पंजाब में कौन होगा 'आप' का चेहरा, छोटेपुर या भगवंत?
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विधानसभा चुनाव 2017 के लिए आम आदमी पार्टी किसे अपना चेहरा बनाएगी? इसके लिए पंजाब आप में अभी से चर्चा शुरू हो गई है। आप नेता और पंजाब की जनता जानना चाहती है कि कौन होगा आप की तरफ से पंजाब के मुख्यमंत्री पद का दावेदार? इस पद के लिए केजरीवाल की पसंद कौन होगा? चुनाव में उनकी क्या भूमिका रहेगी?
बहरहाल विधानसभा चुनाव में पार्टी के चेहरे के रूप में छोटेपुर और भगवंत मान के ही नाम चल रहे हैं। छोटेपुर अनुभवी सियासतदान हैं। लंबे समय से सियासत में हैं और पंजाब की राजनीति का अच्छा खास अनुभव उनके पास है।
वहीं, भगवंत मान लोगों की पसंद माने जाते हैं। लोकसभा चुनाव में तो वह बड़े अंतर से जीते ही थे, अब उनकी सभाओं में लोग भी खूब उमड़ते हैं।
ऐसे में सबकी निगाहें पार्टी हाईकमान पर टिकी हुई हैं कि वह किसे अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है। हालांकि, मौजूदा स्थिति में तो गुटबाजी से उबरना ही पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है।
पंजाब में आप के बिखरे-बिखरे से सुर
पंजाब कांग्रेस की तरह ही प्रदेश में आम आदमी पार्टी (आप) भी बिखरी-बिखरी सी दिखाई पड़ रही है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य पर एक बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सामने आई आप करीब सवा साल बाद ही जबरदस्त धड़ेबंदी का शिकार हो चुकी है।
पार्टी का ताजा घटनाक्रम 2017 के विधानसभा चुनाव में एक सशक्त विकल्प बनने के रास्ते में बड़ी बाधा सरीखा दिखाई पड़ने लगा है। यूं तो पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी डेढ़ साल बाकी है और तब तक परिस्थिति क्या होगी, इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी होगा।
लेकिन मौजूदा हालात में आप की प्रदेश इकाई की हालत चिंताजनक है। प्रदेश इकाई के नए ढांचे का गठन होते ही उभरे बगावती सुर बीते शनिवार को रक्खड़ पुण्या के अवसर पर बाबा बकाला में आप की दो अलग-अलग स्टेज लगने के साथ ही इतनी ऊंचाई पर पहुंच गए कि दल के चार में से दो सांसदों का निलंबन हो गया।
छोटेपुर के कनवीनर और योगेंद्र के हटने से बिखराव तेज
लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद प्रदेश में आप को अकाली-भाजपा तथा कांग्रेस के एक मजबूत विकल्प के रूप में देखा जाने लगा। डॉ. धर्मवीर गांधी को लोकसभा में आप संसदीय दल का नेता नियुक्त किया गया, लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे अलग-अलग मुद्दों पर प्रदेश के पार्टी नेताओं में परस्पर विरोधी बयानबाजी शुरू हो गई।
सुच्चा सिंह छोटेपुर को प्रदेश इकाई का संयोजक बनाए जाने के साथ ही पार्टी के भीतर से ही उनका विरोध शुरू हो गया, लेकिन वह अपने पद पर बने रहे। 2015 की शुरुआत में आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल और नेता योगेंद्र यादव के बीच खींचतान शुरू होने साथ ही पंजाब इकाई का बिखराव भी गति पकड़ गया।
डॉ. धर्मवीर गांधी, योगेंद्र यादव के समर्थन में आए गए। इसका खामियाजा उन्हें कुछ ही समय बाद भुगतना पड़ा। अप्रैल 2015 में संगरूर से पार्टी सांसद भगवंत मान को डॉ. गांधी की जगह आप संसदीय दल का नेता बना दिया गया। फिर पंजाब इकाई के नए ढांचे का गठन हुआ और सुच्चा सिंह छोटेपुर को संयोजक के रूप में पद पर बनाए रखा गया।
इसके साथ ही संसदीय क्षेत्रों व निचले स्तर तक प्रभारी तैनात कर दिए गए। इस सारे संगठनात्मक बदलाव में पार्टी के प्रदेश प्रभारी संजय सिंह की अहम भूमिका रही। इसका सांसदों डॉ. गांधी व खालसा ने विरोध किया। उन्होंने भगवंत मान व प्रो. साधु सिंह के भी उनके साथ होने का दावा किया, लेकिन बाद में मान का बयान इसके विपरीत आया।
मान ने कहा कि नई नियुक्तियों के वक्त उनसे सलाह की गई थी। फिर पार्टी में निलंबनों का दौर शुरू हुआ और प्रदेश इकाई की अनुशासनात्मक कमेटी के पूर्व प्रमुख डॉ. दलजीत सिंह को भी निलंबित कर दिया गया। अब नौबत सांसदों डॉ. गांधी व खालसा के निलंबन तक आ पहुंची है। ऐसे में सवाल उठ खड़े हुए हैं कि आप 2017 चुनाव के लिए कैसे तैयारी करेगी और इसका भविष्य क्या होगा?
जनता व्यक्ति विशेष नहीं पार्टी के साथ
आप के इस सारे घटनाक्रम को लेकर प्रदेश इकाई के संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर का कहना है कि पंजाब के लोग किसी व्यक्ति विशेष नहीं बल्कि पार्टी के साथ हैं। जनता अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस दोनों से ही दुखी है। उनके अनुसार लोग बदलाव चाहते हैं और आप को प्रदेश की बागडोर संभालने का मन बना चुके हैं।
ऐसे में पार्टी के ही कुछ नेता इसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. गांधी, खालसा, डॉ. दलजीत आदि की गतिविधियां आप को हानि पहुंचा रही थीं। इसलिए उनके निलंबन का निर्णय बहुत सही है।
इन लोगों को चाहिए कि पार्टी की बेहतरी के लिए काम करें और निजी हित त्याग कर आप के कार्यक्रमों को को आगे बढ़ाएं। छोटेपुर बोले कि वह सबको साथ लेकर चले हैं और आगे भी चलते रहेंगे, लेकिन अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
अकाली-भाजपा गठबंधन, कांग्रेस को फायदे की उम्मीद
मौजूदा हालात में आप की इस आंतरिक लड़ाई का फायदा निश्चित रूप से अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस को मिलने की संभवना सियासी माहिर जता रहे हैं। धड़ेबंदी की शिकार कांग्रेस से निराश और अकाली-भाजपा सरकार के खिलाफ हो चुके वोटर, आप की तरफ आकर्षित हो रहे थे।
लोकसभा में कांग्रेस पक्ष के उप नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह तक ने कह दिया था कि 2017 के चुनाव में उनका मुकाबला अकाली-भाजपा नहीं, बल्कि आप से होगा। ऐसे में पार्टी की फूट का ताजा नजारा वोटरों को भ्रम में डाल रहा है कि वह किधर जाएं।
उपचुनावों में गिरा ग्राफ
2014 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने वाली आप के ग्राफ में इसके बाद हुए उप चुनावों में गिरावट आई। पार्टी पटियाला और तलवंडी साबो विधानसभा उप चुनाव बड़े अंतर से हारी। यहां तक कि इन दोनों ही सीटों पर इसके उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गईं। कहा जाने लगा कि धीरे-धीरे आप का जादू लोगों के सिर से उतरना शुरू हो गया है।