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मौनपालन उद्योग पर भारी पड़ रहे मानवीय हस्तक्षेप और मौसम में आ रहे बदलाव
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उत्तरकाशी। पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम में आ रहे बदलाव, जंगलों की आग, बढ़ते शहरीकरण और खेती-बागवानी में रसायनों के बढ़ते प्रयोग से मधुमक्खी की स्थानीय एपिस सेरेना इंडिका प्रजाति खतरे में है। इन दुष्प्रभावों के चलते मधुमक्खियों की जनसंख्या में गिरावट से न सिर्फ शहद उत्पादन घटा है, बल्कि इसे बागवानी के लिए भी खतरे का संकेत माना जा रहा है।
हिमालयी मौसम के अनुसार ढली मधुमक्खी की एपिस सेरेना इंडिका प्रजाति उत्तरकाशी सहित अन्य पर्वतीय जिलों में फसलों के परागण तथा शहद उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसी वजह से पर्वतीय इलाकों में यही प्रजाति मौन पालन में अपनायी जा रही है। बीते सालों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और प्राकृतिक बदलाव मधुमक्खी की इस प्रजाति पर भारी पड़ रहे है, जिससे पहाड़ी इलाकों में मधुमक्खी की जनसंख्या घटने के साथ ही शहद उत्पादन में गिरावट आई है। राजकीय मौन पालन केंद्र नैनीताल के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में उत्तराखंड के दस पर्वतीय जिलों में कुल 233.49 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन हुआ था, जबकि वर्ष 2018 में यह गिरकर महज 175.93 मीट्रिक टन रह गया। उत्पादन में आ रही गिरावट के चलते ग्रामीण मौन पालन से विमुख होने लगे हैं। मौन पालन में कमी का सीधा असर सेब आदि फलों की बागवानी पर पड़ने का खतरा मंडराने लगा है। पहाड़ी इलाकों में सेब आदि फल वृक्षों में परागण का प्रमुख माध्यम मधुमक्खियां ही हैं।
पहले मैंने अपने घर के आसपास ही मौनपालन के 46 बॉक्स लगाए थे, जिनसे प्रति बॉक्स 5 किलो शहद मिलता था। अब एक बॉक्स से बमुश्किल तीन किलो शहद ही मिल रहा है। साथ ही मधुक्खियां भी आसानी से नहीं टिक पा रही है। अब सिर्फ दस बॉक्स लगाए हुए हैं।
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गौतम भट्ट, मौनपालक उजेली उत्तरकाशी।
सेब आदि फलों की बागवानी में परागण के लिए मधुमक्खी सबसे बेहतर माध्यम है। परागण प्रक्रिया बाधित होने से सेब उत्पादन प्रभावित हो रहा है। उद्यान विभाग से सेब के बागीचों के लिए मौन पालन के बॉक्स की मांग की गई है।
मोहन सिंह राणा, सेब उत्पादक सुक्की उत्तरकाशी।
खेत बागीचों में रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के प्रयोग से मधुमक्खियों का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण, मोबाइल टावरों के रेडिएशन और प्रदूषण से भी यह संवेदनशील कीट प्रभावित हो रहा है।
एनके सिंह, सहायक उद्यान अधिकारी उत्तरकाशी।
मानवीय हस्तक्षेप व प्राकृतिक बदलावों के चलते बीते कुछ साल से पर्वतीय जनपदों में शहद उत्पादन में गिरावट आई है। इन बदलावों को लेकर शोध करने की आवश्यकता है।
हरीशचंद्र तिवारी, मौनपालन विशेषज्ञ, राजकीय मौनपालन केंद्र नैनीताल।
उत्तराखंड के दस पर्वतीय जनपदों में शहद उत्पादन के आंकड़े (मीट्रिक टन में)
जनपद- वर्ष 2017- वर्ष 2018
