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1.3 करोड़ का मुआवजा: 24 साल बाद मिला न्याय, चंडीगढ़ में वर्ष 2000 में हुआ था हादसा, दिव्यांग हुआ था व्यक्ति
Sun, 16 Feb 2025 01:23 PM IST
अंकेश ठाकुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: अंकेश ठाकुर
Updated Sun, 16 Feb 2025 01:23 PM IST
सार
सड़क दुर्घटना के पीड़ित का उचित मुआवजा तय करने में 24 वर्षों की देरी पर हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रणाली को आत्म-मूल्यांकन की आवश्यकता है।
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high court
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सड़क हादसे में दिव्यांग हुए व्यक्ति को आखिरकार 24 साल बाद न्याय मिल ही गया है। पीड़ित को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट की तरफ से राहत देते हुए मुआवजे की राशि को भी बढ़ा दिया गया है। अब पीड़ित को 1.3 करोड़ का मुआवजे मिलेगा।
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वहीं, सड़क दुर्घटना के पीड़ित का उचित मुआवजा तय करने में 24 वर्षों की देरी पर हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रणाली को आत्म-मूल्यांकन की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि इसके लिए केवल व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने अपील को स्पीकार करते हुए मुआवजा 7 लाख से बढ़ाकर 1,31,47,200 कर दिया।
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याचिका दाखिल करते हुए गगनदीप उर्फ मोंटी ने बताया कि वर्ष 2000 में एक ट्रक से हादसा हुआ था जिसमें वह पूरी तरह से दिव्यांग हो गया था। वह साइकिल पर डड्डूमाजरा की तरफ जा रहा था और इस दौरान सीटीयू की वर्कशॉप के निकट एक ट्रक चालक ने लापरवाही से ट्रक चलाते हुए याची को टक्कर मार दी। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने 2004 में इस मामले में 7,62,000 रुपये मुआवजा तय किया था। इसके खिलाफ 2005 में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई थी। इस अपील पर किसी न किसी कारण से सालों तक सुनवाई नहीं हो पाई।
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हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार याची को 86 प्रतिशत स्थायी विकलांगता है, लेकिन पीड़ित के आंतरिक अंगों में चोट लगी है और मूत्राशय लगभग क्षतिग्रस्त हो गया है तथा आंत में चोट लगने के कारण बाएं पैर को काटना पड़ा है। इसलिए देय मुआवजे की राशि की गणना करने के उद्देश्य से, विकलांगता को 100 प्रतिश माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए 7 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 1.3 करोड़ रुपये कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पीड़ित को दशकों (कुल 24 वर्षों से अधिक) से उचित मुआवजे से वंचित रखा गया है, दुर्भाग्य से, इस तरह की देरी के लिए हमारी प्रणाली के अलावा किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। इसके लिए आत्मनिरीक्षण और आत्म-मूल्यांकन की आवश्यकता है, ताकि जल्दी निर्णय लेने के लिए खुद को तैयार कर सके, खासकर उन मामलों में जिनमें दर्दनाक या संवेदनशील विषय शामिल होते हैं।