माउंटेन मैन के गांव में अलग है बिहार चुनाव का रंग
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बिहार की राजधानी पटना से करीब दो सौ किलोमीटर दूर गया जिले के इस दूरदराज गांव में चुनावी रंग बेहद दिलचस्प है। माउंटेन मैन यानी पहाड़ काट कर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी केइस गांव और आसपास के गावों के दलितों को शिकायत है कि विकास के नाम पर उनके लिए जो भी योजना या सहायता सरकार से आती है, उसे मजबूत और दबंग सवर्ण अपनी बस्ती के लिए हड़प लेते हैं।
लेकिन दिलचस्प यह है कि बदले समीकरणों की वजह से यहां के दलित और महादलित जिनमें बहुतायत पासवान और मुसहर हैं, इन्हीं सवर्णों के साथ खड़े हैं और विधान सभा चुनाव में एनडीए को वोट देने का मन भी बना चुके हैं।
वजह सिर्फ एक है कि उनके नेता जीतन राम मांझी और राम विलास पासवान एनडीए केपाले में हैं। इन दलितों को उम्मीद है कि शायद अब उनके दिन बहुर सकते हैं।
सब दशरथ बाबा की देन
गहरौल गांव के दीपक पांडे कहते हैं कि वोट मांगने तो सब आ रहे हैं,
लेकिन गांव और आस पास के इलाके के विकास की सुध कभी किसी ने नहीं ली। गांव
के शिक्षक मनोज कुमार कहते हैं कि गहरौल में विकास के नाम पर सड़क और स्कूल
दशरथ बाबा (दशरथ मांझी) की देन है।
किसी और का कोई योगदान नहीं है। अपनी
पत्नी की तकलीफ दूर करने के लिए पूरा पहाड़ काटकर रास्ता बनाने वाले दशरथ
मांझी इसी गांव की एक दलित बस्ती में रहते थे। उन्हें जो सरकारी जमीन मिली
थी, उस पर उन्होंने दशरथ नगर नाम से एक दलित बस्ती बसाई। जो सड़क के किनारे
बसी है और जहां दशरथ मांझी की मूर्ति भी लगी है।
पहाडिय़ों से घिरे इस पूरे इलाकेमें कुदरत ने तो अपने नजारे बिखेरने में कोई कोताही नहीं की, लेकिन शासन प्रशासन और सियासत ने कभी यहां की चिंता नहीं की। इसीलिए गहरौल और आसपास के गावों में बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं।
बुनियादी सुविधा का अभाव
विकास के नाम पर अगर कुछ है तो वह चमचमाती सड़क है जो गया से
नवादा जाने वाले राजमार्ग पर स्थित भिंडज चौराहे से इस इलाके को जोड़ती है।
यह सड़क दशरथ मांझी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कहकर बनवाई थी।
गहरौल
में तो फिर भी हालत कुछ बेहतर हैं क्योंकि दशरथ मांझी के प्रयासों से सड़क
और स्कूल यहां के लोगों को मिल गए। लेकिन मझौली,करधनी भिनटौली,सुंदरपुर
जैसे अनेक गावों में अभी भी हर बुनियादी सुविधा का अभाव है।
मांझी(मुसहर)
और पासवान बिरादरी की बहुलता वाले इस इलाकेके तमाम गावों में दलितों और अति
पिछड़े वर्ग केमजदूरों को मनरेगा जैसी केंद्र सरकार की रोजगार योजना का भी
कोई लाभ आजतक नहीं मिला।
नहीं है एक भी शौचालय
प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान के तहत आंकड़ों
में कितने भी शौचालय क्यों न बन गए हों लेकिन इस इलाके के गावों की दलित
बस्तियों में एक भी शौचालय नहीं बना है। महिलाएं और पुरुष, बच्चे बूढ़े सभी
खुले में शौच जाने को विवश हैं।
करधनी भिनटौली गांव की मांझी टोली में
मुसहरों के करीब डेढ़ हजार परिवार हैं। यहां के शिव वचन मांझी बताते हैं
कि उनकी बस्ती में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे विकास के नाम पर गिनाया जा सके।
पास ही खड़े प्रयाग मांझी कहते हैं कि एक स्कूल उनकी बस्ती के लिए मंजूर
हुआ था, लेकिन उसे गांव के दबंग राजपूतों ने अपने टोले में बनवा लिया।
मुसहरों ने जब आवाज उठाई तो उन्हें मारपीट कर चुप करा दिया गया। घूंघट
उठाकर लछमिनिया देवी कहती हैं कि हम अपनी बात किससे कहें कोई सुनने वाला
नहीं है।
फिर भी देंगे मांझी को वोट
इलाके के ज्यादातर दलित और अति पिछड़े आस पास के ईंट भट्टों में
मजदूरी करके आजीविका चलाते हैं। एक हजार ईंटों की पथाई के एवज में पति
पत्नी को करीब तीन से चार सौ रुपए मिलते हैं।
साथ में दिन में जो खाना दिया
जाता है, उसके पैसे काट लिए जाते हैं। इसके अलावा रोजगार का ओर कोई साधन
नहीं है। भट्टा मजदूर राजेंद्र यादव कहते हैं कि उन लोगों को आज तक मनरेगा
के एक रुपए तक का लाभ नहीं मिला।
अपनी इस बेहाली के बावजूद ये दलित और
महादलित इस बार अपने नेता जीतनराम मांझी और रामविलास पासवान के नाम पर एनडीए
के उम्मीदवारों को वोट देने का मन बना चुके हैं