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Bihar News: इस दीपावली मिट्टी के दीये खरीदकर दो फायदा उठाएं; कुम्हारों का घर भी रोशन, पर्यावरण भी बचेगा

Mon, 28 Oct 2024 09:26 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शेखपुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शेखपुरा Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Mon, 28 Oct 2024 09:26 PM IST
सार

Diwali 2024: कुंभकार सुखदेव पंडित ने बताया कि एक समय था जब उनके मिट्टी के बर्तनों की काफी मांग थी, लेकिन आधुनिकता ने इस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है। चाइनीज लाइटों और आधुनिक बर्तनों ने उनके व्यवसाय को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

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Bihar News: Diwali 2024, potters expect good sales of clay diyas, environment, Sheikhpura news
कुम्हार परिवारों को इस दिवाली सिर्फ ग्राहकों से है आस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आधुनिकता और बदलते समय के साथ कई पारंपरिक चीजें विलुप्त होती जा रही हैं, जिनमें से एक मिट्टी के बर्तन भी हैं। प्लास्टिक और एल्यूमीनियम के बर्तनों के चलन ने मिट्टी के बर्तनों की मांग को कम कर दिया है, लेकिन दीपावली के अवसर पर कुंभकारों को एक बार फिर उम्मीद है कि लोग मिट्टी के दीयों का प्रयोग करेंगे। इस दिवाली पर मिट्टी के दिए खरीदने से न सिर्फ घर में पारंपरिक सजावट की सुंदरता बढ़ेगी, बल्कि उन मेहनतकश कुम्हारों के जीवन में भी एक नई रोशनी आएगी जो इन्हें अपने हाथों से बनाते हैं।

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मिट्टी के दीयों के उपयोग के फायदे
मिट्टी के दिए जलाने से पर्यावरण को भी लाभ होता है। पारंपरिक दीयों की लौ से अनचाहे कीट-पतंग उसमें फंसकर समाप्त हो जाते हैं, जिससे फसलों पर उनकी संख्या कम होती है और फसलों को नुकसान भी नहीं पहुंचता। पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी मिट्टी के दीये जलाना प्लास्टिक और चाइनीज लाइटों की तुलना में कहीं अधिक लाभकारी है।
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कुंभकारों के जीवन में बदलाव की आशा
शेखपुरा जिले के बरबीघा नगर परिषद क्षेत्र के सामाचक मोहल्ले में लगभग 40 कुम्हार परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाने के काम में जुटे हुए हैं। इस बार दीपावली पर उन्होंने लाखों मिट्टी के दिए बनाए हैं और उम्मीद की जा रही है कि लोग इन्हें खरीदेंगे।
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85 वर्षीय सुखदेव पंडित और 80 वर्षीय ब्रह्मदेव पंडित जैसे बुजुर्ग आज भी इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। सुखदेव पंडित बताते हैं कि एक समय था जब उनके मिट्टी के बर्तनों की काफी मांग थी, लेकिन आधुनिकता ने इस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है। अब केवल दीपावली पर ही दीये बिकने से उन्हें कारोबार में थोड़ी राहत मिलती है। चाइनीज लाइटों और आधुनिक बर्तनों ने उनके व्यवसाय को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
 
सोशल मीडिया जागरूकता के कारण बढ़ी मांग
उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर जागरूकता अभियानों ने मिट्टी के दीयों की मांग को थोड़ा बढ़ावा दिया है। इसके अलावा, कोरोना महामारी के दौरान मिट्टी के गिलास में चाय पीने का चलन बढ़ा, जिससे थोड़ी अतिरिक्त आमदनी हुई। इसके बावजूद, इस व्यवसाय से होने वाली आय केवल परिवार के गुजारे तक ही सीमित है। कई बुजुर्ग कुम्हार अब भी इस काम में लगे हुए हैं, क्योंकि उनके पास आय का दूसरा कोई साधन नहीं है।

 
धार्मिक मान्यताओं में मिट्टी के दिए का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के दिन मिट्टी के दीयों का उपयोग करना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उनके आशीर्वाद से घर में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही, मिट्टी के दीये जलाने से पर्यावरण का संरक्षण होता है और गरीब कुम्हारों के घरों में भी खुशियों की रौनक आती है।

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