फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   Durga Puja being celebrated in Madhepura Railway Complex for 80 years

Durga Puja 2023: 80 साल से इस रेलवे परिसर में मनाई जा रही दुर्गा पूजा; 2 जगहों पर खुला माता का पट

Sat, 21 Oct 2023 07:05 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मधेपुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मधेपुरा Published by: हिमांशु प्रियदर्शी Updated Sat, 21 Oct 2023 07:05 PM IST
सार

Navratri 2023: मधेपुरा में सप्तमी के दिन शहर के बंगाली दुर्गा मंदिर और रेलवे दुर्गा मंदिर का पट खोल दिया गया है। जहां श्रद्धालु पहुंचकर माता के दर्शन करने लगे हैं। वहीं, बड़ी दुर्गा मंदिर और गौशाला दुर्गा मंदिर में माता का पट अष्टमी के दिन खुलेगा। उसके बाद रेलवे दुर्गा मंदिर में दसवीं के दिन रावण दहन किया जाएगा।

विज्ञापन
Durga Puja being celebrated in Madhepura Railway Complex for 80 years
मधेपुरा रेलवे परिसर दुर्गा मंदिर के खुले पट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार के मधेपुरा जिला मुख्यालय में दुर्गा पूजा के अवसर पर चार जगहों पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। साथ ही भव्य रूप से मेले का भी आयोजन किया जाता है। शहर के बड़ी दुर्गा मंदिर, बंगाली दुर्गा मंदिर, रेलवे दुर्गा मंदिर और गौशाला दुर्गा मंदिर में भव्य रूप से मेले का आयोजन किया जाता है। खासकर बड़ी दुर्गा मंदिर और बंगाली दुर्गा मंदिर अपने पंडालों को लेकर चर्चा में बना रहता है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा रेलवे दुर्गा मंदिर में रावण दहन को लेकर होती है। जो आकर्षण का केंद्र हमेशा से रहा है।

विज्ञापन


सप्तमी के दिन शहर के बंगाली दुर्गा मंदिर और रेलवे दुर्गा मंदिर का पट खोल दिया गया है। जहां श्रद्धालु पहुंचकर माता के दर्शन करने लगे हैं। वहीं, बड़ी दुर्गा मंदिर और गौशाला दुर्गा मंदिर में माता का पट अष्टमी के दिन खुलेगा। उसके बाद रेलवे दुर्गा मंदिर में दसवीं के दिन रावण दहन किया जाएगा।
विज्ञापन


ऐसा माना जाता है कि जिला मुख्यालय स्थित रेलवे परिसर के दुर्गा मंदिर में श्रद्धालु जो मन्नत मांगते हैं, वह पूरी हो जाती है। यही खास महत्व है इस देवी स्थान का। इस मंदिर का इतिहास वर्षों पुराना है। यहां मां दुर्गा की पूजा वर्ष 1943 से की जा रही है। उस समय यहां पर न तो कोई बिल्डिंग थी और न ही मंदिर अवस्थित था। उस समय यहां दुर्गा पूजा मनाना मील का पत्थर साबित होता था। मधेपुरा स्टेशन परिसर पर मूर्तियां बनाई जाती थीं। उसके बाद इस स्थान पर रखकर पूजा मनाई जाती थी। हालांकि वर्ष 1943 से लेकर वर्ष 1964 तक रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा यहां की पूजा तथा सारी व्यवस्था की जाती थी। उसके बाद वर्ष 1965 में स्थानीय लोगों के द्वारा इस मंदिर को सार्वजनिक दुर्गा मंदिर बनाया गया। उसके बाद तत्कालीन कमिटी के अध्यक्ष कन्हैया पासवान, सचिव अशोक कुमार, व्यवस्थापक दिवंगत बमबाबू यादव, कोषाध्यक्ष अनुज कुमार यादव सहित अन्य रेलवे कर्मियों के द्वारा मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया गया। इसी परिसर में काली मंदिर अवस्थित है, जिसमें नवमी की दिन बलि प्रथा के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


बड़ी दुर्गा मंदिर के पट भी खोले गए


देखने को मिलती है बंगाल की परंपरा
कमेटी के वर्तमान मेला व्यवस्थापक अशोक कुमार यादव ने बताया कि यहां बंगाली परंपरा के अनुसार, नवरात्रि की पूजा की जाती है। यहां की पूजा बंगाल के बर्दवान से आए पुरोहितों के द्वारा की जाती है। इस मंदिर की विशेषता है कि सप्तमी और नवमी के दिन मां स्वयं उपस्थित रहती हैं। उस दिन कुंवारी कन्याओं के द्वारा 108 दीप जलाए जाते हैं। प्रत्येक पूजा में मां का चेहरा परिवर्तित हो जाता है। पूजा के पहले दिन कलश स्थापना से लेकर पूजा के अंतिम दिन महा नवमी तक नियमित रूप से यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। यहां छाती पर कलश स्थापित करने की भी प्रथा चलती थी। वर्ष 2001, 2004 और 2005 में छाती पर कलश लिया गया था। उसके बाद कुछ परेशानियों के कारण इसे मेला कमेटियों के द्वारा बंद कर दिया गया।


सहरसा के कलाकार बनाते हैं प्रतिमा
समिति के व्यवस्थापक ने बताया कि यहां मूर्तियों का निर्माण सहरसा से आए कारीगर के द्वारा किया जाता है। वहीं, पंडाल की व्यवस्था स्थानीय टेंट हाउस के द्वारा की जाती है। साथ ही पूजा के पहले दिन से विसर्जन तक नगाड़ा बजाने वाले वादक बंगाल के मालदा से बुलाए जाते हैं। यह सारी व्यवस्था आयोजन समिति के अध्यक्ष रामावतार यादव, सचिव अशोक चौधरी के अलावा व्यवस्थापक में अशोक कुमार यादव, रामकुमार, अशोक कुमार, गुड्डू, गौतम, प्रशांत, रंजन, साजन, सुरेश सहित अन्य कार्यकर्ताओं के द्वारा किया जाता है। मेला कमेटी के अध्यक्ष कन्हैया पासवान 1965 से अब तक अध्यक्ष पद पर पदस्थापित हैं। स्थानीय लोगों और कमेटी के सदस्यों के द्वारा उन्हें आजीवन अध्यक्ष माना गया है।


रावन दहन की हैं परंपरा
जिला मुख्यालय में यह एकमात्र दुर्गा स्थान है, जहां रावण दहन किया जाता है। यह रावण दहन की प्रथा यहां पर वर्ष 1986 से चली आ रही है। यहां रावण की भव्य आकृति स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाया जाता है। उसमें रंजन शर्मा, रविंद्र कुमार, कुशेश्वर शर्मा, आनंद शर्मा और रंजीत शर्मा शामिल है। कहा जाता है कि दशमी यानी रावण दहन के दिन शहर के सभी जगहों के मेला में लगने वाली दुकानों की बिक्री इसी दिन पर निर्भर करती है, क्योंकि रावण दहन देखने के लिए दूर-दराज से लगभग 30 से 40 हजार लोगों का आगमन होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed