{"_id":"5fe78f1f8ebc3e08c168e9e2","slug":"opposition-to-the-corona-vaccine-over-gelatin-dr-zaidi-rudrapur-news-hld408832225","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिलेटिन को लेकर कोरोना वैक्सीन का विरोध फिजूल : डॉ. जैदी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिलेटिन को लेकर कोरोना वैक्सीन का विरोध फिजूल : डॉ. जैदी
विज्ञापन
डॉ. एमजीएच जैदी।
- फोटो : RUDRAPUR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सुरेंद्र कुमार वर्मा
पंतनगर। वैश्विक महामारी कोविड-19 से जूझ रहे देशों में कई कंपनियां कोविड वैक्सीन बनाने में जुटी हैं और कई देश इन वैक्सीन की खुराक हासिल करने में लगे हैं। कुछ धार्मिक समूहों ने इसमें सुअर के मांस (पोर्क) से बने जिलेटिन का इस्तेमाल होने के चलते इसको हराम बताकर ऐतराज जताया है। अपने समुदाय से वैक्सीन नहीं लगवाने का फतवा जारी किया है। पंत विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एवं इस्लाम धर्म के जानकार डॉ. एमजीएच जैदी ने वैक्सीन में जिलेटिन की उपलब्धता आवश्यक बताते हुए इसे हलाल की श्रेणी में जगह दी है। उन्होंने कहा कि वैक्सीन का कोई धर्म नहीं होता, यह दवा है इसे हर व्यक्ति को जरूर लगाना चाहिए।
डॉ. जैदी के अनुसार जिलेटिन प्रोटीन का एक बेहतर स्त्रोत है। किसी भी वैक्सीन को लंबे समय तक अनुरक्षित करने के लिए उसमें जिलेटिन का इस्तेमाल अनिवार्य है। यदि जिलेटिन का प्रयोग नहीं किया जाए तो उसके जल्द बेकार होने का खतरा रहता है। पोलियो, हेपेटाइटिस, खसरा, मलेरिया आदि बीमारियों की दवाओं में जिलेटिन का प्रयोग होता है। कुछ कंपनियां सुअर के मांस से बने जिलेटिन का प्रयोग किए बिना वैक्सीन विकसित करने पर कई साल तक काम कर चुकी हैं, जिन्हें खास सफलता नहीं मिली है।
कोरोना वैक्सीन को मंजूरी मिलने और कुछ देशों में टीकाकरण शुरू होने के साथ ही इससे जुड़े विवाद भी सामने आ रहे हैं। नया विवाद वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाले जिलेटिन को लेकर है, जो सुअर के गोश्त से बनाया जाता है। मुस्लिम देशों और संगठनों को इस पर आपत्ति है। क्रिश्चियन कैथोलिक्स में इस बात को लेकर गुस्सा है कि कुछ वैक्सीन में गर्भपात में निकले भ्रूण से मिले सेल्स का इस्तेमाल किया है।
विज्ञापन
सर्वोच्च धार्मिक संगठन फतवा काउंसिल ने कहा कि वैक्सीन में पोर्क जिलेटिन का इस्तेमाल हुआ भी होगा, तो वैक्सीन खानी थोड़ी है, यह तो दवा है, इंजेक्शन के तौर पर लगेगी। वहीं, इजराइल में यहूदी धार्मिक संगठन भी जिलेटिन से जुड़े विरोध को दूर करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कैथोलिक्स के संदेहों को दूर करने का जिम्मा वेटिकन ने उठाया है।
ब्रिटेन ने खोजा जिलेटिन का उत्पादों में प्रयोग
पंतनगर। 15वीं शताब्दी के मध्य में सबसे पहले ब्रिटेन में जिलेटिन की खोज कर इसका प्रयोग खाद्य पदार्थों में शुरू हुआ और वर्ष 1754 में इसका पेटेंट हासिल किया गया। आज इसका प्रयोग जैम, जेली, कैंडी, आइसक्रीम, पेय पदार्थों, सभी कॉस्मेटिक्स, दवाइयों के कैप्सूल, कागज के ऊपर ग्लेजिंग व सभी वैक्सीनों के उत्पादन में किया जाता है।
इसके महत्व का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वर्ष 2019 में विश्व भर में 6.20 लाख टन जिलेटिन का उत्पादन और खपत हुई है। जिलेटिन का उत्पादन 44 प्रतिशत सुअर की चर्बी, 28 प्रतिशत बोविना, 27 प्रतिशत अन्य वनस्पिति तेलों व 01 प्रतिशत हड्डियों से किया जाता है।
यहूदी, ईसाई और इस्लामिक सभी इब्राहीमी धर्मों में खाद्य पदार्थों के रूप में जिलेटिन का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। यदि इसका इस्तेमाल वैक्सीन में हुआ भी हो, तो चूंकि जिलेटिन खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं ले रहे हैं, इसलिए वैक्सीन के नहीं लगवाने संबंधी फतवे पर अमल करने का कोई औचित्य नहीं है। वैक्सीन का कोई धर्म नहीं होता, इसलिए समस्त भारतीय वैक्सीन के प्रति अपनी आस्था को समर्पित करते हुए राष्ट्रहित में वैक्सीन जरूर लगवाएं। - डॉ. एमजीएच जैदी, वरिष्ठ प्राध्यापक।
