रात को जंगली जानवरों का डर और दिन में बेसहारा छोड़े गए पशुओं की आफत। मक्की की फसल को बचाने के लिए किसान दिन-रात खेतों में पहरा दे रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी मेहनत पर पानी फिर रहा है। उपमंडल बंगाणा क्षेत्र में इन दिनों मक्की की फसल पकने की चरम अवस्था में पहुंच चुकी है। ऐसे समय में किसानों के सामने फसल को सुरक्षित बचाकर घर तक पहुंचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। किसान अपनी खड़ी फसल को बचाने के लिए खेतों में दिन-रात ठीकरी पहरा दे रहे हैं। रात होते ही जंगली सुअरों और नीलगायों के झुंड खेतों का रुख कर रहे हैं। ये जंगली जानवर मक्की की खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसान रातभर खेतों की निगरानी करने के बावजूद हर जगह अपनी नजर नहीं रख पा रहे हैं। किसानों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। दिन निकलते ही जंगली बंदर खेतों में पहुंचकर मक्की की फसल को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। इसके साथ ही बेसहारा छोड़े गए पशु भी खेतों में घुसकर फसल को रौंद रहे हैं। ऐसे में किसान समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर वे अपनी फसल की रखवाली किस तरह करें। एक तरफ रात में जंगली जानवरों से खेत बचाने की चिंता रहती है तो दूसरी तरफ दिन में बंदरों और बेसहारा पशुओं से फसल की सुरक्षा करनी पड़ रही है। मक्की किसानों के लिए खेतों में तैयार खड़ी फसल केवल अनाज नहीं, बल्कि पूरे सीजन की मेहनत का परिणाम है। किसान बीज की बुआई से लेकर निराई-गुड़ाई और अन्य कृषि कार्यों में मेहनत और खर्च करते हैं। अब जब फसल तैयार होने की कगार पर है तो जंगली जानवरों और बेसहारा पशुओं से हो रहे नुकसान ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। किसानों का कहना है कि वे अपनी फसल बचाने के लिए रातों की नींद तक त्याग रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद नुकसान रोकना आसान नहीं हो रहा। बंगाणा क्षेत्र के किसानों की स्थिति इन दिनों ऐसी हो गई है कि खेत में खड़ी फसल को बचाने के लिए उन्हें लगातार निगरानी करनी पड़ रही है। रात में जंगली सुअर और नीलगायों के झुंड और दिन में बंदर व बेसहारा पशु किसानों की परेशानी बढ़ा रहे हैं। फसल की रखवाली के लिए किसान खेतों में डटे हैं, लेकिन लगातार पहरा देना भी उनके लिए आसान नहीं है। किसानों के सामने अब यही सवाल है कि आखिर वे अपनी मक्की की फसल को किस तरह बचाएं।