Bihar Election 2025: ओवैसी की पार्टी AIMIM की महागठबंधन में एंट्री पर रार क्यों? बिहार चुनाव में सीटें फंसेंगी
Bihar News : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महागठबंधन सत्ता-विरोधी वोटों में बंटवारा नहीं चाहता है, फिर भी वह न तो पशुपति पारस और न ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को खुलकर हरी झंडी दे रहा है। कहां फंस रहा है पेच?
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लोकसभा चुनाव में बना गठबंधन- 'INDIA' बिहार में नहीं चल सका था। तब भी बिहार में महागठबंधन ही प्रभावी था, क्योंकि इसके दलों ने ही मिलकर चुनाव लड़ा था। गठबंधन- इंडिया में शामिल कोई दल बिहार में नहीं जुड़ा था। बिहार विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन ही चल रहा है। यही कारण है कि गठबंधन- इंडिया की जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस से लेकर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी तक को 'महागठबंधन' और उसके सर्वेसर्वा लालू प्रसाद यादव की ओर उम्मीद भरी नजरों से निहारना पड़ रहा है। पारस लंबे समय से महागठबंधन की ट्रेन में 'प्रतीक्षा सूची' का टिकट लिए बैठे हैं। अब ओवैसी की पार्टी ने भी यही टिकट कटा लिया है। बिहार चुनाव में पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव इन दोनों में से किसका टिकट कन्फर्म करेंगे, यह इंतजार सभी कर रहे हैं। लेकिन, सवाल है कि जब सत्ता-विरोधी दलों का ही जुटान करना है तो आखिर इतना वक्त क्यों लगाया जा रहा है?
एनडीए में रहे सहनी की एंट्री, पारस पर क्यों मेहरबानी नहीं?
पिछले विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तरफ थी। जीतने के बाद धोखा नसीब हुआ तो दूसरी तरफ चली गई, हालांकि इस बीच सहनी को मंत्रीपद का आनंद भी प्राप्त हुआ। लोकसभा चुनाव में मुकेश सहनी सही मायने में तेजस्वी यादव के चुनावी हमसफर बने रहे। साये की तरह साथ रहे। राजग का देश स्तर पर मुकाबला कांग्रेस से था, लेकिन बिहार में तेजस्वी के साथ तो सहनी ही असल लड़ाई में थे। सो, तमाम अफवाहों को दरकिनार करते हुए महागठबंधन की बैठकों में सहनी को तेजस्वी यादव साथ लिए चलते रहे। दूसरी तरफ लोकसभा चुनाव के ठीक पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर महागठबंधन में जाने की सोच लिए पटना आए पशुपति कुमार पारस तभी से महागठबंधन की प्रतीक्षा सूची में हैं। मिलने को वह लालू-तेजस्वी से कई बार मिल चुके, लेकिन अब भी महागठबंधन में उनकी एंट्री का इंतजार ही है।
ओवैसी को लेकर उसी तरह का अविश्वास तो नहीं महागठबंधन में?
पशुपति पारस को मौखिक आश्वासन कई बार मिल चुका है, लेकिन महागठबंधन की बैठक तक वह नहीं पहुंच सके हैं। महागठबंधन, खासकर राष्ट्रीय जनता दल ही उनपर भरोसा नहीं कर सका है। पारस लोकसभा चुनाव के पहले भतीजे चिराग पासवान को तरजीह मिलने से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से मिली केंद्रीय मंत्री की कुर्सी छोड़ आए थे, लेकिन जब महागठबंधन में बात नहीं बनी तो वह कुछ समय के लिए वापस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजग के आसपास मंडराते दिखे थे। इसी तरह का परीक्षण अगर ओवैसी की पार्टी को लेकर करें तो एकबारगी नजर आता है कि महागठबंधन के सभी दल इस पार्टी को भारतीय जनता पार्टी का बी टीम कहता रहे हैं।
बी टीम कहने के पीछे यह तर्क भी रहा है कि भाजपा या उससे जुड़े दलों के सामने लड़ रही पार्टी को ही अबतक इसके कारण नुकसान हुआ है। अब भी, जब ओवैसी की पार्टी ने खुलकर महागठबंधन के सभी दलों को अपनी चाहत बताई है, राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कह रहे हैं- "ओवैसी की पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड भाजपा के लिए काम करने का रहा है। इस बार सेक्युलर वोट वैसे भी कहीं नहीं जा रहा है, तेजस्वी यादव के साथ है। ऐसे में गैर-सांप्रदायिक ताकत जब तेजस्वी यादव के साथ है तो किसी नए दल के प्रवेश का फैसला आगे-पीछे देखकर ही लिया जाएगा।" बिहार के पिछले चुनाव परिणाम को देखें तो ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटें जीती थीं। यह विधायक बिहार विधानसभा में महागठबंधन की तरफ नहीं थे। सत्ता के साथ तो नहीं ही थे। ऐसे में इनमें से चार को तेजस्वी यादव ने अपने साथ बुला लिया। यह बुलावा सरकार बनाने के नजरिए से काम नहीं आया, लेकिन संदेश चला गया कि AIMIM के टिकट पर जीते इन चारों की आस्था ओवैसी के प्रति कम थी।
सीटों के बंटवारे में फंसेगी रार, इस कारण फैसले के लिए हो रहा इंतजार
दरअसल, लोकसभा चुनाव की तरह लालू प्रसाद यादव मनमाने तरीके से सीटें नहीं बांटने लगें; इसे ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने शुरुआत में ही इसकी रणनीति पर काम शुरू कर दिया था। यही कारण है भले ही ओवैसी ने महागठबंधन के सभी दलों के सामने इच्छा जाहिर की है, लेकिन कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ नेता तारिक अनवर कह रहे हैं कि "कोई एक पार्टी (राजद का नाम लिए बगैर) इसका फैसला नहीं लेगी।" चाणक्य इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- "बिहार चुनाव में दोनों ही तरफ के गठबंधन में रार तो सीट बंटवारे पर ही होनी है। राजग के अंदर दल तय हैं। बाकी बचे दलों में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी और कुमारी मायावती की बहुजन समाज पार्टी को छोड़ सभी के पास महागठबंधन ही विकल्प है। ऐसे में जो दल, जिसे एंट्री दिलाएगा- पिछले चुनावों के पैटर्न से वह अपने ही खाते की सीटें उसे देगा। जैसे, वीआईपी को यहां राजद कोटे से सीटें मिली थीं। तो, राजद से पारस या ओवैसी की पार्टी को हरी झंडी में सीटें बांटने का संकट ही शायद असल मुद्दा है।"
"चाहे असदुद्दीन ओवैसी हों, राजद हो, या कांग्रेस हो, ये सभी धर्म की राजनीति करते हैं, इसलिए इनका एक साथ आना सामान्य बात है। हालांकि, अभी यह थोड़ा मुश्किल लग रहा है। अब तक, कांग्रेस और राजद ओवैसी को पीएम मोदी की 'बी टीम' कहते थे... फिर भी, बिहार में भाजपा का वोट बरकरार रहेगा; यहाँ तक कि अगर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बिहार आती हैं, तो भी कुछ नहीं बदलेगा। NDA 2025 के बिहार चुनावों में सरकार बनाने जा रहा है।"
मनन कुमार मिश्रा, राज्यसभा सांसद- भाजपा