84 के सिख दंगों में मामले में सनसनीखेज खुलासा
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31 अक्तूबर 1984 मे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के तत्काल बाद देश भर मे सिखों के खिलाफ बना माहौल भले ही तत्कालीन प्रतिक्रिया लग रही थी। लेकिन देखते ही देखते लोगों के इस आक्रोश के नरसंहार और लूटपाट मे तब्दील होने की घटनाएं महज प्रतिक्रिया नहीं थी बल्कि यह सब उन्हें सबक सिखाने के लिए किया गया था।
यही नहीं स्थानीय प्रशासन को भी ऊपर से स्पष्ट निर्देश थे कि वे दंगाइयों को नहीं रोकेंगे। समाचार पोर्टल कोबरापोस्ट ने स्टिंग ऑपरेशन में यह खुलासा किया है। पोर्टल ने अपनी तहकीकात मे दिल्ली पुलिस के उन अफसरों को खुफिया कैमरे मे कैद किया है, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में थाना अधिकारी थे।
कोबरापोस्ट ने कल्याण पुरी के तत्कालीन थाना प्रभारी (एसएचओ) शूरवीर सिंह त्यागी, दिल्ली छावनी के एसएचओ रोहतास सिंह, कृष्णा नगर के एसएचओ एसएन भास्कर, श्रीनिवासपुरी के एसएचओ ओपी यादव और महरौली के एचएचओ जयपाल सिंह की बातचीत रिकॉर्ड की है।
समाचार पोर्टल ने दावा किया है कि तत्कालीन पुलिस प्रमुख एससी टंडन ने आसानी से सभी सवालों को टाल दिया जबकि तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस आयुक्त गौतम कौल ने इस बात को ही खारिज कर दिया कि उन्हें दंगों की सीधे तौर पर कोई जानकारी थी।
दंगाइयों को नहीं रोकने का ऊपर से था आदेश
पोर्टल के मुताबिक इन अधिकारियों की स्वीकारोक्ति खुलासा करती है कि वरिष्ठ अधिकारियों ने सिखों के खिलाफ सांप्रदायिक भावनाएं धीरे-धीरे भड़कने की चेतावनियों को अनसुना किया और पुलिस नियंत्रण कक्ष को मिलने वाले आगजनी एवं दंगों के समाचारों के केवल दो प्रतिशत संदेशों को ही दर्ज किया गया।
यही नहीं वरिष्ठ अधिकारियों के कार्रवाई नहीं करने के सबूतों को मिटाने के लिए लॉग बुक को सुविधाजनक तरीके से बदला भी गया जबकि कुछ अन्य अधिकारियों ने तबादला होने की सजा मिलने के डर से कार्रवाई नहीं की।
कोबरापोस्ट ने दावा किया कि इन कुछ पुलिस अधिकारियों ने दंगों संबंधी अपराधों को कम करने के लिए पीड़ितों के शव कहीं और फेंक दिए और पुलिस को निर्देश देते हुए संदेश प्रसारित किए गए कि वह उन दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करे जो इंदिरा गांधी जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे।
शीर्ष अधिकारियों की सरकार से थी सांठ गांठ
कोबरापोस्ट के मुताबिक इनमें से अधिकतर ने खुले तौर पर एक बल के रूप में अपनी नाकामी स्वीकार की जबकि कुछ ने माना कि पुलिस बल के शीर्ष अधिकारियों ने सिखों को सबक सिखाने के लिए उस समय की सरकार के साथ साठगांठ की।
पोर्टल का दावा है कि यह स्टिंग पिछले एक वर्ष में किया गया, जिसकी अधिकतर शूटिंग पिछले दो महीने में की गई है। इस स्टिंग का मकसद 1984 की उस त्रासदी का अवलोकन करना था, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई थी।
पुलिस ने दर्ज नहीं कराने दी प्राथमिकी
कोबरापोस्ट का कहना है कि पटेल नगर के तत्कालीन एसएचओ अमरीक सिंह भुल्लर ने अपने हलफनामे में कुछ स्थानीय नेताओं पर भड़काने और यहां तक कि गुस्साई भीड़ का नेतृत्व करने का आरोप लगाते हुए उनके नाम भी लिए हैं।
कल्याण पुरी में 500 से 600 सिखों को मारा गया। पुलिस ने दंगा पीड़ितों को प्राथमिकी भी दर्ज नहीं कराने दीं और जब उन्होंने प्राथमिकी दर्ज कीं तो भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर हुई हत्या एवं आगजनी के मामलों को एक ही प्राथमिकी में जोड़ दिया।
दंगों के दौरान वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने अपने अधीनस्थों को दंगाइयों पर गोलियां नहीं चलाने दीं और पुलिस ने जिन स्थानों पर आगजनी के मामले दर्ज किए थे। दमकल की गाड़ियों ने भी वहां जाने से इनकार कर दिया।
अमरिंदर के विवादित बयान पर राजनीति गरमाई
1984 के सिख विरोधी दंगों का जिन्न कांग्रेस के सामने एक बार फिर आकर खड़ा हो गया है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के सिख दंगों में आरोपी जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट देने के कथित बयान पर बवाल अभी थमा भी नहीं था कि कोबरापोस्ट के स्टिंग खुलासे से पार्टी की मुश्किलें चुनाव के समय और बढ़ गई हैं।
समाचार पोर्टल ने स्टिंग आपरेशन के जरिए दावा किया है कि 84 के दंगों के समय तत्कालीन सरकार सिख दंगों को रोकने के लिए कदम उठाने में नाकाम रही और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने सिखों को सबक सिखाने के लिए तत्कालीन सरकार के साथ सांठ गांठ की।
गले की हड्डी बने सिख दंगे को कांग्रेस ने फिर दुखद, खेदपूर्ण और अमानवीय बताकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है। पार्टी ने कहा है कि इस हादसे के लिए जो भी दोषी होगा, चाहे वह आरएसएस, भाजपा या कांग्रेस का कार्यकर्त्ता हो, उसे सजा मिलनी चाहिए। पार्टी ने खासतौर से कहा कि इस मामले में वाजपेयी के चुनावी एजेंट भी आरोपी हैं।
चुनाव जीतने के लिए अरूण दे रहे मामले को तूल
पार्टी के प्रवक्ता कह रहे हैं कि अमरिंदर ने ऐसा बयान दिया ही नहीं। फिर भी विवाद थमता नहीं दिख रहा है। गुजरात दंगों से लेकर फर्जी मुठभेड़ के मसले पर नरेंद्र मोदी को घेर रही कांग्रेस को अब एक साथ कई तरफ से मोर्चा लेना पड़ रहा है।
कोबरापोस्ट के खुलासे में सीधे रूप से कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार पर सवाल उठाए गए हैं। पार्टी बचाव में है, जबकि भाजपा आक्रामक हो गई है। भाजपा कांग्रेस से आठ हजार सिखों की हत्या का मुद्दा उठाकर जवाब मांग रही है।
कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मामले में माफी मांग चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस संबंध में भाजपा कार्यकर्त्ता, वाजपेयी के चुनाव एजेंट, कांग्रेस कार्यकर्त्ता जांच के घेरे में है।
इस हादसे में जो भी दोषी हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा अपने नेता अरुण जेटली को अमृतसर में चुनाव जिताने के लिए इस मुद्दे को बेवजह तूल दे रही है।