते हैं। सेल्स टैक्स का रिफंड लेने में पसीने छूट जाते हैं। जब एक बार सेल्स टैक्स रिफंड के लिए ओके कर दिया गया, तो दोबारा अप्लाई क्यों मांगा जाता है?
फार्मा क्षेत्रह से जुड़े कारोबारियों का कहना था कि बैंक अधिकारी छोटे लोन देने में आनाकानी करते हैं, जबकि करोड़ों के लोन फर्जी कागजातों पर आसानी से दे देते हैं। देश में स्थापित इकाइयों को सुविधाएं दी जाएं, तो बाहर से उद्यमियों को बुलाने की जरूरत ही नहीं है। बिजली विभाग इंडस्ट्री पर हावी है। कैंट इंडस्ट्रियल एरिया में तमाम समस्याएं हैं, लेकिन इनको बीते दशकों में दूर नहीं किया गया।
टेंडरिंग प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए। उद्यमियों ने सवाल किया कि आज बड़े, मध्यम, मझौले और छोटी इकाइयों के लिए मिनमिम वेजेज एक समान हैं क्यों? माइक्रो इंडस्ट्री को पूरी तरह से अलग कर इसके लिए अलग से मंत्रालय बनाया जाए।