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दर्द भरी वह रात: राजधानी एक्सप्रेस की कुछ बोगियां नदी में समाईं, कुछ पुल पर लटकीं; 133 की जान गई थी बिहार में

Thu, 10 Sep 2026 11:36 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Thu, 10 Sep 2026 11:36 AM IST
सार

Bihar News : बिहार में सड़क के पुल आज चर्चा में खूब हैं, लेकिन एक समय रेल हादसों के लिए भी बिहार के पुल कुख्यात रहे थे। आज एक रेल हादसे की बरसी है। 24 साल पहले बिहार के रफीगंज में ट्रेन की कई बोगियां नदी में समा गई थीं

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Tragic Story of rafiganj train accident 2002 howrah-new delhi rajdhani express acciden bihar news
रफीगंज के धावा नदी पर हुई थी ट्रेन हादसा

विस्तार

बिहार के रफीगंज में 9 सितंबर 2002 की रात को याद कर आज भी लोगों की रूह कांप उठती है। हावड़ा से नई दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस धावा नदी पुल पर हादसे का शिकार हो गई थी। तेज रफ्तार ट्रेन के डिब्बे नदी में गिर गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार, अंधेरा और मौत का मंजर था। गांव वालों ने अपनी जान की परवाह किए बिना रातभर राहत और बचाव कार्य चलाया था। हादसे के 24 साल बाद भी रफीगंज के लोगों के दिल में उस रात का दर्द जिंदा है।
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खाना खाकर सोए थे गांव वाले, अचानक गूंज उठी थी चीखें
रफीगंज के ग्रामीण बताते हैं कि 9 सितंबर 2002 की रात बाकी दिनों की तरह ही थी। धावा नदी में पानी का तेज बहाव था और गांव के लोग खाना खाकर अपने घरों में सो चुके थे। अचानक रात करीब 11 बजे एक जोरदार आवाज ने पूरे इलाके को हिला दिया। आवाज सुनकर लोग घरों से बाहर निकले तो सामने का दृश्य देखकर उनके होश उड़ गए। धावा नदी में ट्रेन के डिब्बे पड़े थे। चारों तरफ चीख-पुकार मची हुई थी। ग्रामीण बताते हैं कि कोई अपने परिवार के लोगों को तलाश रहा था तो कोई मदद के लिए आवाज लगा रहा था। घायल यात्री दर्द से कराह रहे थे और अपनों को खोजने के लिए अंधेरे में भटक रहे थे।
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हावड़ा से खुली गया जंक्शन में रुकी और फिर बदल गया सफर
हावड़ा-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस (ट्रेन नंबर 12301) उस दिन हावड़ा जंक्शन से नई दिल्ली के लिए रवाना हुई थी। 9 सितंबर 2002 को शाम करीब 5:15 बजे ट्रेन हावड़ा से खुली थी। सफर के दौरान रात करीब 10:11 बजे राजधानी एक्सप्रेस गया जंक्शन पहुंची थी। यहां ट्रेन का करीब 5 मिनट का ठहराव हुआ। इसके बाद रात करीब 10:16 बजे ट्रेन गया जंक्शन से नई दिल्ली के लिए आगे रवाना हुई। किसी को अंदाजा नहीं था कि गया जंक्शन से खुलने के कुछ ही मिनट बाद यह सफर देश के सबसे दर्दनाक रेल हादसों में बदल जाएगा।
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धावा पुल पर पहुंचते ही मच गई थी तबाही
गया से खुलने के करीब 25 मिनट बाद रात 10:40 से 10:45 बजे के बीच राजधानी एक्सप्रेस रफीगंज के धावा नदी पुल पर पहुंची। ट्रेन तेज रफ्तार में दौड़ रही थी। जैसे ही ट्रेन पुल पर पहुंची, अचानक जोरदार झटका लगा। लोको पायलट को झटका महसूस हुआ और कुछ ही पल में ट्रेन के कई डिब्बे पटरी से उतर गए। तेज रफ्तार के कारण कई कोच नदी में जा गिरे, जबकि कुछ डिब्बे पुल पर खतरनाक तरीके से लटक गए। उस समय रात का अंधेरा था। बारिश हो रही थी और नदी का बहाव तेज था। हादसे के बाद मौके पर सिर्फ चीखें और मदद की पुकार सुनाई दे रही थी।

अंधेरी रात में ग्रामीण बने थे यात्रियों के लिए भगवान
हादसे की जानकारी मिलते ही आसपास के गांवों के लोग मौके पर पहुंच गए। उनके पास न कोई बड़ी सुविधा थी और न ही पर्याप्त रोशनी, लेकिन इंसानियत का जज्बा था।
ग्रामीणों ने अपने हाथों से डिब्बों में फंसे यात्रियों को बाहर निकालना शुरू किया। कई लोग घायल यात्रियों को कंधे पर उठाकर सुरक्षित जगह तक ले गए। एक ग्रामीण ने उस रात को याद करते हुए बताया कि हम लोग सो रहे थे। अचानक इतनी तेज आवाज आई कि लगा कोई बड़ा हादसा हुआ है। बाहर निकलकर देखा तो ट्रेन नदी में गिरी थी। चारों तरफ लोग रो रहे थे। वह मंजर आज भी आंखों के सामने आ जाता है। बारिश और अंधेरे के बीच ग्रामीणों ने पूरी रात बचाव कार्य में मदद की। उनकी कोशिशों से कई यात्रियों की जान बचाई जा सकी।

133 से ज्यादा यात्रियों की चली गई थी जान
इस भीषण हादसे में रेलवे की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार 133 से अधिक यात्रियों की मौत हुई थी, जबकि 150 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। हादसे की जांच में इसे पटरी से छेड़छाड़ से जुड़ा मामला बताया गया था। जांच के बाद रेलवे ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

राहत पहुंचने तक चलता रहा बचाव अभियान
हादसे के बाद रेलवे की रेस्क्यू टीम, मेडिकल टीम और बचाव दल मौके पर पहुंचे। सेना और आपदा प्रबंधन की टीमों ने भी राहत कार्य में हिस्सा लिया। मलबे और नदी से यात्रियों को निकालने का काम पूरी रात और अगले दिन तक चलता रहा। खराब मौसम और कठिन परिस्थितियों के बावजूद बचावकर्मियों ने लगातार प्रयास किया।


24 साल बाद भी रफीगंज नहीं भूला वो दर्द
आज भी हर साल 9 सितंबर को रफीगंज के धावा पुल पर हादसे में जान गंवाने वाले यात्रियों को श्रद्धांजलि दी जाती है। पटरी की पूजा की जाती है और दीप जलाकर मृतकों को याद किया जाता है। ग्रामीण कहते हैं कि वह रात सिर्फ एक हादसा नहीं थी, बल्कि ऐसा जख्म था जो कभी नहीं भर सकता। धावा पुल पर पहुंचते ही आज भी उन्हें वही चीखें, वही अंधेरा और मदद के लिए पुकारते यात्रियों की आवाजें सुनाई देने लगती हैं।
(इनपुट- रंजन सिन्हा, गयाजी)
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