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हादसों ने पैर छीने, जज्बा नहीं... कृत्रिम पैरों से लांघ दिए पर्वत

Fri, 03 Jun 2022 02:15 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Fri, 03 Jun 2022 02:15 AM IST
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Accidents snatched feet, no emotion... Mountains crossed with artificial legs
प्रकाश सिंह सोढ़ी। - फोटो : CHANDIGARH
चंडीगढ़। जीवन में हादसों के बाद अक्सर लोग बिखर जाते हैं। खासकर जब शारीरिक गतिविधियों में अपना हुनर आजमाने वाले व्यक्ति के शरीर का अंग खराब हो जाए तो अपने सपनों को पूरा करना उसके लिए मुश्किल होता है। लेकिन शहर के कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने जीवन के हादसों को चुनौती के रूप में लिया। हादसों में पैर गंवाने के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को जिंदा रखा। कृत्रिम पैरों से पर्वतों को लांघकर झंडे गाड़ कर बताया कि जब सपने बड़े हों और दिल में उसे पूरा करने का जज्बा हो तो लक्ष्य को हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता।
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साइक्लिस्ट-1
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के अगले माह चले गए पैर, कृत्रिम पैर से की पहाड़ों पर चढ़ाई
पंचकूला के सेक्टर-20 निवासी सनत गोयल की उम्र 35 साल है। मार्च 2019 में एक ट्रेन हादसे के दौरान उनका एक पैर खराब हो गया था। इससे एक माह पहले सनत ने 1500 साइक्लिस्टों के साथ नोएडा के गौतम बुद्ध नगर में एक साइकिल चेन बनाई थी। 2 मील लंबी इस साइकिल चेन में मानकों के अनुसार दूरी तय की गई थी। यह चेन गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुई। एक माह हुए हादसे ने सनत को थोड़ा कमजोर किया, लेकिन साइक्लिंग के सपने को उन्होंने अपना लक्ष्य बनाने का मन ही मन प्रण लिया। इसके बाद कृत्रिम पैर लगवाने की प्रक्रिया शुरू हुई। धीरे धीरे कृत्रिम पैर से साइकिल का अभ्यास भी शुरू किया। इसके बाद सनत ने मोरनी से टिक्कर ताल की ओर जाने वाली रोड पर साइक्लिंग की। यह चढ़ाई काफी कठिन मानी जाती है। अपने जज्बे को पहचानने के लिए सनत ने यह मार्ग चुना। इसके बाद चंडीगढ़ से सोलन तक का सफर भी सनत ने साइकिल से ही तय किया।
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साइक्लिस्ट-2
ललित तेरा पैर गया.. दोस्तों की यह बात सुन जैसे सपने बिखर गए
पीजीआई कैंपस निवासी 45 वर्षीय ललित आहूजा मूलरूप से संगरूर के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में जनसेवा का ऐसा फितूर सिर पर सवार था कि किसी ने मदद मांगी और बिना सोचे समझे घर से साइकिल पर निकल पड़ते थे। वर्ष 1997 में एक पतले टायरों वाली साइकिल ली, जिसका बिल आज भी मेरे पास है। ‘हम आपके हैं कौन’ फिल्म रिलीज हुई तब भी 15 किमी दूर साइकिल से जाकर देखकर आए थे। 23 साल की उम्र रही होगी तभी एक गरीब महिला की बेटी के दस्तावेजों पर राजपत्रित अधिकारी से हस्ताक्षर करवाने थे। उसकी चंडीगढ़ में परीक्षा थी। मित्र के सहयोग से धूरी में एक अधिकारी ने हस्ताक्षर करने के लिए सहमति दे दी। दोस्त के स्कूटर से सुबह ही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने निकल गए। रास्ते में एक कार ने स्कूटर को टक्कर मार दी। टक्कर सीधे मेरे पैर पर लगी थी। इस बीच संयोग रहा कि मेरे कुछ मित्र वहां से निकल रहे थे। स्कूटर रास्ते में पड़ा देख वह मौके पर पहुंचे तो सबसे पहली लाइन यही थी कि ललित तेरा पैर गया, उस वक्त ऐसा लगा मानो सपने बिखर गए। इलाज के बाद लगभग आठ माह बिस्तर पर रहा। कुछ दिन लोगों से नजरें भी नहीं मिला पाया। इसके बाद शादी हुई, पत्नी पीजीआई में कार्यरत थी तो यहीं बस गए। इसके बाद साइक्लिंग शुरू की। हौसला बढ़ा तो शिमला तक दो बार साइकिल से जा चुका हूं, वहीं मिर्जापुर तक भी साइकिल से सफर तय कर चुका हूं।
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साइक्लिस्ट-3
पैर नहीं तो क्या...कृत्रिम पैर से नाप लिए मनाली, लेह-लद्दाख और खारदुंगला की चोटी
जीरकपुर निवासी प्रकाश सिंह सोढ़ी की उम्र 35 साल है, लेकिन उनका जज्बा किसी 20 साल के लड़के से कम नहीं है। वर्ष 2004 में एक मैराथन के दौरान प्रकाश सिंह ने 21 किमी की दूरी 2 घंटे 16 मिनट में पूरी की थी। यह उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। साइक्लिंग के शौकीन प्रकाश ने बताया कि वर्ष 2006 में वह बाइक से जा रहे थे, तभी एक ट्रक ने टक्कर मार दी। ट्रक का पहिया उनके पैर के ऊपर से निकल गया और पैर खराब हो गया। हादसे के बाद कृत्रिम पैर लगा। उसके बाद साइक्लिंग शुरू की। छोटी-छोटी दूरी तय करने के बाद थोड़ा हौसला बढ़ा। इसके बाद मनाली-लेह हाईवे से होते हुए लद्दाख में खारदुंगला चोटी तक का सफर तय किया। यह उस समय की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती थी। लगभग 550 किमी की दूरी को अपने समूह के साथ 11 दिनों में पूरा किया। पेशे से इंजीनियर प्रकाश सिंह रास्ते में टेंट बनाकर रुकते और खुद खाना बनाकर खाते हैं। जैसे ही थोड़ा आराम मिलता फिर अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़ते।
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