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चंडीगढ़: जिला अदालत पर केसों का बोझ, 60 फीसदी सिर्फ चेक बाउंस के, लॉकडाउन में सामने आए सबसे ज्यादा मामले

Fri, 10 Dec 2021 03:55 PM IST
निवेदिता वर्मा सीमा एस आनंद, अमर उजाला, चंडीगढ़
सीमा एस आनंद, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 10 Dec 2021 03:55 PM IST
सार

असल में कर्ज या बकाया पैसे की रिकवरी के लिए चेक लगाने पर अगर बाउंस हो जाता है तो धारा 138 के तहत केस दर्ज किया जाता है।

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60 per cent cases in Chandigarh District Court are related to check bounce 
चेक बाउंस - फोटो : प्रतीकात्मक

विस्तार

चंडीगढ़ जिला अदालत पर मुकदमों का भारी बोझ है। इनमें से 60 फीसदी मामले तो केवल चेक बाउंस से ही जुड़े हैं। सबसे ज्यादा मामले लॉकडाउन के दौरान सामने आए हैं। अदालत के अनुसार यदि 100 रुपये से कम का चेक बाउंस होता है तो उस पर केस नहीं किया जा सकता, लेकिन यहां ऐसे भी मामले दर्ज हैं, जिनके कारण लंबित केसों की सूची बढ़ रही है। इसकी गंभीरता को यूं भी समझा जा सकता है कि चार कोर्ट तो केवल चेक बाउंस से जुड़े मामलों के लिए ही हैं। 

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असल में कर्ज या बकाया पैसे की रिकवरी के लिए चेक लगाने पर अगर बाउंस हो जाता है तो धारा 138 के तहत केस दर्ज किया जाता है। किसी लोन के डिस्चार्ज के लिए दिया गया चेक बाउंस हो जाता है, तो उस पर भी धारा 138 के तहत केस दर्ज होता है। यदि कोई ईएमआई डिफाल्टर है तो उसे भी धारा 25 के तहत चेक बाउंस में डाल दिया गया है। इसके अलावा कॉमी ऑनलाइन डिफाल्ट जिसमें जुर्माना लगाकर एक दिन की सजा (कलंदरा) दी जाती है, वह भी चेक बाउंस के केसों में शामिल है। इस कारण जिला अदालत में चेक बाउंस के मामले ज्यादा हैं। 
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अधिवक्ता हर्षित ने बताया कि लॉकडाउन की वजह से चेक बाउंस के मामले बढ़े हैं। इसके अलावा चेक बाउंस केस निपटाने के लिए छह माह का समय होता है लेकिन कभी एक पार्टी उपस्थित नहीं होती तो कभी दूसरी। ऐसे में जब दोनों पार्टी इकट्ठी उपस्थित होती हैं तब से इसकी सुनवाई और प्रक्रिया का शुरू होना गिना जाता है। 
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लॉकडाउन के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने विस्तार सीमा आदेश में कहा था कि चेक बाउंस होने के बाद पेमेंट की अवधि पर रोक है। इस रोक के बाद चेक बाउंस के मैटर फाइल नहीं होने चाहिए थे, परंतु निचली अदालतों ने इस पर ध्यान नहीं दिया और केस फाइल होते रहे। अदालत पर अनावश्यक बोझ बढ़ता रहा। चेक बाउंस होने के एक माह के अंदर लीगल नोटिस देना होता है, नोटिस में 15 दिन का समय होता है भुगतान करने का। सुप्रीम कोर्ट ने इस भुगतान पर रोक लगा दी थी। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

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