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कृषि मंत्री का एलान: पंजाब में नहीं लागू होंगे केंद्र के तीनों कृषि कानून, विधानसभा में प्रस्ताव पारित

Fri, 12 Nov 2021 12:17 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Fri, 12 Nov 2021 12:17 AM IST
सार

पंजाब में केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानून लागू नहीं होंगे। यह घोषणा कृषि मंत्री रणदीप सिंह नाभा ने की। कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पास हो चुका है। कृषि मंत्री ने केंद्र से सभी फसलों को एमएसपी पर अनिवार्य खरीद की मांग की। 

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Agriculture Minister said three farm laws of centre will not be implemented in Punjab
पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब के कृषि मंत्री रणदीप सिंह नाभा ने गुरुवार को विधानसभा के विशेष सत्र के आखिरी दिन सदन में केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों को पंजाब में लागू न होने देने का एलान करते हुए इन कानूनों को खारिज करने संबंधी प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने तीनों कृषि कानूनों को देश के संघीय ढांचे पर हमला करार देते हुए कृषि क्षेत्र की रक्षा के लिए इन्हें तुरंत रद्द करने की मांग भी की। 

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विधानसभा में इस प्रस्ताव पर बोलते हुए नाभा ने चिंता जाहिर की कि राज्यसभा में विवादित तीनों कानूनों के पास होने पर विरोधी पक्ष की संख्या के आधार पर विभाजन की मांग को स्वीकार नहीं किया गया था। प्रस्ताव में कहा गया कि समवर्ती सूची की एंट्री व्यापार एवं वाणिज्य संबंधी है और कृषि न तो व्यापार और न ही वाणिज्य है। 
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किसान न तो व्यापारी हैं और न ही व्यापारिक गतिविधियों में शामिल हैं। किसान सिर्फ काश्तकार /उत्पादक होते हैं, जो अपनी उपज को मंडी में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर या व्यापारी द्वारा निर्धारित कीमत पर बेचने लाते हैं। केंद्र सरकार द्वारा समवर्ती सूची की एंट्री 33 (बी) में खाद्य पदार्थ शब्द को कृषि सामग्री (कृषि उपज) के समान होने की गलत व्याख्या कर संसद को गुमराह करने की निंदा की।

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प्रस्ताव में केंद्र सरकार को याद दिलाया गया कि एपीएमसी एक्ट की संवैधानिक वैधता है। यह राज्य के कानून हैं, जो इस धारणा के अधीन बनाए गए हैं कि कृषि और कृषि मंडीकरण राज्य का विषय है। एक्ट के अधीन स्थापित की गई नियमित मंडियों की एक कानूनी बुनियाद, बुनियादी ढांचा और एक व्यापारी या सरकारी खरीद एजेंसी द्वारा की गई हर खरीद को दस्तावेजी रूप देने के लिए एक अच्छी परिभाषित विधि है। 

दूसरी तरफ गैर-नियमित मंडियां बिना किसी बुनियादी ढांचे, बिना किसी संस्थागत सहायता और बिना किसी जवाबदेही के फर्जी व्यापारिक केंद्रों के समान हैं। इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान किसान हितैषी नियमित मंडियों (एपीएमसी मंडियों) को योजनाबद्ध ढंग से खत्म कर व्यापारी समर्थक गैर-नियमित मंडियों में बदलने के केंद्र सरकार के प्रयासों की सख्त निंदा की गई। 

यह भी कहा गया कि 86 प्रतिशत किसानों के पास बहुत थोड़ी जमीन है, जोकि बढ़ई, जुलाहे, मिस्त्री और गैर-हुनरमंद मजदूरों जैसे ग्रामीण श्रमिकों के साथ मिलकर ग्रामीण आर्थिकता की रीढ़ बनते हैं। केंद्र सरकार इन विवादित कानूनों द्वारा उनकी जमीनों और पेशे को छीनकर उनको कारपोरेटों के रहमो-करम पर छोड़ने का रास्ता साफ कर रही है। 

प्रस्ताव में मांग की गई कि सुझाए गए कानूनों में किसानों को कानूनी गारंटी प्रदान की जाए कि उनकी उपज की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर नहीं होगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर कृषि उपज की खरीद करना अपराध होगा। इसके साथ ही सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद लाजिमी होनी चाहिए और व्यापक लागतों को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाना चाहिए।

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