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जड़ीबूटी की खेती बन सकती है काश्तकारों के लिए संजीवीनी
Updated Mon, 27 Nov 2017 10:18 PM IST
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उत्तरकाशी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल में हुए अपने उत्तराखंड दौरे के दौरान आयुर्वेद को प्रमोट करने के संकेत दिए थे, जिससे उत्तरकाशी में वर्षों से बंजर पड़े सरकारी जड़ीबूटी फार्म व जड़ीबूटी उद्योग के अच्छे दिन आने की उम्मीद जगी है। जिले के 84543 हेक्टेयर में फैले बुग्यालों व इससे बड़े क्षेत्र के जंगलों में संजीवनी समूह की आमील आदि बूूटियों से लेकर कैंसर के उपचार में प्रयुक्त होने वाली वन औषधियों का भंडार बिखरा है। लेकिन फिर भी क्षेत्र में इसके विकास के लिए कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई जा रही है।
जिले में जंगली जानवरों से खेती को नुकसान व मौसम चक्र में आ रहे बदलाव से अलाभकारी कृषि क्षेत्र का दायरा बढ़ने लगा है। ऐसे में किसानों की स्थिति को जड़ीबूटी की खेती संभाल सकती है। यहां आयुर्वेद, युनानी दवाइयों में प्रयोग होने सहित सौंदर्य प्रसाधन, धूप अगरबत्ती, दंत मंजन आदि के निर्माण में काम आने वाली जड़ीबूटियां भी बहुतायत में मिलती हैं। जिसका अभी तक वन तस्करों द्वारा ही फायदा उठाया जा रहा है। बार्सू में सात एकड़ तथा गोरसाली में एक हेक्टेयर का सरकारी जड़ीबूटी फार्म बंजर पड़े हैं। यह फार्म एक-एक दैनिक मजदूरों के भरोसे कागजों में जीवित है।
जिले में भेषज विकास इकाई के अधिकारी विमल कुमार स्वीकारते हैं कि उनके फार्म में न सिंचाई का पानी है और न ही स्टाफ व बजट। यदि यहां किसानों के लिए पौध तैयार करने की व्यवस्था हो तो जड़ीबूटी की खेती से किसानों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। बार्सू गांव के किसान जगमोहन रावत एवं पूर्व प्रमुख विनीता रावत कहते हैं कि इस बार आलू पांच रुपये किलो में बेच कर किसान नुकसान उठा रहा है। यदि उनके गांव के बंजर पड़े फार्म को आबाद किया जाए, तो लोग जड़ीबूटी की खेती करके फायदा उठा सकते हैं। इसकी खेती को जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
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कोट.......
विभाग ने हर्षिल तथा सोनगाड नर्सरी में वन ककडी, कुटकी, अतीस, कूट, केसर, लेवेंडर, बालछड, थुनेर, लादू, सतावर आदि की पौध तैयार करके जंगलों में लगाई है। यहां गांवों में जड़ीबूटी की खेती को प्रोत्साहन मिले, तो किसान गांव में रह कर ही अच्छी कमाई कर सकते है। - आरवी सिंह यादव, एसडीओ वन विभाग।
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जिले में जंगली जानवरों से खेती को नुकसान व मौसम चक्र में आ रहे बदलाव से अलाभकारी कृषि क्षेत्र का दायरा बढ़ने लगा है। ऐसे में किसानों की स्थिति को जड़ीबूटी की खेती संभाल सकती है। यहां आयुर्वेद, युनानी दवाइयों में प्रयोग होने सहित सौंदर्य प्रसाधन, धूप अगरबत्ती, दंत मंजन आदि के निर्माण में काम आने वाली जड़ीबूटियां भी बहुतायत में मिलती हैं। जिसका अभी तक वन तस्करों द्वारा ही फायदा उठाया जा रहा है। बार्सू में सात एकड़ तथा गोरसाली में एक हेक्टेयर का सरकारी जड़ीबूटी फार्म बंजर पड़े हैं। यह फार्म एक-एक दैनिक मजदूरों के भरोसे कागजों में जीवित है।
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जिले में भेषज विकास इकाई के अधिकारी विमल कुमार स्वीकारते हैं कि उनके फार्म में न सिंचाई का पानी है और न ही स्टाफ व बजट। यदि यहां किसानों के लिए पौध तैयार करने की व्यवस्था हो तो जड़ीबूटी की खेती से किसानों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। बार्सू गांव के किसान जगमोहन रावत एवं पूर्व प्रमुख विनीता रावत कहते हैं कि इस बार आलू पांच रुपये किलो में बेच कर किसान नुकसान उठा रहा है। यदि उनके गांव के बंजर पड़े फार्म को आबाद किया जाए, तो लोग जड़ीबूटी की खेती करके फायदा उठा सकते हैं। इसकी खेती को जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
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विभाग ने हर्षिल तथा सोनगाड नर्सरी में वन ककडी, कुटकी, अतीस, कूट, केसर, लेवेंडर, बालछड, थुनेर, लादू, सतावर आदि की पौध तैयार करके जंगलों में लगाई है। यहां गांवों में जड़ीबूटी की खेती को प्रोत्साहन मिले, तो किसान गांव में रह कर ही अच्छी कमाई कर सकते है। - आरवी सिंह यादव, एसडीओ वन विभाग।