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VIDEO: स्वच्छता अभियानों से उलट है हकीकत, कागजों और स्लोगन तक ही सीमित है अभियान

2 अक्टूबर (गांधी जयंती और स्वच्छ भारत दिवस) के अवसर पर देशभर में बड़े-बड़े स्वच्छता अभियानों के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। हर साल त्योहारों और विशेष दिवसों पर कागजी तौर पर बड़े-बड़े बजट और 157 घंटे जैसी नॉनस्टॉप सफाई की योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन जनता की शिकायत है कि शहर की सफाई व्यवस्था सिर्फ कागजों और स्लोगन तक ही सीमित रह गई है। कागजी दावों और जमीनी हकीकत में अंतर वीआईपी इलाकों बनाम आम कॉलोनियां: 2 अक्टूबर के आसपास नगर निगमों और नगर पालिकाओं का पूरा ध्यान मुख्य मार्गों, प्रशासनिक दफ्तरों और वीआईपी इलाकों को चमकाने पर होता है। वहीं दूसरी ओर, अंदरूनी रिहायशी इलाकों, तंग गलियों और मलीन बस्तियों में कचरे के अंबार लगे रहते हैं। जैसे जनौरा, बेनीगंज, सरयू घाट, कोठापर्चा, कारखाना, धनीराम का पुरवा व अन्य इलाके में यही दृश्य है। 2 अक्तूबर को स्वच्छता के दावों की खुली पोल, अयोध्या में जमीनी हकीकत अलग अयोध्या। 2 अक्तूबर को गांधी जयंती और स्वच्छ भारत दिवस पर देशभर में स्वच्छता अभियानों के बड़े-बड़े दावे किए गए। हालांकि, अयोध्या में जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। जनता की शिकायत है कि शहर की सफाई व्यवस्था केवल कागजों और नारों तक ही सीमित रह गई है। हर साल त्योहारों और विशेष दिवसों पर सफाई के लिए बड़े बजट की घोषणाएं होती हैं। 157 घंटे जैसी लगातार सफाई की योजनाएं भी बनती हैं। लेकिन ये योजनाएं अक्सर कागजों पर ही सिमट कर रह जाती हैं। नगर निगमों और नगर पालिकाओं का पूरा ध्यान 2 अक्तूबर के आसपास मुख्य मार्गों, प्रशासनिक दफ्तरों और वीआईपी इलाकों को चमकाने पर केंद्रित रहता है। इसके विपरीत, अंदरूनी रिहायशी इलाकों में स्थिति बदतर बनी हुई है।

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