श्रावण शुक्ल पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के अवसर पर शुक्रवार को अहिल्याबाई घाट पर ब्राह्मणों ने वैदिक परंपरा के अनुसार श्रावणी उपाकर्म किया। विप्र समाज उत्तर प्रदेश और अति प्राचीन संस्था शास्त्रार्थ महाविद्यालय, दशाश्वमेध के संयुक्त तत्वावधान में शुक्लयजुर्वेदीय माध्यांदिनी शाखा के ब्राह्मणों ने अनुष्ठान में हिस्सा लिया। वैदिक पं. विकास दीक्षित के आचार्यत्व में सबसे पहले हेमाद्रि संकल्प कराया गया। इसमें सनातन वैदिक परंपरा के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति से वर्तमान समय तक के कालखंड, भूगोल और पंचांग का उल्लेख किया गया। अनंत कोटि ब्रह्मांड, सात लोक, जम्बूद्वीप, भारतवर्ष की पवित्र नदियों और पर्वतों का स्मरण किया गया। साथ ही वर्तमान मन्वंतर, युग, संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, तिथि, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का पाठ किया गया। ब्राह्मणों ने वर्षभर में जाने-अनजाने हुए कायिक, वाचिक और मानसिक दोषों के निवारण की प्रार्थना की। इसके बाद दशविध स्नान की प्रक्रिया हुई। इसमें भस्म, मिट्टी, गोमय, पंचगव्य, गोरज, धान्य, फल, सर्वौषधि, कुशोदक और सुवर्ण का प्रयोग किया गया। पंचगव्य से स्नान और उसके पान के बाद भस्मलेपन किया गया। अपामार्ग के पत्तों, कुशा और दूर्वा का भी विधिपूर्वक प्रयोग हुआ। शास्त्रार्थ महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य एवं संस्कृत महाविद्यालय प्राध्यापक समिति उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. गणेश दत्त शास्त्री ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म की परंपरा प्राचीन काल से नदियों और तालाबों के किनारे चली आ रही है। देश-विदेश से जनेऊधारी लोग काशी पहुंचकर इस परंपरा में शामिल होते हैं। गंगा स्नान, तर्पण और आत्मशुद्धि के बाद शास्त्रार्थ महाविद्यालय के सरस्वती भवन में सप्तऋषि पूजन किया गया। ब्राह्मणों ने सप्तऋषियों का पूजन कर वर्षभर धारण किए जाने वाले यज्ञोपवीत को अभिमंत्रित किया। कार्यक्रम में डॉ. आमोद दत्त शास्त्री, डॉ. पवन शुक्ला, डॉ. अशोक पांडेय, पं. विशाल औढ़ेंकर समेत सैकड़ों विद्वान और बटुक शामिल रहे।