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Udham Singh Nagar News: उत्तराखंड में मधुमक्खियों में छत्ता भृंग लगने का खतरा
Mon, 24 Jun 2024 04:36 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Mon, 24 Jun 2024 04:36 AM IST
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छत्ता भृंग की प्यूपा से वयस्का तक की विभिन्न अवस्थाएं।
- फोटो : छत्ता भृंग की प्यूपा से वयस्का तक की विभिन्न अवस्थाएं।
पंतनगर। दक्षिण भारत में भारतीय मौन वंशों में छत्ता भृंग के आक्रामण में तेजी आई है। इससे बहुत सारी मौन वंशों में घरछूट के कारण मौनपालकों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय स्थित कृषि महाविद्यालय में कीट विज्ञान के विभागाध्यक्ष डाॅ. प्रमोद मल्ल ने बताया कि छत्ता भृंग का प्रकोप अभी तक उत्तरी भारत में नहीं है। हालांकि कीट का प्रकोप फैलने की आशंका को नकारा नही जा सकता है। मौनपालकों को इस जीव से सजग रहने की जरूरत है। यदि किसी मौन पालक को यह कीट मौनवंश के छत्तों में दिखाई दे तो वह तत्काल इसकी सूचना पंतनगर विवि के कीट वैज्ञानिकों को दे। साथ ही कुछ कीटों को किसी कांच या प्लास्टिक की बोतल में डालकर अतिशीघ्र पंतनगर विवि के कीट विज्ञान विभाग को दें, जिससे इसकी पहचान कर उचित निदान और इसको महामारी के रूप में फैलने से रोका जा सके।
क्या है छत्ता भृंग
पंतनगर। छत्ता भृंग (बीटल) छोटा व बड़ा दो प्रकार का चमकदार काले रंग का होता है। यह मधुमक्खियों के छत्ते, शहद और पराग को नुकसान पहुंचाने वाला कीट है। अफ्रीका से उत्पन्न मधुमक्खी पालन को नुकसान पहुंचाने वाले इन बड़े भृंग को अंडे देने और विकसित होने के लिए सड़ने वाले पौधे के पदार्थ व शाकाहारी जानवरों के मल की आवश्यकता होती है। बड़े भृंग को शहद और पराग जैसे अन्य खाद्य स्रोतों के बजाय मधुमक्खी के भ्रूण खाने में दिलचस्पी होती है। इस कीट जल्द छत्ते की संरचना को नष्ट कर सकता है। मधुमक्खियों से बड़े आकार को ध्यान में रखते हुए अफ्रीका में मधुमक्खी पालक छत्तों के लिए छोटे प्रवेश द्वार का उपयोग करते हैं, जो छत्तों में भृंगों की पहुंच को सीमित करता है। संवाद
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मौनपालक बरतें यह सावधानी
पंतनगर। मौनगृहों में ऊपरी ढक्कन के नीचे यदि गनीबैग लगे हों तो उन्हें तत्काल हटा दें। मौनगृहों का मुख्य द्वार संकरा कर दें। मौनालयों का स्थानांतरण आस-पास के क्षेत्र में एक माह के अंतर पर करते रहें। मौनालय की भूमि की एक सप्ताह में जुताई कर दें। छत्तों में शहद के सड़न की दुर्गंध आने पर या भृंग की सूड़ी दिखाई देने पर उन छत्तों को नष्ट कर दें। भृंग का प्रकोप होने पर उसके विभिन्न अवस्थाओं के नमूने लेकर पंतनगर विवि को भेजें।
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जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय स्थित कृषि महाविद्यालय में कीट विज्ञान के विभागाध्यक्ष डाॅ. प्रमोद मल्ल ने बताया कि छत्ता भृंग का प्रकोप अभी तक उत्तरी भारत में नहीं है। हालांकि कीट का प्रकोप फैलने की आशंका को नकारा नही जा सकता है। मौनपालकों को इस जीव से सजग रहने की जरूरत है। यदि किसी मौन पालक को यह कीट मौनवंश के छत्तों में दिखाई दे तो वह तत्काल इसकी सूचना पंतनगर विवि के कीट वैज्ञानिकों को दे। साथ ही कुछ कीटों को किसी कांच या प्लास्टिक की बोतल में डालकर अतिशीघ्र पंतनगर विवि के कीट विज्ञान विभाग को दें, जिससे इसकी पहचान कर उचित निदान और इसको महामारी के रूप में फैलने से रोका जा सके।
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क्या है छत्ता भृंग
पंतनगर। छत्ता भृंग (बीटल) छोटा व बड़ा दो प्रकार का चमकदार काले रंग का होता है। यह मधुमक्खियों के छत्ते, शहद और पराग को नुकसान पहुंचाने वाला कीट है। अफ्रीका से उत्पन्न मधुमक्खी पालन को नुकसान पहुंचाने वाले इन बड़े भृंग को अंडे देने और विकसित होने के लिए सड़ने वाले पौधे के पदार्थ व शाकाहारी जानवरों के मल की आवश्यकता होती है। बड़े भृंग को शहद और पराग जैसे अन्य खाद्य स्रोतों के बजाय मधुमक्खी के भ्रूण खाने में दिलचस्पी होती है। इस कीट जल्द छत्ते की संरचना को नष्ट कर सकता है। मधुमक्खियों से बड़े आकार को ध्यान में रखते हुए अफ्रीका में मधुमक्खी पालक छत्तों के लिए छोटे प्रवेश द्वार का उपयोग करते हैं, जो छत्तों में भृंगों की पहुंच को सीमित करता है। संवाद
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मौनपालक बरतें यह सावधानी
पंतनगर। मौनगृहों में ऊपरी ढक्कन के नीचे यदि गनीबैग लगे हों तो उन्हें तत्काल हटा दें। मौनगृहों का मुख्य द्वार संकरा कर दें। मौनालयों का स्थानांतरण आस-पास के क्षेत्र में एक माह के अंतर पर करते रहें। मौनालय की भूमि की एक सप्ताह में जुताई कर दें। छत्तों में शहद के सड़न की दुर्गंध आने पर या भृंग की सूड़ी दिखाई देने पर उन छत्तों को नष्ट कर दें। भृंग का प्रकोप होने पर उसके विभिन्न अवस्थाओं के नमूने लेकर पंतनगर विवि को भेजें।