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स्थापना के सात साल बाद भी राज्य फूड लैब को नहीं मिला खाद्य विश्लेषक
अमर उजाला ब्यूरो रुद्रपुर
Updated Mon, 27 Feb 2017 11:44 PM IST
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रुद्रपुर में बदहाल हालात में राज्य की एक मात्र फूड लैब।
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड शासन ने स्थापना के बाद से ही राज्य की खाद्य एवं औषधि विश्लेषण शाला को लावारिस छोड़ दिया है। स्थापना के सात साल बाद भी राज्य की एक मात्र फूड लैब को अभी तक स्थायी तौर पर खाद्य विश्लेषक नहीं मिल पाया है। वैकल्पिक माध्यमों से इस लैब को सिर्फ नाम के लिए संचालित किया जा रहा है। अब हालात यह हैं कि इस लैब को मात्र छह संविदा कनिष्ठ विश्लेषक किसी तरह से चला रहे हैं। यही कारण है कि यहां पर पूरे प्रदेश से जांच को आने वाले सैंपलों का जांच कार्य भी प्रभावित हो रहा है। करोड़ों रुपए की लागत से तैयार की गई लैब की स्थित अब बद से बदहाल हो रही है। जिन अफसरों को इस लैब का दायित्व सौंपा गया है वह भी इसे गर्त में धकेलने का ही काम कर रहे हैं।
बता दें कि आठ जून 2010 को इस लैब का लोकार्पण तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने किया था। उद्घाटन के समय भी लैब में खाद्य विश्लेषक की स्थायी तैनाती नहीं थी, इसके बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक ने इसकी व्यवस्थाओं का मूल्यांकन किए बिना ही इसके लोकार्पण की इतिश्री कर दी। तभी से यह लैब स्थायी खाद्य विश्लेषक का इंतजार कर रही है। सात सालों में बिना स्थायी खाद्य विश्लेषक के जांच को आने वाले नमूनों का क्या हाल होगा यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। इस लैब को संविदा पर नियुक्त किए गए मात्र छह कनिष्ठ विश्लेषक किसी तरह से धकेल रहे हैं।
लैब का पूरा दायित्व ऊधमसिंह नगर के सीएमओ एचके जोशी के कंधों पर है, लेकिन उनकी स्थिति भी वर्तमान में सिर्फ लाचारी के सिवा कुछ नहीं है। वैकल्पिक तौर पर महीने में एक-दो बार ही यहां पर अस्थायी तौर में मात्र एक दिन के लिए यूपी के गाजियाबाद से एक खाद्य विश्लेषक जांच को आते हैं, ऐसे में एक दिन में वह पूरे प्रदेश के जांच कार्यों को किस तरह से अमलीजामा पहनाते हैं यह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है।
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लैब में लोक सेवा आयोग से वरिष्ठ विश्लेषक खाद्य की तैनाती जरूर की गई है। लेकिन उनका काम भी सिर्फ सुपर विजन तक ही सीमित है। सबसे खास बात यह है कि इस लैब की दुर्दशा पर जब स्वास्थ्य महानिदेशक डीएस रावत से बात की गई तो उन्होंने भी अपना पल्ला झाड़ते हुए इसे फूड कमिश्नर के माथे मढ़ दिया। जब फूड कमिश्नर ओम प्रकाश से बात करने की कोशिश की गई तो उन्हीं के मोबाइल नंबर पर उनके पीए ने भी साहब से बात कराने में असमर्थता जता दी। ऐसे में सवाल यह है कि जब शासन के आला अधिकारी ही करोड़ों रुपए की लागत से तैयार की गई राज्य फूड लैब के प्रति गंभीर नहीं है तो यहां सीएमओ को सौंपा गया दायित्व भला फिर कैसे प्रभावी होगा।
