लंपी पीड़ित गोवंश के उपचार के लिए भिवानी के तिगड़ाना मोड़ स्थित गोकुलधाम गो सेवा महातीर्थ के प्रयासों से प्रदेश स्तरीय आइसोलेशन वार्ड स्थापित किया गया है। जिसमें करीब 175 गोवंश का उपचार चल रहा है। आइसोलेशन वार्ड में हरियाणा, यूपी, दिल्ली और राजस्थान से भी लंपी पीड़ित गोवंश पहुंच रहा है वहीं भिवानी जिले में भी करीब 550 गोवंश लंपी की चपेट में आ चुके हैं। प्रत्येक गांव में दो से चार मामले सामने आ रहे हैं। सबसे अधिक प्रभाव ढिगावामंडी, लोहारू, जूई क्षेत्र के पशुपालकों के गोवंश में आया है। 70 से 80 गाय हो चुकी हैं लंपी से ठीक, ढाई माह तक वार्ड में रहेंगी गाय तिगड़ाना मोड़ स्थित आइसोलेशन वार्ड इंचार्ज पूर्व सूबेदार सत्यदेव ने बताया कि लंपी का पूरे प्रदेश में कोई स्पेशल वार्ड नहीं हैं, यहां पर स्पेशल वार्ड में फिलहाल 175 गोवंश उपचाराधीन हैं, जबकि 70 से 80 गोवंश ठीक हो चुकी हैं, जिन्हें पूरी तरह से रिकवर करने के लिए ढाई माह तक निगरानी में यहीं रखा जाएगा। इसके अलावा 24 दिन के अंदर करीब 75 गोवंश की मौत हो चुकी हैं, जिनमें लंपी के लक्षण मिले थे। हालांकि पशुपालन विभाग ने लंपी से अभी किसी भी पशु की मौत की कोई पुष्टि नहीं की है। रोजाना 15 से 20 लंपी पीड़ित पशु आ रहे हैं। जिले में एक लाख 20 हजार गायों का हो चुका वैक्शीनेशन पशुपालन विभाग की तरफ से गायों का वैक्शीनेशन का काम 99 फीसदी पूरा हो चुका है। जिले में एक लाख 20 हजार गायों को वैक्शीन लगाई जा चुकी है। हालांकि कुछ पशुओं के अंदर वैक्शीनेशन होने के बाद भी लंपी के लक्षण सामने आए हैं। ऐसा इसलिए हुआ है कि पहले से आंशिक लंपी संक्रमित गाय को वैक्शीनेशन किए जाने के बाद ये ज्यादा उभर गए हैं। ऐसे पशुओं का संबंधित गोशालाओं में उपचार दिया जा रहा है। लंपी संक्रमित गोवंश के लिए प्रदेश स्तरीय स्पेशल वार्ड बनाया है। इस वार्ड में पशु चिकित्सकों की टीम को निरीक्षण के लिए भेजा है। वहीं रोजाना ही यहां उपचाराधीन गोवंश की सेहत निगरानी के लिए चिकित्सक की ड्यूटी लगाई गई है। फिलहाल लंपी से किसी भी गाय की अधिकारिक पुष्टि नहीं है। लंपी से पीड़ित अधिकाश पशु ठीक हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में लंपी का आंशिक असर है, जिस पर पशु चिकित्सक निगरानी रख उपचार करा रहे हैं। -डॉ रवींद्र सहरावत उप निदेशक पशुपालन विभाग भिवानी। क्या है लंपी लंपी (गांठदार त्वचा रोग) मवेशियों खासकर गायों में गंभीर और संक्रामक वायरल बीमारी है। इसमें पशु को तेज बुखार आता है। बुखार के कुछ दिन बाद पूरे शरीर की त्वचा पर कठोर और दर्दनाक गांठें (फोड़े) उभर आती हैं। ये गांठें बाद में फूट जाती हैं और इनमें से तरल पदार्थ या मवाद बहने लगता है। दुधारू पशुओं के दूध के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। पशु की आंख और नाक से पानी बहना, अत्यधिक लार गिरना, भूख न लगना, और पैरों में सूजन के कारण पशु का लंगड़ाने लगता है। विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैप्रीपॉक्सवायरस नामक वायरस के कारण होती है। मुख्य रूप से मक्खियों, मच्छरों, पिस्सू और चिचड़ जैसे खून चूसने वाले कीड़ों के काटने से फैलती है। संक्रमित पशु के संपर्क में आने या दूषित चारा और पानी के जरिए भी यह स्वस्थ पशुओं में फैल सकती है।