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Lok Sabha Chunav: ‘शिक्षा बिना पीढ़ियां गुजर गईं, पर गांव में नहीं बना स्कूल’, बोले कैमूर पहाड़ी के लोग

Tue, 02 Apr 2024 04:04 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कैमूर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कैमूर Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Tue, 02 Apr 2024 04:04 PM IST
सार

LS Election: कैमूर पहाड़ी नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। जहां जिगनी गांव में केंद्र और बिहार सरकार की योजना तो चलती है, लेकिन वनवासियों को कोई लाभ नहीं मिलता। पूरे गांव में केवल दो चापाकल हैं, जिनमें एक खराब पड़ा है। अब सवाल उठ रहा है कि शिक्षा, पानी और सड़क इस चुनाव में मुद्दा बन पाएंगे?

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LS Polls: Kaimur Pahadi people says Generations passed without education but no school built in Jigani village
कैमूर पहाड़ी गांव के लोग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत देश को आजादी के 77 साल होने को हैं। लेकिन बिहार के कैमूर पहाड़ी के कई गांव ऐसे है, जहां शिक्षा की रोशनी तक नहीं पहुंची। इस बात का जीता जागता उदाहरण है जिगनी गांव, जो चैनपुर प्रखंड के कैमूर पहाड़ी पर बसा है। जहां 60 घरों की बस्ती है। इस बस्ती में महादलित वर्ग के तीन सौ लोग रहते हैं, जो मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

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इस गांव के निवासियों का कहना है कि यहां कई पीढ़ियां गुजर गईं, पर शिक्षा नहीं ले पाईं। इसका कारण है कि गांव में स्कूल नहीं है। दूसरे गांव में स्कूल भी है तो पहाड़ी रास्ते और जंगल से जाना पड़ता है। जंगली जानवरों के डर से बच्चे स्कूल नहीं जाते।
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दूसरे गांव में 15 किमी दूर है स्कूल
ग्रामीणों ने बताया कि 15 किलोमीटर की दूरी पर मझिगवां में स्कूल बना हुआ है। वहीं, ग्रामीण बच्चों विशाल और अमती कुमारी ने बताया कि गांव से स्कूल 15 किलोमीटर की दूरी पर है। वो भी जंगली रास्ते से जाना पड़ता है। डर से स्कूल नहीं जाते, इसलिए पूरे गांव में कोई पढ़ा-लिखा नहीं है। दरअसल, गांव के बच्चे जिनकी उम्र 12 से 13 वर्ष है, वे क, ख, ग, घ और A, B, C, D भी नहीं जानते।
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अन्य ग्रामीण बिहारी, विक्रम, श्याम और चिरौंजी देवी ने बताया कि स्कूल दूसरे गांव में पहाड़ी रास्ते से 15 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है जंगली जानवरों से डर लगता है। इसलिए कोई पढ़ा-लिखा नहीं है। सिर्फ एक श्याम मुसहर पढ़ा है, जिसे विभाग ने केयर टेकर की नौकरी दी। वह भी भभुआ में रहकर किसी तरह मैट्रिक पास हुआ है।
 
लोकसभा चुनाव में शिक्षा, पानी, सड़क बनेगा चुनावी मुद्दा?
जानकारी के मुताबिक, कैमूर पहाड़ी नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। जहां केंद्र और बिहार सरकार की योजना तो चलती है, लेकिन प्रणाली की कमी और लापरवाही के कारण वनवासियों को कोई लाभ नहीं मिलता। 60 घर की बस्ती में सिर्फ आठ से नौ सरकारी आवास बने हैं। पूरे गांव में मात्र दो चापाकल हैं, जिनमें एक खराब पड़ा हुआ है और एक चापाकल के सहारे पूरा गांव पानी पीता है।

 
पीएम खाद्य योजना भी प्रभावी नहीं
ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में पीएम खाद्य योजना भी प्रभावी नहीं है। सिर्फ 10 परिवार होंगे जिनको खाद्य योजना का लाभ मिलता है, बाकी को नहीं। सरकारी राशन दुकानदार दूसरे गांव का रहने वाला है, जब भी लोग राशन के लिए जाते हैं कोई न कोई बहाना बना देता है। जैसे कभी राशनकार्ड न होने का।

गौरतलब है कि कई लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनाव हुए लेकिन नेता जी सिर्फ वोट के लिए ही गांव में दिखाई देते हैं। कैमूर पहाड़ी गांव की समस्या का निदान करने वाला कोई नजर नहीं आता है। अब फिर लोकसभा चुनाव सिर पर हैं।

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