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एड्स के मरीजों में टीबी होने का सबसे ज्यादा खतरा
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 01 Dec 2013 08:34 AM IST
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में एचआईवी और टीबी की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। यह भी देखा जा रहा है कि एड्स के मरीजों में टीबी की बीमारी होने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है।
देशभर में टीबी के पांच फीसदी मरीजों में एड्स की भी बीमारी है जबकि चंडीगढ़ में यह आंकड़ा ढाई फीसदी है। मतलब चंडीगढ़ में टीबी के कुल मरीजों में ढाई फीसदी एचआईवी पॉजीटिव हैं।
यूटी स्वास्थ्य विभाग के रिवाइज्ड नेशनल टीबी कंट्रोल प्रोग्राम (आरएनटीसीपी) में टीबी-एचआईवी कॉर्डिनेटर डॉ. श्वेता सैनी ने इन तथ्यों को लेकर एक शोध किया है।
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इस शोध को उन्होंने शनिवार को एड्सकॉन-2013 कान्फ्रेंस में पेश किया। उन्होंने एड्स और टीबी के आपसी संबंध पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि एड्स के कारण मरीज के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इस कारण उनमें अन्य बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है। इन मरीजों में सबसे ज्यादा खतरा टीबी का रहता है।
3500 मरीजों पर शोध
डॉ. श्वेता ने चंडीगढ़ के 3500 मरीजों पर शोध किया। 2011 से 2012 तक किए इस शोध में 18 साल से अधिक उम्र के टीबी मरीजों को शामिल किया गया है।
इनमें ढाई फीसदी यानी 88 टीबी मरीजों में एड्स की बीमारी भी पाई गई। इनमें 100 मरीजों की मौत भी हो गई जिनमें सात में टीबी और एड्स दोनों बीमारियां थीं।
एड्सकॉन का हुआ समापन
जीएमसीएच-32 में चल रही दो दिवसीय एड्सकॉन-3 कान्फ्रेंस का शनिवार को समापन हो गया। कान्फ्रेंस के दूसरे दिन चंडीगढ़ केअलावा हैदराबाद, चेन्नई और नई दिल्ली में आए 350 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कान्फ्रेंस के दौरान एड्स के इलाज से संबंधित अहम जानकारियों पर चर्चा की गई।
चंडीगढ़ स्टेट एड्स कंट्रोल की प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. वनीता गुप्ता ने बताया कि एड्स के मरीजों को हौसला नहीं छोड़ना चाहिए। खान-पान की सही आदतों और दवाओं के नियमित सेवन से एड्स के मरीज 20 से 25 साल तक नॉर्मल लाइफ भी जी सकते हैं।
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देशभर में टीबी के पांच फीसदी मरीजों में एड्स की भी बीमारी है जबकि चंडीगढ़ में यह आंकड़ा ढाई फीसदी है। मतलब चंडीगढ़ में टीबी के कुल मरीजों में ढाई फीसदी एचआईवी पॉजीटिव हैं।
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यूटी स्वास्थ्य विभाग के रिवाइज्ड नेशनल टीबी कंट्रोल प्रोग्राम (आरएनटीसीपी) में टीबी-एचआईवी कॉर्डिनेटर डॉ. श्वेता सैनी ने इन तथ्यों को लेकर एक शोध किया है।
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इस शोध को उन्होंने शनिवार को एड्सकॉन-2013 कान्फ्रेंस में पेश किया। उन्होंने एड्स और टीबी के आपसी संबंध पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि एड्स के कारण मरीज के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। इस कारण उनमें अन्य बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है। इन मरीजों में सबसे ज्यादा खतरा टीबी का रहता है।
3500 मरीजों पर शोध
डॉ. श्वेता ने चंडीगढ़ के 3500 मरीजों पर शोध किया। 2011 से 2012 तक किए इस शोध में 18 साल से अधिक उम्र के टीबी मरीजों को शामिल किया गया है।
इनमें ढाई फीसदी यानी 88 टीबी मरीजों में एड्स की बीमारी भी पाई गई। इनमें 100 मरीजों की मौत भी हो गई जिनमें सात में टीबी और एड्स दोनों बीमारियां थीं।
एड्सकॉन का हुआ समापन
जीएमसीएच-32 में चल रही दो दिवसीय एड्सकॉन-3 कान्फ्रेंस का शनिवार को समापन हो गया। कान्फ्रेंस के दूसरे दिन चंडीगढ़ केअलावा हैदराबाद, चेन्नई और नई दिल्ली में आए 350 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कान्फ्रेंस के दौरान एड्स के इलाज से संबंधित अहम जानकारियों पर चर्चा की गई।
चंडीगढ़ स्टेट एड्स कंट्रोल की प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. वनीता गुप्ता ने बताया कि एड्स के मरीजों को हौसला नहीं छोड़ना चाहिए। खान-पान की सही आदतों और दवाओं के नियमित सेवन से एड्स के मरीज 20 से 25 साल तक नॉर्मल लाइफ भी जी सकते हैं।