राज्य खाद्य एवं औषधि विश्लेषण शाला में तैनात स्टाफ भी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, उन्हें आला अफसरों की ओर से सख्त हिदायत दी गई है कि यदि मीडिया के समक्ष कुछ भी बोला तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। ऐसे में यहां का स्टाफ भी गुपचुप और सहमा हुआ है। कुछ जानकारों का कहना है कि जब तक स्थायी खाद्य विश्लेषक की तैनाती नहीं हो जाती तब तक लैब के हालात में सुधार संभव नहीं है। उधर होली का त्योहार सिर पर है ऐसे में जांच को आने वाले नमूनों का जांच कार्य किस तरह से होगा यह भी बड़ा सवाल है। कुल मिलाकर लैब के मामले में स्थापना के बाद से शासन स्तर पर ही हीलाहवाली होती रही है।
बता दें कि आठ जून 2010 को इस लैब का लोकार्पण तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने किया था। उद्घाटन के समय भी लैब में खाद्य विश्लेषक की स्थायी तैनाती नहीं थी, इसके बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक ने इसकी व्यवस्थाओं का मूल्यांकन किए बिना ही इसके लोकार्पण की इतिश्री कर दी। तभी से यह लैब स्थायी खाद्य विश्लेषक का इंतजार कर रही है। सात सालों में बिना स्थायी खाद्य विश्लेषक के जांच को आने वाले नमूनों का क्या हाल होगा यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। इस लैब को संविदा पर नियुक्त किए गए मात्र छह कनिष्ठ विश्लेषक किसी तरह से धकेल रहे हैं।
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लैब का पूरा दायित्व ऊधमसिंह नगर के सीएमओ एचके जोशी के कंधों पर है, लेकिन उनकी स्थिति भी वर्तमान में सिर्फ लाचारी के सिवा कुछ नहीं है। वैकल्पिक तौर पर महीने में एक-दो बार ही यहां पर अस्थायी तौर में मात्र एक दिन के लिए यूपी के गाजियाबाद से एक खाद्य विश्लेषक जांच को आते हैं, ऐसे में एक दिन में वह पूरे प्रदेश के जांच कार्यों को किस तरह से अमलीजामा पहनाते हैं यह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है।
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लैब में लोक सेवा आयोग से वरिष्ठ विश्लेषक खाद्य की तैनाती जरूर की गई है। लेकिन उनका काम भी सिर्फ सुपर विजन तक ही सीमित है। सबसे खास बात यह है कि इस लैब की दुर्दशा पर जब स्वास्थ्य महानिदेशक डीएस रावत से बात की गई तो उन्होंने भी अपना पल्ला झाड़ते हुए इसे फूड कमिश्नर के माथे मढ़ दिया। जब फूड कमिश्नर ओम प्रकाश से बात करने की कोशिश की गई तो उन्हीं के मोबाइल नंबर पर उनके पीए ने भी साहब से बात कराने में असमर्थता जता दी। ऐसे में सवाल यह है कि जब शासन के आला अधिकारी ही करोड़ों रुपए की लागत से तैयार की गई राज्य फूड लैब के प्रति गंभीर नहीं है तो यहां सीएमओ को सौंपा गया दायित्व भला फिर कैसे प्रभावी होगा।
राज्य खाद्य एवं औषधि विश्लेषण शाला में तैनात स्टाफ भी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है, उन्हें आला अफसरों की ओर से सख्त हिदायत दी गई है कि यदि मीडिया के समक्ष कुछ भी बोला तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। ऐसे में यहां का स्टाफ भी गुपचुप और सहमा हुआ है। कुछ जानकारों का कहना है कि जब तक स्थायी खाद्य विश्लेषक की तैनाती नहीं हो जाती तब तक लैब के हालात में सुधार संभव नहीं है। उधर होली का त्योहार सिर पर है ऐसे में जांच को आने वाले नमूनों का जांच कार्य किस तरह से होगा यह भी बड़ा सवाल है। कुल मिलाकर लैब के मामले में स्थापना के बाद से शासन स्तर पर ही हीलाहवाली होती रही है।