नीतीश के दो 'मंत्रियों' से लालू ने चुकाया पुराना बदला
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बिहार विधानसभा चुनावों में जीत के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी कैबिनेट के साथ कामकाज संभाल लिया है। लेकिन बिहार के साथ साथ देशभर में सबसे ज्यादा बहस इस बात को लेकर ही है कि नीतीश से ज्यादा विधायकों के साथ सरकार में शामिल लालू यादव क्या उन्हें खुलकर काम करने देंगे।
क्या लालू की छत्रछाया में नीतीश कुमार अपना विकास और सुशासन का एजेंडा पूर्व की तरह लागू कर पाएंगे। कुछ लोगों को यह सवाल थोड़ा गैरजरूरी लग सकता है लेकिन नीतीश की कैबिनेट पर अगर नजर डालें तो इसके मायने आसानी से समझ में आ जाएंगे।
जानकारों के अनुसार नवनियुक्त कैबिनेट पर लालू का साया इस कदर रहा कि नीतीश चाहकर भी अपने खास विधायकों को भी मंत्रीमंडल में शामिल नहीं करवा सके।
उनके सबसे खास और पूर्व सरकार में कद्दावर मंत्री रहे श्याम रजक का मंत्रिमंडल से बाहर बैठना कुछ ऐसे ही सवाल खड़े करता है। कुछ ऐसी ही स्थिति पीके शाही की भी है।
लालू के विश्वस्त थे रजक, थाम लिया था नीतीश का दामन
बीती सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री रहे फुलवारी शरीफ के विधायक श्याम रजक की गिनती मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खासमखास में होती है। इस बार भी वह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे तो इस बात की पूरी संभावना जताई जा रही थी कि उन्हें कैबिनेट में जगह दी जाएगी।
लेकिन अचानक इस संभावना पर एकदम से ब्रेक लग गया। बताया जाता है श्याम रजक का नाम नीतीश कुमार चाहकर भी कैबिनेट में शामिल नहीं करवा सके, क्योंकि उनके नाम पर लालू प्रसाद यादव को आपत्ति थी।
इसकी वजह भी आपको बताते हैं, असल में श्याम रजक ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत लालू यादव का दामन थाम कर की थी। राजद के टिकट पर ही वह पली बार विधानसभा में पहुंचे थे। एक समय लालू के खास रहे श्याम रजक को उनका दायां हाथ माना जाता था।
पीके शाही भी हुए लालू के कोप का शिकार
लालू भी उन पर खूब भरोसा करते थे इसलिए उन्हें राजद का राष्ट्रीय महासचिव जैसा पद दिया गया था। लेकिन सत्ता से रुखसत होते ही लालू के बुरे दिन शुरू हुए तो उनके श्याम रजक ने एक झटके में उनका हाथ झटक कर नीतीश कुमार का दामन थाम लिया।
नीतीश ने भी तुरंत उन्हें मंत्री पद से नवाजकर उपकृत करने में देरी नहीं की। श्याम रजक का यही विश्वासघात लालू यादव को आज तक सालता रहा। कुछ इसी तरह लालू के कोप का भाजन बने पूर्व सरकार में शिक्षा और वन पर्यावरण मंत्री रहे पीके शाही।
इस बार उन्हें भी कैबिनेट में जगह नहीं मिल पाई जबकि उनकी योग्यता के कारण नीतीश उन पर काफी विश्वास करते हैं। बताया जाता है कि लालू यादव को चारा घोटाले में जेल की सीखंचो तक पहुंचाने के पीछे पीके शाही का बड़ा योगदान रहा।
मुश्किल से मंत्रीमंडल में जगह पा सके ललन सिंह
नीतीश की पहली सरकार में प्रदेश के महाधिवक्ता रहे शाही को बाद में मंत्रीमंडल में शामिल कर लिया गया था। शाही से लालू की खुन्नस का आलम ये रहा था कि जिस जज ने लालू को चारा घोटाले में सजा का ऐलान किया था लालू ने उन पर शाही के रिश्तेदार होने का आरोप लगा दिया था, हालांकि उनके इस दलील को हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया था।
हालांकि कुछ ऐसा ही किस्सा इस बार मंत्री बनने में सफल रहे ललन सिंह के साथ भी था। ललन सिंह का नाम उन लोगों में शामिल था जिन्होंने लालू यादव को चारा घोटाले में पहली बार कोर्ट में घसीटा था।
लालू आज तक इस बात को नहीं भूले थे इसलिए उन्होंने पूरा प्रयास किया कि ललन सिंह भी मंत्रीमंडल में जगह नहीं पा सकें लेकिन ललन सिंह के मामले में नीतीश उन्हें मनाने में सफल रहे। हालांकि शाही के मामले में लालू के सामने उनकी एक न चल सकी और वह मंत्री मंडल से बाहर ही रह गए।