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Hindi News ›   Bihar ›   Celebrities gathered for a dialogue on 'Acharya Sriranjan Suridev: Personality and Creativity'

पटना:  'आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव- व्यक्तित्व एवं कृतित्व' पर संवाद के लिए जुटीं हस्तियां, हिंदी भाषा में योगदान के लिए किया याद

Sat, 04 Dec 2021 11:14 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: Amit Mandal Updated Sat, 04 Dec 2021 11:14 PM IST
सार

आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर हुई अहम चर्चा में मुख्य अतिथि बिहार विधान परिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज टेक्नोलॉजी का युग है, अगर हिंदी टेक्नोलॉजी से जुड़ रही है तो यह बड़ी बात है। 

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Celebrities gathered for a dialogue on 'Acharya Sriranjan Suridev: Personality and Creativity'
'आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' पर संवाद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के तत्वावधान में 'आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन पटना में किया गया। समारोह के संयोजक अभिजीत कश्यप ने सभी गणमान्य अतिथियों का परिचय कराया और उन्हें सम्मानित किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नंद किशोर पांडेय ने की। 

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आज टेक्नोलॉजी का युग है
मुख्य अतिथि बिहार विधान परिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज टेक्नोलॉजी का युग है, अगर हिंदी टेक्नोलॉजी से जुड़ रही है तो यह बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि भले ही राजनीतिक राजधानी दिल्ली है, लेकिन जब भी साहित्यिक राजधानी की बात होगी तो पटना और बनारस ही अग्रणी होगा। सिंह ने कहा कि बिहार में साहित्यकारों की बड़ी परंपरा रही है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर से लेकर श्रीरंजन सूरिदेव का जन्म इसी धरती पर हुआ है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा ही यह रही है कि सभी प्रदेशों की संस्कृति का मिलन एक बिंदु पर होता है, यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। उन्होंने कहा कि साहित्य अगर क्लिष्ट होगा तो उसका प्रचार नहीं होगा इस दृष्टि से हिंदी सही पथ पर बढ़ रही है, क्योंकि वह व्यवहारिक और लोक ग्राह्य हो रही है। 
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प्रो. नंद किशोर पांडेय ने कहा कि भारत ने विश्वगुरु की परंपरा का निर्वहन किया है। उन्होंने कहा कि श्रीरंजन सूरिदेव को राहुल सांकृत्यायन और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परंपरा में देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आचार्य जी को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने आसन से नीचे उतरकर उन्हें सम्मानित किया था। इस अवसर पर बिहार लोकसेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत ने कहा कि रचनात्मकता की त्रिवेणी श्रीरंजन सूरिदेव के व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती थी। भाषा की दृष्टि से वे 'त्रिभाषा परम्परा' के प्रतीक पुरुष थे। उन्होंने कहा कि उनके साहित्यिक आदर्श  शिवपूजन सहाय, नलिन विलोच शर्मा और लक्ष्मी नारायण सुधांशु थे। वे वैदिक ज्ञान परम्परा, बौद्ध दर्शन और जैन चिंतन के प्रकांड अध्येता रहे। 
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हिंदी को वह गौरव दिलाना है जिसकी  वह हकदार है
बिहार विधान परिषद् के सदस्य राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता ने इस अवसर पर कहा कि आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव के साथ उनका व्यक्तिगत संबंध रहा, वे देखने में जितने सुंदर थे उससे कहीं ज्यादा उनके व्यक्तित्व में गहराई थी जो उनके साहित्य में दिखती है। उन्होंने कहा कि श्रीरंजन सूरिदेव और आरसी प्रसाद सिंह बिहार की साहित्यिक विभूतियां हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आज यह समय आ गया है कि हमें हिंदी को वह गौरव दिलाना है जिसकी  वह हकदार है। उन्होंने इसी क्रम में कहा कि मैथिली लिपि लुप्त होती जा रही है। मोबाइल में आ रही नयी तकनीकों ने लिखने-पढ़ने की परंपरा पर चोट की है। उन्होंने कहा कि आज पाश्चात्य जीवन दर्शन को जीने वाले हिंदी का साहित्य सृजित कर रहे हैं, इनके विचार भारतीय चिंतन-दर्शन से दूर दिखाई पड़ते हैं, आचार्यजी जैसे रचनाकारों की आज अत्यधिक आवश्यकता है।