विज्ञापन
पंतनगर। वैश्विक महामारी कोविड-19 से जूझ रहे देशों में कई कंपनियां कोविड वैक्सीन बनाने में जुटी हैं और कई देश इन वैक्सीन की खुराक हासिल करने में लगे हैं। कुछ धार्मिक समूहों ने इसमें सुअर के मांस (पोर्क) से बने जिलेटिन का इस्तेमाल होने के चलते इसको हराम बताकर ऐतराज जताया है। अपने समुदाय से वैक्सीन नहीं लगवाने का फतवा जारी किया है। पंत विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एवं इस्लाम धर्म के जानकार डॉ. एमजीएच जैदी ने वैक्सीन में जिलेटिन की उपलब्धता आवश्यक बताते हुए इसे हलाल की श्रेणी में जगह दी है। उन्होंने कहा कि वैक्सीन का कोई धर्म नहीं होता, यह दवा है इसे हर व्यक्ति को जरूर लगाना चाहिए।
डॉ. जैदी के अनुसार जिलेटिन प्रोटीन का एक बेहतर स्त्रोत है। किसी भी वैक्सीन को लंबे समय तक अनुरक्षित करने के लिए उसमें जिलेटिन का इस्तेमाल अनिवार्य है। यदि जिलेटिन का प्रयोग नहीं किया जाए तो उसके जल्द बेकार होने का खतरा रहता है। पोलियो, हेपेटाइटिस, खसरा, मलेरिया आदि बीमारियों की दवाओं में जिलेटिन का प्रयोग होता है। कुछ कंपनियां सुअर के मांस से बने जिलेटिन का प्रयोग किए बिना वैक्सीन विकसित करने पर कई साल तक काम कर चुकी हैं, जिन्हें खास सफलता नहीं मिली है।
विज्ञापन
कोरोना वैक्सीन को मंजूरी मिलने और कुछ देशों में टीकाकरण शुरू होने के साथ ही इससे जुड़े विवाद भी सामने आ रहे हैं। नया विवाद वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाले जिलेटिन को लेकर है, जो सुअर के गोश्त से बनाया जाता है। मुस्लिम देशों और संगठनों को इस पर आपत्ति है। क्रिश्चियन कैथोलिक्स में इस बात को लेकर गुस्सा है कि कुछ वैक्सीन में गर्भपात में निकले भ्रूण से मिले सेल्स का इस्तेमाल किया है।
विज्ञापन
सर्वोच्च धार्मिक संगठन फतवा काउंसिल ने कहा कि वैक्सीन में पोर्क जिलेटिन का इस्तेमाल हुआ भी होगा, तो वैक्सीन खानी थोड़ी है, यह तो दवा है, इंजेक्शन के तौर पर लगेगी। वहीं, इजराइल में यहूदी धार्मिक संगठन भी जिलेटिन से जुड़े विरोध को दूर करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कैथोलिक्स के संदेहों को दूर करने का जिम्मा वेटिकन ने उठाया है।
ब्रिटेन ने खोजा जिलेटिन का उत्पादों में प्रयोग
पंतनगर। 15वीं शताब्दी के मध्य में सबसे पहले ब्रिटेन में जिलेटिन की खोज कर इसका प्रयोग खाद्य पदार्थों में शुरू हुआ और वर्ष 1754 में इसका पेटेंट हासिल किया गया। आज इसका प्रयोग जैम, जेली, कैंडी, आइसक्रीम, पेय पदार्थों, सभी कॉस्मेटिक्स, दवाइयों के कैप्सूल, कागज के ऊपर ग्लेजिंग व सभी वैक्सीनों के उत्पादन में किया जाता है।
इसके महत्व का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वर्ष 2019 में विश्व भर में 6.20 लाख टन जिलेटिन का उत्पादन और खपत हुई है। जिलेटिन का उत्पादन 44 प्रतिशत सुअर की चर्बी, 28 प्रतिशत बोविना, 27 प्रतिशत अन्य वनस्पिति तेलों व 01 प्रतिशत हड्डियों से किया जाता है।
यहूदी, ईसाई और इस्लामिक सभी इब्राहीमी धर्मों में खाद्य पदार्थों के रूप में जिलेटिन का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। यदि इसका इस्तेमाल वैक्सीन में हुआ भी हो, तो चूंकि जिलेटिन खाद्य पदार्थ के रूप में नहीं ले रहे हैं, इसलिए वैक्सीन के नहीं लगवाने संबंधी फतवे पर अमल करने का कोई औचित्य नहीं है। वैक्सीन का कोई धर्म नहीं होता, इसलिए समस्त भारतीय वैक्सीन के प्रति अपनी आस्था को समर्पित करते हुए राष्ट्रहित में वैक्सीन जरूर लगवाएं। - डॉ. एमजीएच जैदी, वरिष्ठ प्राध्यापक।