उत्तरकाशी- 23.56 - 14.88
टिहरी- 11.37 - 7.70
पौड़ी- 18.04 - 11.90
नैनीताल- 67.17 - 42.00
रुद्रप्रयाग- 3.60 - 30.45
चंपावत- 17.10 - 12.14
चमोली- 25.40 - 15.40
पिथौरागढ़- 45.30 - 28.00
बागेश्वर- 7.52 - 4.56
अल्मोड़ा- 14.43 - 8.90
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हिमालयी मौसम के अनुसार ढली मधुमक्खी की एपिस सेरेना इंडिका प्रजाति उत्तरकाशी सहित अन्य पर्वतीय जिलों में फसलों के परागण तथा शहद उत्पादन के लिए उपयुक्त है। इसी वजह से पर्वतीय इलाकों में यही प्रजाति मौन पालन में अपनायी जा रही है। बीते सालों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप और प्राकृतिक बदलाव मधुमक्खी की इस प्रजाति पर भारी पड़ रहे है, जिससे पहाड़ी इलाकों में मधुमक्खी की जनसंख्या घटने के साथ ही शहद उत्पादन में गिरावट आई है। राजकीय मौन पालन केंद्र नैनीताल के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में उत्तराखंड के दस पर्वतीय जिलों में कुल 233.49 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन हुआ था, जबकि वर्ष 2018 में यह गिरकर महज 175.93 मीट्रिक टन रह गया। उत्पादन में आ रही गिरावट के चलते ग्रामीण मौन पालन से विमुख होने लगे हैं। मौन पालन में कमी का सीधा असर सेब आदि फलों की बागवानी पर पड़ने का खतरा मंडराने लगा है। पहाड़ी इलाकों में सेब आदि फल वृक्षों में परागण का प्रमुख माध्यम मधुमक्खियां ही हैं।
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पहले मैंने अपने घर के आसपास ही मौनपालन के 46 बॉक्स लगाए थे, जिनसे प्रति बॉक्स 5 किलो शहद मिलता था। अब एक बॉक्स से बमुश्किल तीन किलो शहद ही मिल रहा है। साथ ही मधुक्खियां भी आसानी से नहीं टिक पा रही है। अब सिर्फ दस बॉक्स लगाए हुए हैं।
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गौतम भट्ट, मौनपालक उजेली उत्तरकाशी।
सेब आदि फलों की बागवानी में परागण के लिए मधुमक्खी सबसे बेहतर माध्यम है। परागण प्रक्रिया बाधित होने से सेब उत्पादन प्रभावित हो रहा है। उद्यान विभाग से सेब के बागीचों के लिए मौन पालन के बॉक्स की मांग की गई है।
मोहन सिंह राणा, सेब उत्पादक सुक्की उत्तरकाशी।
खेत बागीचों में रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के प्रयोग से मधुमक्खियों का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण, मोबाइल टावरों के रेडिएशन और प्रदूषण से भी यह संवेदनशील कीट प्रभावित हो रहा है।
एनके सिंह, सहायक उद्यान अधिकारी उत्तरकाशी।
मानवीय हस्तक्षेप व प्राकृतिक बदलावों के चलते बीते कुछ साल से पर्वतीय जनपदों में शहद उत्पादन में गिरावट आई है। इन बदलावों को लेकर शोध करने की आवश्यकता है।
हरीशचंद्र तिवारी, मौनपालन विशेषज्ञ, राजकीय मौनपालन केंद्र नैनीताल।
उत्तराखंड के दस पर्वतीय जनपदों में शहद उत्पादन के आंकड़े (मीट्रिक टन में)
जनपद- वर्ष 2017- वर्ष 2018
उत्तरकाशी- 23.56 - 14.88
टिहरी- 11.37 - 7.70
पौड़ी- 18.04 - 11.90
नैनीताल- 67.17 - 42.00
रुद्रप्रयाग- 3.60 - 30.45
चंपावत- 17.10 - 12.14
चमोली- 25.40 - 15.40
पिथौरागढ़- 45.30 - 28.00
बागेश्वर- 7.52 - 4.56
अल्मोड़ा- 14.43 - 8.90