पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सेवानिवृत्त कर्मचारियों को भी मिलेगा एमएसीपी का लाभ, विभागीय परीक्षा की शर्त नहीं
पटना उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को तीसरे एमएसीपी का लाभ देने से इनकार करने वाले राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय परीक्षा पास करना एमएसीपी के वित्तीय लाभ के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है।
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पटना उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के हित में बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक पूर्व कर्मचारी को तीसरे एमएसीपी का लाभ देने से मना कर दिया गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विभागीय लेखा परीक्षा पास करना एमएसीपी के अंतर्गत वित्तीय लाभ प्राप्त करने के लिए अनिवार्य पूर्व शर्त नहीं है। न्यायमूर्ति कुमार मनीष की एकलपीठ ने रथिंद्र कुमार बोस की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर सभी परिणामी मौद्रिक लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।
विभागीय परीक्षा पास करने की शर्त को आधार नहीं बनाया जा सकता
न्यायालय ने कहा कि एसीपी या एमएसीपी का मुख्य उद्देश्य पदोन्नति के अवसर न मिलने के कारण उत्पन्न सेवागत ठहराव की स्थिति को दूर करना है। अदालत ने पूर्व निर्णयों और उच्चतम न्यायालय के आदेशों का संदर्भ देते हुए कहा कि यह केवल वित्तीय उन्नयन है, न कि कोई कार्यात्मक पदोन्नति। इसलिए विभागीय परीक्षा पास करने की शर्त को वित्तीय लाभ रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने 23 फरवरी 2018 को जारी स्क्रीनिंग कमेटी के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता के दावे को खारिज किया गया था। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को पहले एमएसीपी की तिथि से वास्तविक मौद्रिक लाभ सहित सभी बकाया भुगतान तीन महीने के भीतर प्रदान किए जाएं।
याचिकाकर्ता का सेवा इतिहास
मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता की नियुक्ति 12 फरवरी 1972 को बिहार सरकार के पीडब्ल्यूडी विभाग में जूनियर अकाउंट्स क्लर्क के पद पर हुई थी। बाद में उनकी सेवा को एनएच विंग में स्थानांतरित कर दिया गया था। याचिकाकर्ता को 26 नवंबर 2009 से दूसरे एसीपी व एमएसीपी का लाभ दिया गया। इसके पश्चात वह 31 जनवरी 2012 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने तीसरे एमएसीपी के लाभ के लिए राज्य सरकार के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत किया था। जब इस अभ्यावेदन पर कोई निर्णय नहीं हुआ, तो उन्होंने न्याय के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
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राज्य सरकार का तर्क नहीं माना
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया था कि नियम के अनुसार तीसरा एमएसीपी दूसरे एमएसीपी के 10 वर्ष पूरे होने पर ही देय होता है। सरकार का कहना था कि चूंकि याचिकाकर्ता को दूसरा एमएसीपी 26 नवंबर 2009 से मिला था, इसलिए तीसरा एमएसीपी 26 नवंबर 2019 को देय होता। हालांकि, याचिकाकर्ता इससे पहले 31 जनवरी 2012 को ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। सरकार ने यह भी दलील दी कि विभागीय परीक्षा उत्तीर्ण न करने के कारण दूसरे एमएसीपी में विलंब हुआ था। उच्च न्यायालय ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह अनुचित माना और स्पष्ट किया कि विभागीय परीक्षा से छूट की तारीख से दूसरे एमएसीपी को प्रभावी मानना कानूनन गलत था।