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Bihar: गर्ल्स हॉस्टल हत्याकांड का सच बताने के लिए IPRD कार्ड मांगा, फिर मीडिया को जवाब नहीं दे सकी पुलिस

Wed, 04 Feb 2026 10:02 PM IST
कृष्ण बल्लभ नारायण न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: कृष्ण बल्लभ नारायण Updated Wed, 04 Feb 2026 10:02 PM IST
सार

Bihar News : पटना के गर्ल्स हॉस्टल में हत्या हुई थी, यह सीबीआई जांच की अनुशंसा के समय सरकार ने स्वीकार कर लिया। लेकिन, बिहार पुलिस का रवैया समझ से परे है। पहले सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकारों को बुलाया, फिर सवाल सुनकर निकल लिए अधिकारी।

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Bihar News : IPRD card mandatory for press conference on NEET girls' hostel murder case patna bihar police
पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा और आईजी जीतेन्द्र राणा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार की राजधानी पटना में जहानाबाद की छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। पुलिस ने पहले दुष्कर्म होने से साफ़ इंकार किया, जिस वजह से पोस्टमोर्टम रिपोर्ट आने के बाद पुलिस की फजीहत भी हुई। फिर फॉरेंसिक जांच में छात्रा के अंतःवस्त्रों की चर्चा के बाद यौन शोषण की बात कही गई। इस बीच पुलिस अधिकारियों और बिहार के गृह मंत्री के बड़े-बड़े दावे भी सामने आए, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात। तब तक बजट सत्र का समय नजदीक आ गया, इसलिए सदन में सरकार की किरकिरी न हो, इसके लिए मामले को सीबीआई के पाले में डाल दिया गया। प्रेसवार्ता में जब पुलिस पदाधिकारी से सवाल पूछा गया तो  उन सवालों से भागते नजर आए अधिकारी 

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आमंत्रण भी आश्चर्यजनक 
पुलिस ने अब प्रेसवार्ता करने के लिए सूचना जारी की, लेकिन आश्चर्य यह सूचना भी कुछ अजीब दिखी। साफ संकेत था कि सवाल पूछने वालों की संख्या न के बराबर हो ताकि सवालों से बचा जा सके। प्रेसवार्ता आयोजित की गई। पुलिस ने पूरी कहानी सुनाई, लेकिन अंत में आरोपी कौन है और घटना कहाँ हुई, इस सवाल पर पुलिस ने चुप्पी साध ली। बिना जवाब दिए ही पुलिस के आला अधिकारी उठकर चले गए। अब बिहार सरकार ने जांच की कमान सीबीआई को सौंप दी है। वहीं, सोशल मीडिया पर लापरवाही करने के शोर से बचने के लिए महिला थानाध्यक्ष और एक दारोगा को खानापूर्ति करने के लिए महज निलंबित किया गया।
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परिजनों ने की मामला दबाने की कोशिश, पुलिस ने खुद लिया था संज्ञान
अब पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा ने प्रेसवार्ता में जो बात कही, वह भी आश्चर्यजनक बात है। एसएसपी की दलील है कि छात्रा के परिजनों ने मामले को दबाने और प्राथमिकी  दर्ज न कराने की कोशिश की थी। एसएसपी का यह भी कहना है कि अस्पताल से मिली सूचना के बाद पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की तफ्तीश शुरू की। छात्रा 6 से 10 जनवरी तक प्रभात मेमोरियल अस्पताल में भर्ती थी, जहां डॉक्टरों ने मौत का कारण 'नशे का ओवरडोज' बताया था। परिजनों का कहना है कि अगर मैं मामले को दबाना चाहता था तो फिर चीख-चीख आन्दोलन क्यों करता और लगातार जांच की मांग मैं क्यों कर रहा हूं?
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परिजनों ने धमकी देने का लगाया था आरोप 
परिजन का यह भी आरोप है कि मुझे डीजीपी ने जबरन धमकाया और कहा कि मामले को आत्महत्या मानकर मामला ख़त्म करो। डीजीपी के आवास से जब परिजन बाहर निकलते हुए घर की ओर रवाना हुए तो फिर आखिर किसके कहने पर मुझे पटना एसएसपी के द्वारा घेरकर जबरन बात करने की कोशिश की गई? एसएसपी ने जबरन परिजनों पर दवाब बनाया कि आप मेरे कार्यालय चलिए, वहीं बात होगी, जिसका विरोध परिजनों ने यह कहते हुए किया कि अब आपके कार्यालय में क्या बात करनी है? जो बात करनी है यहीं कीजिए। परिजन जब डीजीपी के आवास से मायूस होकर बाहर निकले और मीडिया के सामने आक्रोशित होकर कहने लगे कि मुझे बिहार पुलिस प्रमुख विनय कुमार ने उनपर दवाब बनाते हुए कहा कि इस मामले को उनको आत्महत्या मानना ही होगा। साथ ही मृतक के चरित्र पर भी डीजीपी के द्वारा ऊँगली उठाए जाने की बात परिजनों के द्वारा कही गई। 
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पुलिस का दावा- सीसीटीवी फुटेज से नहीं की गई कोई छेड़छाड़ 
पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा का कहना है कि हॉस्टल के सीसीटीवी फुटेज की जांच विशेष लैब से कराई गई है। उनका दावा है कि सीसीटीवी फुटेज के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। रिकॉर्ड के अनुसार, छात्रा 5 जनवरी को अपनी एक सहेली के साथ हॉस्टल लौटी थी। उस रात वह अपने कमरे से महज दो बार, सिर्फ दो-दो मिनट के लिए बाहर निकली थी। अगले दिन जब काफी देर तक कमरा नहीं खुला, तो वार्डन और गार्ड ने दरवाजा तोड़ा था।

