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2022 में अकाली दल पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने की कवायद में अभी से जुटा
Tue, 28 Jan 2020 11:09 AM IST
Vikas Kumar
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: Vikas Kumar
Updated Tue, 28 Jan 2020 11:09 AM IST
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shiromani akali dal
- फोटो : फाइल फोटो
दिल्ली में शिरोमणि अकाली दल व भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन टूटने के बाद अकाली दल ने 2022 में अकेले चुनाव लड़ने के लिए अपनी एक्सरसाइज शुरू कर दी है। अगर भाजपा की लीडरशिप अकाली दल से गठबंधन तोड़ती है तो अकाली दल बादल को पंजाब में अपनी ताकत दिखाना एक गंभीर चुनौती होगी। अकाली दल ने जहां हिंदुओं के अलावा दलितों को पार्टी से जोड़ने के लिए आने वाले दिनों में रणनीति तैयार की है वहीं भाजपा जिन 23 सीटों पर चुनाव लड़ती है, वहां से अपनी पार्टी के उम्मीदवार को तैयार करने जा रही है ताकि किसी भी समय पार्टी उसको चुनाव मैदान में उतार सके और पार्टी के आगे अचानक उम्मीदवारी को लेकर संकट पैदा न हो सके।
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शिरोमणि अकाली दल व भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन काफी पुराना है और इस गठबंधन को अरुण जेटली ही सहेजकर रखते आए थे। उनकी प्रकाश सिंह बादल से काफी पुराना रिश्ता था और इस गठबंधन को वह हिंदू सिख एकता का प्रतीक बताकर तोड़ने की बात करने वालों को उलटा डांट देते थे। अरुण जेटली के स्वर्गवास के बाद पंजाब की राजनीति में काफी बदलाव हो गया है। भाजपा व अकाली दल मिलकर 1997 के बाद पंजाब में तीन बार सरकार बना चुके हैं और पार्टी तभी से 23 सीटों पर चुनाव लड़ती आई है।
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पार्टी के शीर्ष नेता अब यह आवाज एक सुर में उठा रहे हैं कि पंजाब में कब तक 23 सीटों पर चुनाव लड़ते रहेंगे? पार्टी के शीर्ष नेता मास्टर मोहन लाल कहते हैं कि हर तरफ मोदी की हवा व जय जयकार हो रही है तो पंजाब में हमें क्या दिक्कत है? हरियाणा में सरकार बना दी, हिमाचल में बना दी तो पंजाब में भाजपा की सरकार होनी चाहिए। इस बयानबाजी के बाद अकाली दल सकते में है। अकाली दल के लिए दिक्कत है कि दोआबा में कई सीटों पर उनका जनाधार कम है और इन पर भाजपा के उम्मीदवार 20 साल से खड़े होते आ रहे हैं।
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बहरहाल, पार्टी ने अपने वर्करों के बीच मंथन शुरू कर दिया है कि पार्टी को भाजपा को अलविदा कह देना चाहिए तो एक सुर में तमाम पार्टी के नेता इस बात से सहमत है कि अगर पार्टी को 2022 में पंजाब में सरकार बनानी है तो भाजपा से किनारा करना ही होगा।
अकाली दल अब दलित, हिंदुओं और पंथक वोट को वापस लाने की रणनीति बनाने में जुट गई है। पंजाब का दलित व अधिकतर सिख वोटर भाजपा के हक में नहीं है, यही वजह है कि गठबंधन पार्टी 2014 व 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा है। अकाली दल की तरफ से अब दोआबा में उन इलाकों में फोकस करने की तैयारी चल रही है, जहां पर दलितों व हिंदुओं का बोलबाला है।
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भाजपा और अकाली दल में खटास के कारण
1- अकाली दल के हरियाणा विधानसभा चुनावों में खट्टर सरकार की जमकर निंदा करना और अपने उम्मीदवार उतारना।
2- दिल्ली में अकाली दल को भाजपा द्वारा आठ सीट न देना और गठबंधन टूटना।
3- आरएसएस के खिलाफ श्री अकाल तख्त साहब द्वारा निंदा करना।
4- शहीद बेअंत सिंह के कातिल राजोआणा की फांसी को जारी रखने की लोकसभा में घोषणा।
5- सीएए का अकाली दल द्वारा इस बात को लेकर विरोध करना कि इसमें मुस्लिम लोगों को भी शामिल किया जाए।
6- पंजाब में अकाली लीडरशिप द्वारा भाजपा को तरजीह न देना।
7- अकाली दल के बागी सुखदेव सिंह ढींढसा को केंद्र सरकार द्वारा पद्मश्री देना।
8- पंजाब की लंबित मांगों चंडीगढ़ पंजाब को देना, एसवाईएल के मामले में भाजपा लीडरशिप द्वारा अकाली दल की बात न सुनना।
2- दिल्ली में अकाली दल को भाजपा द्वारा आठ सीट न देना और गठबंधन टूटना।
3- आरएसएस के खिलाफ श्री अकाल तख्त साहब द्वारा निंदा करना।
4- शहीद बेअंत सिंह के कातिल राजोआणा की फांसी को जारी रखने की लोकसभा में घोषणा।
5- सीएए का अकाली दल द्वारा इस बात को लेकर विरोध करना कि इसमें मुस्लिम लोगों को भी शामिल किया जाए।
6- पंजाब में अकाली लीडरशिप द्वारा भाजपा को तरजीह न देना।
7- अकाली दल के बागी सुखदेव सिंह ढींढसा को केंद्र सरकार द्वारा पद्मश्री देना।
8- पंजाब की लंबित मांगों चंडीगढ़ पंजाब को देना, एसवाईएल के मामले में भाजपा लीडरशिप द्वारा अकाली दल की बात न सुनना।