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Bihar : डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को पद्म श्री सम्मान, खेतों में हल चलाने से लेकर कुलपति तक का सफ़र; जेपी भी थे कायल
Mon, 26 Jan 2026 05:00 AM IST
कृष्ण बल्लभ नारायण
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पटना
Published by: कृष्ण बल्लभ नारायण
Updated Mon, 26 Jan 2026 05:00 AM IST
सार
Bihar : डॉ. गोपालजी त्रिवेदी की यात्रा उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों के अभाव में हार मान लेते हैं। वह बताते हैं कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो गांव की पगडंडियों से निकलकर भी सफलता के एवरेस्ट पर पहुंचा जा सकता है।
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गोपालजी त्रिवेदी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अक्सर कहा जाता है कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात। इस कहावत को चरितार्थ किया है मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड अंतर्गत मतलुपुर गांव में जन्मे डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने, जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा। एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार से निकलकर कुलपति के पद तक पहुँचने वाले डॉ. त्रिवेदी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। पिता के निधन के बाद जिस छात्र ने पढ़ाई छोड़कर हल थाम लिया था, उसकी प्रतिभा ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों की कतार में ला खड़ा किया।
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मैट्रिक में किया था टॉप, अखबारों में छपी थी सुर्खियां
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने पूसा उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा दी। उस दौर में उन्होंने अपने संकाय में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर सबको चौंका दिया था। उनकी इस उपलब्धि की चर्चा उस समय के अखबारों में प्रमुखता से हुई थी। इसके बाद उन्होंने लंगट सिंह कॉलेज से विज्ञान में इंटरमीडिएट किया। गणित में गहरी रुचि होने के कारण उन्होंने बीएससी (स्नातक) में भी गणित को ही चुना।
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पिता के निधन से लगा था ब्रेक, मां बनीं प्रेरणास्रोत
सफलता की राह आसान नहीं थी। कॉलेज के दौरान ही पिता के असामयिक निधन ने परिवार को संकट में डाल दिया। इकलौता पुत्र होने के नाते घर की जिम्मेदारी डॉ. त्रिवेदी के कंधों पर आ गई और उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। वह गांव लौट आए और खेती-बारी में जुट गए। हालांकि, उनकी मां ने हार नहीं मानी। डॉ. त्रिवेदी आज भी अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां के संकल्पों को देते हैं।
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यमुना कार्जी ने पहचाना 'कोहिनूर', पोस्टकार्ड पर लिखा था आवेदन
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी की किस्मत तब बदली जब पूसा विद्यालय में विज्ञान शिक्षक की जरूरत पड़ी। वहां महान स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता पंडित यमुना कार्जी की नजर उन पर पड़ी। कार्जी ने उनकी प्रतिभा को भांप लिया और कहा कि इतना तेज दिमाग सिर्फ स्कूल तक सीमित रहने के लिए नहीं है। उनके कहने पर डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मात्र एक पोस्टकार्ड पर आवेदन लिखकर भेजा। अच्छे अंकों के आधार पर उनका चयन हुआ, जहां से उन्होंने स्नातक और परास्नातक की डिग्री ली। इसके बाद सरकार ने उन्हें पीएचडी के लिए भेजा।
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प्रोफेसर से कुलपति तक का सफर
डॉ. त्रिवेदी ने ढोली कॉलेज में प्रोफेसर और जॉइंट डायरेक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। बाद में वह विश्वविद्यालय के निदेशक और अंततः कुलपति के पद तक पहुंचे। उच्च पदों पर रहने के बावजूद उनका जुड़ाव हमेशा मिट्टी और किसानों से रहा। रिटायरमेंट के बाद भी वह आज किसानों को नई तकनीक और लाभ की खेती से जोड़ने के मिशन में लगे हुए हैं।
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जब जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने सौंपी बड़ी जिम्मेदारी
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी के जीवन का एक स्वर्णिम अध्याय लोकनायक जयप्रकाश नारायण से जुड़ा है। एक समय जब मुशहरी क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों से प्रशासन बेबस था, तब जेपी वहां पहुंचे थे। जेपी ने महसूस किया कि इस समस्या की जड़ कृषि और किसानों की बदहाली है। उन्होंने इस समस्या के समाधान और किसानों के उत्थान की जिम्मेदारी डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को सौंपी। उनके कार्यों से प्रभावित होकर जेपी ने उन्हें अपने साथ जुड़ने का आमंत्रण भी दिया था।
उपलब्धियों से भरा परिवार
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। वह कई राष्ट्रीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। उनका परिवार भी समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में जुटा है। उनके पुत्र डॉ. रमन कुमार त्रिवेदी बिहार एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी, पटना के मत्स्य वैज्ञानिक और डायरेक्टर हैं, जबकि उनके एक दामाद पीसीसीएफ (फॉरेस्ट) से सेवानिवृत्त हैं, तो दूसरे एयर इंडिया में चीफ इंजीनियर हैं।