रक्षाबंधन का त्योहार शुक्रवार को नाहन में सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते की खुशियां लेकर नहीं आया, बल्कि शहर की रियासतकालीन पतंगबाजी की परंपरा को भी फिर से जीवंत कर गया। सुबह बहनों से राखी बंधवाने के बाद बड़ी संख्या में शहरवासी घरों की छतों पर पहुंच गए। देखते ही देखते नाहन का आसमान अलग-अलग रंगों की पतंगों से भर गया। छतों पर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में पतंग उड़ाने का उत्साह देखने को मिला। किसी के हाथ में चरखी थी तो कोई डोर संभालकर अपनी पतंग को ऊंचाई देने में जुटा था। जैसे ही किसी की पतंग कटी, छतों से ‘वो काटा...’ और ‘बो काटा...’ की आवाजें गूंज उठीं। त्योहार के उल्लास के बीच पतंगबाजी ने नाहन के माहौल को खास बना दिया। रक्षाबंधन पर नाहन में पतंग उड़ाने की शुरुआत सुबह से ही दिखाई देने लगी थी। परिवारों में राखी के कार्यक्रम के बाद लोग छतों पर जुटने लगे। कई जगह पूरा परिवार इस पारंपरिक मनोरंजन में शामिल नजर आया। बच्चे अपनी पतंग को ज्यादा से ज्यादा ऊंचाई तक ले जाने की कोशिश करते रहे, जबकि बड़े भी पीछे नहीं रहे। पतंगों को काटने और अपनी पतंग बचाने के दौरान छतों पर उत्साह देखते ही बन रहा था। नाहन में पतंग उड़ाने की परंपरा कोई नई शुरुआत नहीं है। स्थानीय स्तर पर इसे सिरमौर रियासत के दौर से चली आ रही परंपरा माना जाता है। समय के साथ मनोरंजन के साधन बदले और मोबाइल व सोशल मीडिया लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बने, लेकिन रक्षाबंधन पर पतंग उड़ाने का आकर्षण आज भी शहर में कायम है। कभी नाहन में हाथ से तैयार की जाने वाली बैरिंग वाली चरखियां और गुड्डी पेपर की पतंगें विशेष पहचान रखती थीं। पतंगबाजी से जुड़े इन पारंपरिक सामानों का भी शहर की इस विरासत में अपना स्थान रहा है। समय के साथ नाहन में पतंगबाजी का उत्साह पहले की तुलना में कुछ कम हुआ है। इसके बावजूद रक्षाबंधन का दिन आते ही शहर की छतों पर पुराना नजारा लौट आता है। इस दिन कई परिवार वर्षों पुरानी परंपरा को अपने बच्चों तक पहुंचाने के लिए पतंग उड़ाते हैं। इस परंपरा की खास बात यह भी है कि इसमें किसी एक वर्ग तक सीमित भागीदारी नहीं रहती। शहर के अलग-अलग समुदायों और वर्गों के लोग मिलकर पतंगबाजी के इस उत्सव में शामिल होते हैं। इस तरह रक्षाबंधन पर नाहन की पतंगबाजी मनोरंजन के साथ सामाजिक मेल-जोल और सौहार्द की तस्वीर भी पेश करती है। आज जब बच्चों और युवाओं का काफी समय मोबाइल और सोशल मीडिया पर गुजर रहा है, ऐसे दौर में रक्षाबंधन पर छतों पर जुटती भीड़ इस पुरानी परंपरा की अहमियत बताती है। नाहन के आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें शहर की उस सांस्कृतिक पहचान की याद दिलाती हैं, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है।