ए एन कॉलेज पटना के प्रधानाचार्य शशि प्रताप शाही ने कहा कि 'साहित्य अकादमी' का कार्यक्रम महाविद्यालय में होना, यह अपने आप में गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि आधुनिक हिंदी के शिल्पी श्रीरंजन सूरिदेव की चर्चा किये बिना हिंदी साहित्य की कल्पना अधूरी है। साहित्य आकदमी, नई दिल्ली के सहायक सम्पादक डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि हम देशभर में ऐसे कर्यक्रम करते रहते हैं ताकि नई पीढ़ी जागरूक हो सके। उन्होंने कहा कि श्रीरंजन सूरिदेव का कर्मक्षेत्र बिहार की धरती थी इसीलिए  इस कार्यक्रम का आयोजन पटना में किया जा रहा है।

दूसरे सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष आनंद शर्मा जोशी ने कहा कि बिहार के साहित्यिक विकास में आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव का योगदान अतुलनीय है ऐसे में उनके नाम पर एक युग का नामकरण होना चाहिए। उन्होंने आचार्यजी की 'मौलिकता के विसर्जन' सिद्धांत पर प्रकाश डाला। डॉ. जोशी ने कहा कि विचारकों और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इस देश में रहा और है जो इस देश को खंड-खंड में विभाजित करना चाहता है, ऐसे समय में देश को जोड़ने का प्रयास आचार्यजी की रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है। 

जो बेहतर इंसान बनाए वही साहित्य है
दिल्ली विश्वविद्यालय की वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ० कुमुद शर्मा ने कहा कि 'आचार्य' शब्द यूं ही प्राप्त नहीं होता। उनकी वैचारिक संवेदना ने उन्हें साहित्य का सिरमौर बनाया। साहित्य के मापदंड को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने कहा कि जो बेहतर इंसान बनाए वही साहित्य है। प्रख्यात साहित्यकार डॉ. कुणाल कुमार ने कहा कि आचार्य जी की विशेषता यह थी कि वे सबका समादर करते थे, उन्होंने कभी किसी को छोटा नहीं समझा। वे किसी भी व्यक्ति के नाम के साथ प्रशंसनीय विशेषण लगाया करते थे। उन्होंने जीवनपर्यंत हिंदी को संभालने का कार्य किया। वे कहा करते थे कि हिंदी विश्वभाषा बनने की तैयारी में है, वे भाषा के मर्म को पहचानते थे। अंग्रेजी और बंगला पर उनकी अच्छी गति थी। 

गुंजन अग्रवाल ने कहा कि बिहार में सबसे ज्यादा पुस्तकों की भूमिका और समीक्षा आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने लिखी है। तृतीय सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में हिंदुस्तानी अकादमी के अध्यक्ष प्रख्यात साहित्यकार डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हमें आचार्यजी की व्यवहारिकता को अपने जीवन में उतारना चाहिए। अपने उद्बोधन में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. शिवनारायण ने कहा पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी, पंडित जानकी वल्लभ शास्त्री की वैदुष्य परंपरा में आचार्य जी को देखा जाना चाहिए इसीलिए उन्हें भी पंडित कहा जाना चाहिए। बिहार साहित्यिक पत्रकारिता का गढ़ रहा है, श्रीरंजन सूरिदेव ने बिहार की साहित्यिक पत्रिका को व्यापक रूप से समृद्ध किया।


प्रख्यात साहित्यकार कैलाश प्रसाद स्वछंद ने आचार्यजी के व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर प्रकाश डाला। मेहता नगेन्द्र ने आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर एक सुंदर कविता का पाठ किया। इस अवसर पर प्रो. वीरेंद्र झा, डॉ. ध्रुव कुमार, गौरव रंजन, शोभित सुमन, कृष्णा अनुराग, दिव्या, सुमित कुमार आदि ने कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता दी। 

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