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प्रेसवार्ता के लिए आमंत्रण - फोटो : अमर उजाला

दवा खाने से मौत की कही बात 
पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा का कहना है कि पुलिस की टेक्निकल टीम को छात्रा के मोबाइल से हैरान करने वाले सुराग मिले हैं। छात्रा ने 24 दिसंबर को इंटरनेट पर साइनाइड और नींद की गोलियों के बारे में सर्च किया था। एसएसपी का कहना है कि जाँच में यह बात सामने आई कि छात्रा 27 दिसंबर से 5 जनवरी तक जहानाबाद स्थित अपने घर पर थी। पटना लौटते वक्त उसने जहानाबाद के अरवल मोड़ स्थित एक मेडिकल स्टोर से एमिटोन प्लस दवा खरीदी थी, जिसकी पुष्टि यूपीआई ट्रांजैक्शन से हुई है। कमरे से बरामद डायरी में छात्रा के मानसिक संघर्ष और निजी परेशानियों का जिक्र है, जिसे अब सीबीआई मुख्य आधार बना रही है।
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बस खानापूर्ति के लिए थानेदारों को किया गया सस्पेंड
पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा का कहना है कि मामले की संवेदनशीलता के बावजूद सूचना देने में देरी और लापरवाही बरतने पर एसएसपी ने सख्त रुख अपनाते हुए  कदमकुआं के अपर थानाध्यक्ष और चित्रगुप्त नगर के थानेदार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। हालांकि परिजन और ग्रामीण इसे महज खानापूर्ति बता रहे हैं। उनका आरोप है कि सोशल मीडिया पर लापरवाही करने के शोर से बचने और महज खानापूर्ति करने के लिए महिला थानाध्यक्ष और एक दारोगा को निलंबित किया गया। उनका मानना है कि यदि पुलिस ने समय रहते तत्परता दिखाई होती, तो साक्ष्यों को और बेहतर तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता था।
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डीएनए टेस्ट के दावे भी झूठे 
एफएसएल रिपोर्ट में यौन हिंसा के संकेत मिलने के बाद एसआईटी और सीबीआई की टीम ने डीएनए जांच की बात कही और परिजन सहित कई लोगों का डीएनए टेस्ट कराया, लेकिन परिणाम फिसड्डी साबित हुआ। परिजनों ने तो यहां तक कहा कि पुलिस मामले की लीपापोती करने के लिए अब हमलोगों को बस परेशान कर रही है। हालांकि पुलिस इस बात का दावा अब भी कर रही है कि इस मामले में वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर संदिग्धों की डीएनए प्रोफाइलिंग कराई जा रही है ताकि दोषियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सके। लेकिन परिजन बताते हैं कि उनकी जानकारी यह है कि अब तक डीएनए टेस्ट के लिए जो सैम्पल लिए गये थे उनकी अब तक जांच हुई ही नहीं है।


मीडिया को चेतावनी, फिर बिना जवाब दिए निकल गए
पटना आईजी जितेंद्र राणा ने मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं। चूंकि मामला नाबालिग से जुड़ा है, इसलिए पोक्सो एक्ट के तहत पीड़िता की पहचान, फोटो या पते को उजागर करना दंडनीय अपराध होगा। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन प्रेस वार्ता के दौरान जब पत्रकारों ने आईजी से पूछा कि  आखिर घटनास्थल कहाँ है? तो वे सवाल टाल गए और बिना जवाब दिए ही कॉन्फ्रेंस छोड़कर चले गए। 
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परिजनों के इन सवालों का कौन देगा जवाब?
अब परिजनों का आरोप है कि उस वार्डन से पुलिस ने पूछताछ क्यों नहीं की? छात्रावास की संचालक नीलम अग्रवाल और श्रवण अग्रवाल से पुलिस ने पूछताछ क्यों नहीं की? परिजनों का सवाल यह भी हैऊ कि इतना हंगामा हो गया लेकिन इसके बाद भी गिरफ्तार किए गये मनीष कुमार को पुलिस ने रिमांड पर लेकर पूछताछ क्यों नहीं की? जब मृतक के परिजनों का कॉल डिटेल्स की जांच की जा सकती है तो फिर निलंबित थानाध्यक्ष रौशनी कुमारी के कॉल डिटेल्स की जांच क्यों नहीं की गई? साथ ही पुलिस ने छात्रावास में रहने वाली अन्य लड़कियों से पूछताछ हुई या नहीं? अगर हुई तो उसके क्या निष्कर्ष निकले? और अगर पूछताछ नहीं हुई तो निश्चित तौर पर घटना के अनुसंधान में कमी मानी जानी चाहिए। सवाल यह भी है कि एसआईटी टीम में उन्ही पदाधिकारियों को शामिल किया गया, जिनपर इस मामले को प्रभावित करने के आरोप लगे थे। क्या बिहार पुलिस में ऐसे सक्षम अधिकारियों की कमी है जो गंभीर मामलों का निष्पक्ष अनुसंधान कर सके?

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