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Bihar News: दरभंगा में परंपरागत झिझिया नृत्य को फिर से जीवित करने की कोशिश में जुटे लोग, जानें इसके बारे में
Thu, 19 Oct 2023 11:52 AM IST
अरविंद कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा
Published by: अरविंद कुमार
Updated Thu, 19 Oct 2023 11:52 AM IST
सार
झिझिया नृत्य बिहार के मिथिला क्षेत्र का एक सांस्कृतिक नृत्य है। झिझिया ज्यादातर दुर्गा भैरवी, जो विजय की देवी हैं उनके समर्पण में दशहरा के समय किया जाने वाला नृत्य है। झिझिया करते समय, महिलाएं अपने सिर पर मिट्टी से बनी लालटेन रखती हैं और नृत्य करते समय वे इसे संतुलित रखती हैं।
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झिझिया नृत्य करती हुई महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दरभंगा के मिथिलांचल में दुर्गा पूजा हो और झिझिया नृत्य न हो, ऐसा नहीं हो सकता है। लेकिन अब ये परंपरा मिथिलांचल से विलुप्त सी हो गई है। झिझिया नृत्य एक ऐसी परंपरा रही है, जो महाअष्टमी की रात (निशापूजन) के दौरान इस नृत्य की विधा रही है। जो अब मिथिलांचल से लगभग पूरी तरह समाप्त होकर कुछ मंचों तक सीमित होकर रह गई है। ये एक ऐसी विधा थी कि झिझिया नृत्य देखने के लिए लोगों की आंखों को दुर्गा पूजा का इंतजार रहता था।
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इस साल दुर्गा पूजा की रौनक बढ़ती जा रही है। दरभंगा जिले में सिंहवारा प्रखंड के भरवारा बाजार स्थित एक पूजा पंडाल में शाम होते ही महिलाएं गली-गली से अपने सिर पर झिझिया का घड़ा रखकर भक्ति भाव से नाचते-गाते पूजा पंडाल तक पहुंच रही हैं। झिझिया नृत्य को देखने के लिए सड़कों एवं पूजा पंडालों में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है।
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तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा झिझिया बनलियै यो
दुर्गा पूजा के मौके पर दशहरा के समय सज धजकर महिलाएं सिर पर झिझिया का घड़ा रखकर तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा झिझिया बनलियै यो गीत गाते हुए सड़कों पर निकलती हैं। यह मनोरम दृश्य देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती है। झिझिया के निर्माण में लगी रीता देवी, समुद्री देवी और रामदुलारी सहित अन्य महिलाओं ने बताया कि झिझिया तीन से पांच मिट्टी के घड़ों का बना है। घड़ों में बड़ी संख्या में छिद्र कर झिझिया के लिए तैयार किया जाता है। एक पर एक ऊपर नीचे रख घड़े में दीपक जलाकर मां भगवती की आराधना की जाती है। माना जाता है कि झिझिया को सिर पर रखकर जिन सड़कों से लोग निकालते हैं, वहां की आसुरी शक्ति का नाश होता है। शांति, सद्भाव एवं समरसता बनी रहती है।
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ग्रामीणों ने बताया कि गोनू ग्राम भरवाड़ा में अपनी संस्कृति और संस्कार लौटने लगे हैं। यही कारण है कि बारह साल के बाद पंचायत में पिछले साल पुरजोर ढंग से झिझिया उत्सव फिर से शुरू किया गया है। स्वर्णकार संघ के अध्यक्ष शंभू ठाकुर बालबोध शाह आदि ने बताया, दुरआत्माओं पर विजय का प्रतीक यह उत्सव समाप्त हो रहा था। विकास के इस दौर में हम अपनी संस्कृति को सहेजने की फिर से कोशिश कर रहे हैं। झिझिया लेकर निकली फूलों देवी, इंदु देवी, फुल कुमारी आदि ने बताया कि हम लोगों की अनदेखी के कारण मिथिला से कई पर्व एवं उत्सव विलुप्त हो रहे हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि वाकपटुता के धनी गोनू झा एवं गुनी गरबी दयाल के समय झिझिया उत्सव अपने परवान पर था। कोलकाता, पड़ोसी देश नेपाल से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदार, झाल, करताल के साथ गोनू झा के समकालीन माने जाने वाले गुनी गरबी दयाल के गहवर पर तंत्र सिद्धि के लिए पिछले साल तक पहुंच रहे थे। गहवर के जमीन के विवाद के बाद यह सिलसिला थम सा गया।