{"_id":"5a7b32134f1c1b4f588b74c8","slug":"151802340110-utter-kashi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बदलते मौसम के साथ कहीं खो न जाएं बुरांस के औषधीय गुण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बदलते मौसम के साथ कहीं खो न जाएं बुरांस के औषधीय गुण
Updated Wed, 07 Feb 2018 10:36 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तरकाशी। मौसम में आ रहे बदलाव औषधीय गुण वाले बुरांस पर भारी पड़ रहे हैं। मार्च-अप्रैल में खिलने वाले बुरांस के फूल अब दिसंबर-जनवरी में ही खिलने लगे हैं।
बुरांस के फूल खिलने के लिए सर्दियों के बाद 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती है। अमूमन यह स्थिति मार्च-अप्रैल में ही बनती है, लेकिन बीते कुछ सालों से बुरांस दिसंबर-जनवरी में ही खिलने लगे हैं। बीते पांच वर्ष में दिसंबर-जनवरी में ही अधिकतम तापमान 20 डिग्री से ज्यादा पहुंच रहा है।
उद्यान विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़ के डा. पंकज नौटियाल का कहना है कि समय पहले खिले फूलों के रंग, रस, मात्रा एवं आकार पर असर पड़ रहा है। ऐसे में हृदय रोग, लीवर, किडनी, पाचन तंत्र से जुड़े रोगों में लाभ के लिए बुरांस के जूस का इस्तेमाल करने वालों को इसका खास फायदा नहीं होगा। वन क्षेत्राधिकारी रविंद्र पुंडीर का मानना है कि तापमान में बढ़ोत्तरी के कारण ही यह बदलाव आ रहे हैं।
विज्ञापन
बुरांस की रोडोडेंड्रॉन आरबोरियम प्रजाति पाई जाती है। इसके फूल, पत्ती व जड़ में एंटी डायबेटिक, एंटी ऑक्सिडेंट, एंटी फ्लेमेटरी आदि तत्व पाए जाते हैं, जो दिल, किडनी, लीवर व पाचन तंत्र को स्वस्थ रखते हैं। इसके प्रयोग से कैंसर, त्वचा रोग, मासिक धर्म, हृदय रोग आदि रोगों से पीड़ित लोगों को लाभ मिलता है।
डा. महेंद्रपाल परमार, प्राध्यापक वनस्पति विज्ञान।
विज्ञापन
बुरांस के फूल खिलने के लिए सर्दियों के बाद 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती है। अमूमन यह स्थिति मार्च-अप्रैल में ही बनती है, लेकिन बीते कुछ सालों से बुरांस दिसंबर-जनवरी में ही खिलने लगे हैं। बीते पांच वर्ष में दिसंबर-जनवरी में ही अधिकतम तापमान 20 डिग्री से ज्यादा पहुंच रहा है।
विज्ञापन
उद्यान विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र चिन्यालीसौड़ के डा. पंकज नौटियाल का कहना है कि समय पहले खिले फूलों के रंग, रस, मात्रा एवं आकार पर असर पड़ रहा है। ऐसे में हृदय रोग, लीवर, किडनी, पाचन तंत्र से जुड़े रोगों में लाभ के लिए बुरांस के जूस का इस्तेमाल करने वालों को इसका खास फायदा नहीं होगा। वन क्षेत्राधिकारी रविंद्र पुंडीर का मानना है कि तापमान में बढ़ोत्तरी के कारण ही यह बदलाव आ रहे हैं।
विज्ञापन
बुरांस की रोडोडेंड्रॉन आरबोरियम प्रजाति पाई जाती है। इसके फूल, पत्ती व जड़ में एंटी डायबेटिक, एंटी ऑक्सिडेंट, एंटी फ्लेमेटरी आदि तत्व पाए जाते हैं, जो दिल, किडनी, लीवर व पाचन तंत्र को स्वस्थ रखते हैं। इसके प्रयोग से कैंसर, त्वचा रोग, मासिक धर्म, हृदय रोग आदि रोगों से पीड़ित लोगों को लाभ मिलता है।
डा. महेंद्रपाल परमार, प्राध्यापक वनस्पति विज्ञान।