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चिराग तले अंधेरा: अपनों की नाराजगी भांपने में क्यों नाकाम रहा 'मौसम वैज्ञानिक' का बेटा? 'तख्तापलट' की पूरी कहानी

Mon, 14 Jun 2021 12:36 PM IST
kumar sambhava कुमार संभव
Updated Mon, 14 Jun 2021 12:36 PM IST
सार

पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के कुछ दिन बाद ही एलजेपी में बगावत की शुरुआत हो गई थी। उस दौरान पशुपति पारस का एक पत्र सामने आया, जिसमें उनके नेतृत्व में चार सांसदों के अलग होने का जिक्र था।

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How Chirag Paswan fail to understand the displeasure of ljp leaders like Pashupati Kumar Paras all you need to know Bihar Political Crisis
चिराग पासवान - फोटो : PTI

विस्तार

बिहार में राजनीति का नया अध्याय लिख दिया गया। कल तक जो एक राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष था, उसे चंद लम्हों में पैदल कर दिया गया। यूं कह लीजिए कि सियासी चालों ने उसे 'राजा' से 'रंक' बना दिया। दरअसल, लोक जनशक्ति पार्टी यानी एलजेपी में हुए राजनीतिक 'तख्तापलट' से चिराग पासवान की हालत ऐसी ही हो गई है। चिराग पासवान, उन रामविलास पासवान का बेटा है, जिन्हें भारतीय राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था। जिन्हें सियासी मिजाज भांपने में माहिर माना जाता था। फिर ऐसा क्या हुआ कि उनका बेटा ही अपनों की नाराजगी को समझ नहीं पाया? या इस उलटफेर की नींव बिहार विधानसभा चुनाव में ही रख दी गई थी? क्या है इन सियासी दांव-पेचों की पूरी कहानी, जानते हैं इस रिपोर्ट में...

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यह है ताजा घटनाक्रम

सबसे पहले जानते हैं कि बिहार में आखिर हुआ क्या? दरअसल, दिवंगत रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी में सियासी 'तख्तापलट' हो गया। लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी ने छह सीटें जीती थीं। इनमें से पांच सांसदों पशुपति कुमार पारस, चौधरी महबूब अली कैसर, वीणा देवी, चंदन सिंह और प्रिंस राज ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को सभी पदों से हटा दिया। इसके बाद चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस को अपना नेता चुन लिया, जिन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान बगावत कर दी थी। पारस को राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ संसदीय दल का नेता भी बना दिया गया।

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एलजेपी में कब पड़ी फूट?

बिहार की राजनीति पर गौर करें तो पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के कुछ दिन बाद ही एलजेपी में बगावत की शुरुआत हो गई थी। उस दौरान पशुपति पारस का एक पत्र सामने आया, जिसमें उनके नेतृत्व में चार सांसदों के अलग होने का जिक्र था। उस वक्त पशुपति ने इन अटकलों को खारिज किया और कुछ दिन बाद ही उन्हें एलजेपी प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया। हालांकि, इस उलटफेर के लिए विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के रुख को ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला चिराग पर भारी पड़ गया। उस वक्त तो चिराग के इस फैसले से जदयू को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, लेकिन अब वह उसका खमियाजा भुगत रहे हैं। 

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चिराग तले अंधेरा कैसे?

अब सवाल उठता है कि एलजेपी में चिराग तले अंधेरा आखिर कैसे हुआ? सूत्र बताते हैं कि इस तख्तापलट के लिए चिराग पासवान खुद जिम्मेदार हैं। दरअसल, चिराग को सबसे ज्यादा भरोसा अपने चचेरे भाई और समस्तीपुर से सांसद प्रिंस राज पर था, लेकिन प्रिंस राज तब नाराज हो गए, उनके प्रदेश अध्यक्ष पद में बंटवारा कर दिया गया। उस दौरान राजू तिवारी को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। जब चिराग ने जदयू से बगावत की तो हाजीपुर से सांसद और चाचा पशुपति पारस भी नाराज हो गए। इसके अलावा सूरजभान सिंह भी खफा हुए तो उनके भाई व नवादा से सांसद चंदन सिंह ने भी बगावत कर दी। कुल मिलाकर एलजेपी में जो ताजा हालात बने हैं, उनके पीछे चिराग पासवान के एकतरफा फैसले हैं। 

जदयू के इन नेताओं ने बिगाड़ दिया काम

सूत्रों का दावा है कि अपनों की नाराजगी से जूझ रही एलजेपी में आग भड़काने का काम जदयू के तीन कद्दावर नेताओं ने किया। इनमें सांसद राजीव रंजन उर्फ लल्लन सिंह और विधानसभा उपाध्यक्ष महेश्वर हजारी नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि लल्लन सिंह ने सबसे पहले पशुपति पारस को अपने पक्ष में किया। इसके बाद सूरजभान सिंह को पाले में खींचा। वहीं, महेश्वर हजारी ने महबूब अली कैसर को तोड़ा। साथ ही, प्रिंस राज और वीणा सिंह को भी चिराग का साथ छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। 

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